Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.9
मूल श्लोक :
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसुHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे धनञ्जय उन (सृष्टिरचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
एक परिच्छिन्न जीव को उसके अहंकारमूलक कर्म अपने संस्कार उसके अन्तकरण में अंकित करके कालान्तर में फलोन्मुख होकर उसे उत्पीड़ित करते हैं। सभी अहंकार केन्द्रित कर्म? जो कि सदा स्वार्थ से ही प्रेरित होते हैं? अपने कुरूप पदचिन्हों को मनरूपी समुद्र तट पर अंकित करते हैं? निरहंकार और निस्वार्थ भाव से किये गये कर्म नहीं जैसे? आकाश में विचरण करते हुए पक्षी अपने पदचिन्हों को पीछे नहीं छोड़ते। एक कृतघ्न पुत्र अपने पिता पर ही पदाघात करता है इसकी तुलना कीजिये? खेल में मग्न उस निष्पाप शिशु से जो अपने छोटेछोटे पैरों से अपने पिता को मार रहा हो यद्यपि पदाघात की क्रिया में समानता होने पर भी दोनों के अन्तर को समझने के लिए हमें किसी दार्शनिक की सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ कहीं और जब कभी अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म किये जाते हैं? वे निश्चय ही दुखदायक वासनाओं को जन्म देते हैं।प्रकृति को चेतनता प्रदान करने और भूत समुदाय की पुनपुन रचना करने में परम पुरुष को न कोई राग है और न कोई द्वेष। इस सृष्टि चक्र के चलते रहने मात्र से वह सनातन परम पुरुष कभी प्रभावित नहीं होता। वे कर्म मुझे बांधते नहीं। कारण यह है कि वे कर्म न अहंकार मूलक हैं और न स्वार्थ से प्रेरित।चलचित्रगृह के श्वेत परदे पर दिखाया जाने वाला चलचित्र (सिनेमा) कितना ही दुखान्त और हत्यापूर्ण क्यों न हो? उसकी कथा कितनी ही अश्रुपूर्ण और उदासी भरी क्यों न हो? कितने ही आंधी और वर्षा के दृश्य उसमें क्यों न दिखाये गये हों सिनेमा की समाप्ति पर वह श्वेतपट न रक्तरंजित होता है और न अश्रुओं से भीगा ही होता है? और न तूफानों से वह क्षतिग्रस्त ही होता है। तथापि हम जानते हैं कि उस स्थिर अपरिवर्तित पट के बिना? छाया और प्रकाश के माध्यम से चित्रपट की कथा प्रदर्शित नहीं की जा सकती थी। उसी प्रकार? नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा वह चिरस्थायी रंगमंच हैं? जिस पर दुखपूर्ण जीवन का नाटक अनेकत्व की भाषा में असंख्य जीवों के द्वारा निरन्तर अभिनीत होता रहता है? जो अपनी पूर्वाजित वासनाओं से विवश हुए निर्धारित भूमिकाओं को करते रहते हैं।रेल के पटरी से उतरने के कारण होने वाली भयंकर दुर्घटना के लिए इंजिन की वाष्प को दंडित नहीं किया जाता? और न ही गन्तव्य तक अपने समय पर सुरक्षित पहुँचने पर उसका अभिनन्दन ही किया जाता है। यह सत्य है कि उस वाष्प के बिना दुर्घटना नहीं हो सकती थी और न ही गन्तव्य की प्राप्ति क्योंकि उसके बिना इंजिन केवल निष्क्रिय? भारी लोहा ही होता है। रचनात्मक या विध्वंसात्मक कार्य करने की शक्ति इंजिन को वाष्प से ही प्राप्त होती है। इन सब घटनाओं में? उस वाष्प को इंजिन चलाने के प्रति न राग है और न द्वेष? इसलिए इन घटनाओं का उत्तरदायित्व उस पर थोप कर उसे बन्धन में नहीं डाला जाता। कर्म का प्रेरक उद्देश्य ही कर्म के फल्ा को निश्चित करता है।सम्पूर्ण शक्ति का स्रोत आत्मा है। वह मन को शक्ति प्रदान करता है। प्रत्येक मन वासनाओं का संचय मात्र है। शुभ वासनाओं से संस्कारित मन आनन्द और सामञ्जस्य का गीत गाता है? जबकि अशुभ वासनाएं मन को दुख से कराहने को बाध्य करती हैं। ग्रामोफोन की सुई रिकार्ड से बज रहे संगीत के लिए उत्तरदायी नहीं होती। जैसा रिकार्ड? वैसा संगीत। इसी प्रकार? आत्मा सनातन है? जिसे इसकी चिन्ता नहीं होती है कि किस प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है। जगत् परिवर्तन के प्रति उसे किसी प्रकार की व्याकुलता नहीं होती। जगत् में जो कुछ हो रहा हो चाहे हत्या हो या प्राणोत्सर्ग सूर्यप्रकाश उसे प्रकाशित करता है। सूर्य का सम्बन्ध न हत्यारे के अप्ाराध से है और न बलिदानी पुरुष के गौरव से ही है। शुद्धचैतन्यस्वरूप आत्मा वासनारूपी प्रकृति को व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करता है? फिर वे वासनाएं नरकयातना के लिए हों या गौरव ख्याति के लिए। उन कर्मों में असक्त और उदासीन के समान स्थित आत्मा को वे कर्म नहीं बांधते हैं।अनन्त और सान्त में निश्चित रूप से वह अद्भुत सम्बन्ध कौनसा है ऐसा कहा गया है कि सान्त प्रकृति अनन्त आत्मा के कारण कार्य करती है और फिर भी आत्मा उदासीन रहता है? वह कैसे
English Translation By Swami Sivananda
These acts do not bind Me, O Arjuna, sitting like one indifferent, unattached to those acts.
Transliteration
na ca māṃ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya
udāsīnavadāsīnamasaktaṃ teṣu karmasuअनुवाद
हे धनंजय! वे कर्म मुझे नहीं बाँधते हैं, क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति-रहित और उदासीन की भाँति स्थित रहता हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यद्यपि वे सृष्टि की रचना, पालन और संहार आदि सभी कर्म करते हैं, फिर भी वे इन कर्मों के बंधन में नहीं बंधते। इसका कारण यह है कि वे इन सभी कार्यों को पूर्णतः अनासक्त और एक तटस्थ साक्षी की भाँति करते हैं। यह मनुष्यों के लिए भी एक आदर्श है कि निष्काम भाव से कर्म करने पर कर्म बंधनकारक नहीं होते।
Translation
And these actions do not bind Me, O Dhananjaya, as I remain seated like one unconcerned, unattached to those actions.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that although He performs all the cosmic activities of creation, maintenance, and dissolution, these actions do not bind Him. The reason is His absolute detachment and neutrality, as He remains situated like an unconcerned observer. This serves as a lesson for human beings that actions performed without attachment and ego do not create karmic bondage.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| च | और |
| माम् | मुझको |
| तानि | वे |
| कर्माणि | कर्म |
| निबध्नन्ति | बाँधते हैं |
| धनञ्जय | हे धनंजय |
| उदासीन-वत् | उदासीन की भाँति |
| आसीनम् | स्थित |
| असक्तम् | अनासक्त |
| तेषु | उन |
| कर्मसु | कर्मों में |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| ca | and |
| mām | Me |
| tāni | those |
| karmāṇi | actions |
| nibadhnanti | bind |
| dhanañjaya | O Dhananjaya |
| udāsīna-vat | like one unconcerned |
| āsīnam | seated |
| asaktam | unattached |
| teṣu | to those |
| karmasu | actions |