Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.8
मूल श्लोक :
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस प्राणिसमुदायको मैं (कल्पोंके आदिमें) अपनी प्रकृतिको वशमें करके बारबार रचता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
समष्टि सूक्ष्म शरीर (मनबुद्धि) में व्यक्त हो रहे चैतन्य ब्रह्म को ईश्वर सृष्टिकर्ता कहते हैं एक व्यष्टि सूक्ष्म शरीर को उपाधि से विशिष्ट वही ब्रह्म? संसारी जीव कहलाता है। एक ही सूर्य विशाल? स्वच्छ और शान्त सरोवर में तथा मटमैले जल से भरे कुण्ड में भी प्रतिबिम्बित होता है। तथापि दोनों के प्रतिबिम्बों में जो अन्तर होता है उसका कारण दोनों जलांे का अन्तर है। यह उदाहरण जीव और ईश्वर के भेद को स्पष्ट करता है। जिस प्रकार आकाश में स्थित सूर्य का यह कथन उपयुक्त होगा कि सरोवर के निश्चल और तेजस्वी प्रतिबिम्ब तथा जलकुण्ड के चंचल और मन्द प्रतिबिम्ब का कारण मैं हूँ? उसी प्रकार ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि सृष्टिकर्ता और सृष्टप्रणियों की चेतन आत्मा मैं हूँ।समष्टि सूक्ष्म शरीर रूपी उपाधि ब्रह्म की अपरा प्रकृति है। कल्प के आदि में? अपरा प्रकृति में विद्यमान वासनायें व्यक्त होती हैं और? कल्प की समाप्ति पर सब भूत मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं।प्रकृति को चेतना प्रदान करने की क्रिया ब्रह्म की कृपा है? जिससे प्रकृति वृद्धि को प्राप्त होकर संसार वृक्ष का रूप धारण करती है। यदि परम चैतन्यस्वरूप ब्रह्म प्रकृति (माया) से तादात्म्य न करे अथवा उसमें व्यक्त न हो? तो वह प्रकृति स्वयं जड़ होने के कारण? किसी भी जीव की सृष्टि नहीं कर सकती। वासनारूपी इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को? मैं पुनपुन रचता हूँ। आत्मा की चेतनता प्राप्त होने के पश्चात् भूतमात्र व्यक्त हुए बिना नहीं रह सकते? क्योंकि वे प्रकृति के वश में हैं? स्वतन्त्र नहीं।प्राय वेदान्त दर्शन में? ऋषिगण विश्व की उत्पत्ति का वर्णन समष्टि के दृष्टिकोण से करते हैं? जिसके कारण वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थियों को कुछ कठिनाई होती है। परन्तु जो विद्यार्थी? उसके आशय को व्यक्तिगत (व्यष्टि) दृष्टि से समझने का प्रयत्न करता है? वह इस सृष्टि की रचना को सरलता से समझ सकता है। इस प्रकार व्यष्टि का दृष्टि से विचार करने पर भगवान् श्रीकृष्ण का कथन सत्य प्रमाणित होगा। अपरा प्रकृति के अंश रूप मन और बुद्धि से आत्मचैतन्य का तादात्म्य हुए बिना हममें एक विशिष्ट गुणधर्मी जीव की उत्पत्ति नहीं हो सकती? जो अपने संसारी जीवन के दुखों को भोगता रहता है।हम पहले भी देख चुके हैं कि निद्रावस्था में मनबुद्धि के साथ तादात्म्य अभाव में एक अत्यन्त दुष्ट पुरुष और एक महात्मा पुरुष दोनों एक समान होते हैं। परन्तु जाग्रत अवस्था में दोनों अपनेअपने स्वभाव को व्यक्त करते हैं? जबकि दोनों में वही एक आत्मचैतन्य व्यक्त होता है। दुष्ट मनुष्य साधु के समान क्षणमात्र भी व्यवहार नहीं कर सकता और न वह साधु ही उस दुष्ट के समान व्यवहार करेगा? क्योंकि दोनों ही अपनी प्रकृति के वशात् अन्यथा व्यवहार करने में असमर्थ हैं। भूत समुदाय की सृष्टि और प्रलय का यह सम्पूर्ण नाटक अपरिवर्तनशील? अक्षर नित्य आत्मतत्त्व के रंगमंच पर खेला जाता है मैं पुनपुन उसको रचता हूँ।कर्म का सिद्धांत विवादातीत है। जैसा कर्म वैसा फल। यदि आत्मा भूतमात्र की सृष्टि और प्रलय के कर्म का कर्ता हो? तो क्या उसे भी धर्मअधर्म रूप बन्धन होता है इस पर भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Animating My Nature, I again and again send forth all this multitude of beings, helpless by the force of the Nature.
Transliteration
prakṛtiṃ svām avaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ
bhūtagrāmam imaṃ kṛtsnam avaśaṃ prakṛter vaśātअनुवाद
अपनी प्रकृति को वश में करके, मैं इस सम्पूर्ण भूत-समुदाय को, जो प्रकृति के वश में होने के कारण परवश है, बार-बार रचता हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि वे अपनी त्रिगुणात्मक भौतिक प्रकृति (माया) को अपने नियंत्रण में रखकर सृष्टि की रचना करते हैं। सभी जीव अपने पूर्व कर्मों और प्रकृति के गुणों के अधीन होने के कारण परवश हैं। भगवान अपनी शक्ति से बार-बार इस सृष्टि चक्र का सृजन और संचालन करते हैं।
Translation
Presiding over My own material nature, I send forth again and again this entire multitude of beings, which is helpless under the sway of nature
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains how He controls His own material nature (prakriti) to project the cosmos. The living entities, being bound by their past karma and the modes of nature, are helpless and subject to this cosmic cycle. Under His supervision, the entire multitude of beings is manifested again and again.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रकृतिम् | प्रकृति को |
| स्वाम् | अपनी |
| अवष्टभ्य | वश में करके (अधिष्ठित करके) |
| विसृजामि | मैं रचता हूँ |
| पुनः | बार-बार |
| पुनः | बार-बार |
| भूतग्रामम् | जीवों के समुदाय को |
| इमम् | इस |
| कृत्स्नम् | सम्पूर्ण |
| अवशम् | परवश (असमर्थ) |
| प्रकृतेः | प्रकृति के |
| वशात् | वश में होने के कारण |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| prakṛtim | material nature |
| svām | My own |
| avaṣṭabhya | entering into (presiding over) |
| visṛjāmi | I send forth (create) |
| punaḥ | again |
| punaḥ | again |
| bhūtagrāmam | multitude of beings |
| imam | this |
| kṛtsnam | entire |
| avaśam | helpless (without free will) |
| prakṛteḥ | of nature |
| vaśāt | under the sway |