Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.5
मूल श्लोक :
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
यब सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योग(सामर्थ्य)को देख सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण? भरणपोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि समस्त भूत अर्थात् सम्पूर्ण चराचर सृष्टि उनमें स्थित है? परन्तु वे उसमें नहीं हैं। उसी विषय के तर्क की अगली कड़ी बताते हुए वे अब कहते हैं कि वस्तुत? वे भूत मुझमें स्थित नहीं हैं? अर्थात् अनन्त से सान्त की उत्पत्ति कभी नहीं हुई स्तम्भ और प्रेत के दृष्टान्त का पुन उपयोग करते हुए? भगवान् की उक्ति स्तम्भ के इस कथन के तुल्य होगी कि? वास्तव में? मुझ विद्युत् स्तम्भ में प्रेत का अस्तित्व कदापि नहीं था। अनन्त स्वरूप शुद्ध चैतन्य परमात्मा में इस नानाविध जगत् का अस्तित्व न कभी था? न अब है और न कभी होगा। जाग्रत पुरुष के लिए स्वप्न के भोग कभी उपलब्ध नहीं होते। संक्षेप में? आत्मानुभव में इस नानाविध सृष्टि का दर्शन नहीं होता। वर्तमान में इसकी प्रतीति का कारण अज्ञानरूप आत्मविस्मृति है।यह आत्मा भूतमात्र को उत्पन्न करने वाला और उसका धारकपोषक है? जैसे? समस्त तरंगों का जन्मदाता और धारणपोषण करने वाला समुद्र है और फिर भी? मैं उनमें (भूतों में) स्थित नहीं हूँ। कैसे जैसे? समुद्र तरंगों में नहीं रहता अर्थात् उसके परिच्छेदों से सदा मुक्त रहता है। समस्त घटों की उत्पत्ति? स्थिति और धारण मिट्टी से ही है? तथापि उनमें से कोई एक घट अथवा घटसमुदाय न तो मिट्टी को परिभाषित कर सकता है और न उसके सम्पूर्ण ज्ञान को करा सकता है। दिव्य? सनातन शुद्ध चैतन्य स्वरूप परमात्मा ही वह अधिष्ठान है? जो इस नित्य परिवर्तनशील विविधरूप सृष्टि के विस्तृत हृदय को धारण और प्रकाशित करता है।ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों के ग्रहण से मन में विषयाकार वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं? जिन्हें सर्वरूपों में स्थित चैतन्य आत्मा प्रकाशित करता है। यदि यह चैतन्य न होता तो हमें अखण्ड अनुभवों की धारा के रूप में जीवन का कभी भान भी नहीं हो सकता था। जैसे कपड़े में कपास है? आभूषणों में स्वर्ण और अग्नि में उष्णता है? वैसे ही क्षर सृष्टि में अक्षर तत्त्व है। जाग्रत पुरुष के बिना स्वप्नद्रष्टा नहीं हो सकता जाग्रत पुरुष स्वप्न जगत् को व्याप्त किये रहता है? परन्तु वह स्वप्न से कभी दूषित या लिप्त नहीं होता और? जाग्रत पुरुष की दृष्टि से स्वप्न का अस्तित्व कभी होता ही नहीं।भगवान् श्रीकृष्ण यह अनुभव करते हैं कि विरोधाभास की यह भाषा अर्जुन जैसे सामान्य पुरुषों के लिए एक पहेली सिद्ध हो रही है? इसलिए करूणासागर भगवान् अपने शिष्य के लिए एक दृष्टान्त देते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Nor do beings exist in Me (in reality); behold My divine Yoga, supporting all beings, but not dwelling in them, is My Self, the efficient cause of beings.
Transliteration
na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram
bhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥअनुवाद
और न ही वे सब भूत (प्राणी) मुझमें स्थित हैं, मेरे इस ऐश्वर्यमय योग को देख। भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला मेरा स्वरूप (आत्मा) भूतों में स्थित नहीं है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी अचिंत्य और दिव्य शक्ति (योगमाया) का वर्णन कर रहे हैं। यद्यपि वे संपूर्ण सृष्टि के आधार और पोषक हैं, फिर भी वे सांसारिक आसक्तियों से सर्वथा अछूते और स्वतंत्र हैं। यह उनकी परम स्वतंत्रता और ऐश्वर्य को दर्शाता है, जहाँ वे सब कुछ धारण करते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होते।
Translation
And yet, the beings do not dwell in Me; behold My divine mystery! Sustaining all beings, and bringing them into existence, My Self does not dwell in them.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes His inconceivable and divine power (Yogamaya). Although He is the source, sustainer, and creator of all beings, He remains completely detached and independent of them. This highlights His supreme transcendence, showing that He supports everything without being bound or limited by His creation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| च | और |
| मत्स्थानि | मुझमें स्थित |
| भूतानि | सब प्राणी |
| पश्य | देख |
| मे | मेरा |
| योगम् | योग (सामर्थ्य) |
| ऐश्वरम् | ईश्वरीय / ऐश्वर्यमय |
| भूतभृत् | भूतों का धारण-पोषण करने वाला |
| न | नहीं |
| च | और |
| भूतस्थः | भूतों में स्थित |
| मम | मेरा |
| आत्मा | स्वयं (स्वरूप) |
| भूतभावनः | भूतों को उत्पन्न करने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| ca | and |
| matsthāni | dwelling in Me |
| bhūtāni | the created beings |
| paśya | behold |
| me | My |
| yogam | yoga (divine power) |
| aiśvaram | lordly / majestic |
| bhūtabhṛt | the sustainer of beings |
| na | not |
| ca | and |
| bhūtasthaḥ | dwelling in the beings |
| mama | My |
| ātmā | Self |
| bhūtabhāvanaḥ | the creator of beings |