Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.4
मूल श्लोक :
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
यब सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योग(सामर्थ्य)को देख सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण? भरणपोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त स्वरूप के द्वारा व्याप्त है किसी वस्तु की सूक्ष्मता उसकी व्यापकता से नापी जाती है और इसलिए सूक्ष्मतम वस्तु का सर्वव्यापक होना अनिवार्य है। देशकाल से परिच्छिन्न (सीमित) सभी वस्तुओं का आकार तथा नाश होता है अत सर्वव्यापी वस्तु निराकार और नाशरहित होगी। इस प्रकार आत्मतत्त्व अपने मूल अव्यक्तस्वरूप से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है? जैसे मिट्टी के बने सभी रूपों और आकारों वाले घटों में मिट्टी व्याप्त होती है।यदि? इस प्रकार? अनन्तपरिच्छिन्न तत्त्व सान्त और परिच्छिन्न जगत् को व्याप्त किये है? तो इन दोनों में निश्चित रूप से क्या संबंध है क्या यह जगत् अनन्ततत्त्व से प्रकट हुआ है अथवा क्या अनन्त ने सान्त का निर्माण किया है या फिर क्या अनन्त वस्तु स्वयं विकार को प्राप्त होकर यह जगत् बन गयी? जैसे दूध दही बनता है अथवा? क्या इन दोनों में पितापुत्र या स्वामीभृत्य का संबंध है विश्व के विभिन्न धर्म ऐसे प्रश्नों से भरे हुए हैं। द्वैतवादी लोग ही अनन्त और सान्त? ईश्वर और भक्त के मध्य किसीनकिसी प्रकार के काल्पनिक संबंध में रम सकते हैं। परन्तु अद्वैती ऐसे किसी भी प्रकार के संबंध को स्वीकार नहीं कर सकते? क्योंकि संबंध किन्हीं दो वस्तुओं में ही हो सकता है? जब कि उनके सिद्धांतानुसार केवल आत्मा ही एकमेव अद्वितीय पारमार्थिक सत्य वस्तु है।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में सत्य और मिथ्या के बीच के इस संबंधरहित संबंध का शास्त्रीय वर्णन किया गया है। समस्त भूत मुझमें स्थित हैं? परन्तु मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। शास्त्रीय पद्धति से अनभिज्ञ उतावले पाठकों को यह कथन एक अनाकलनीय विरोधाभास प्रतीत होगा? जिसे अर्थशून्य शब्दों के जमघट के द्वारा व्यक्त किया गया है। परन्तु जिसने अध्यास के सिद्धांत को सम्यक् प्रकार से समझ लिया है? उसके लिए उक्त कथन का अर्थ अत्यन्त सरल है। किसी वस्तु के अज्ञान से उस पर किसी अन्य वस्तु की कल्पना करना अध्यास है जैसे एक स्तम्भ पर प्रेत की कल्पना। शास्त्रीय भाषा में स्तम्भ को अधिष्ठान और प्रेत को अध्यास कहेंगे। इस दृष्टान्त में स्तम्भ (अधिष्ठान) के बिना प्रेत का आभास नहीं हो सकता था। अब स्तम्भ की दृष्टि से उसमें और उस अध्यस्त प्रेत में निश्चित रूप से कौन सा संबंध है कल्पना करें कि स्तम्भ में प्रेत देखकर मोहित हुए व्यक्ति को वह स्तम्भ स्वयंका सम्यक् ज्ञान कराना चाहता है? तो वह किस प्रकार उपदेश देगा वह निर्दोष स्तम्भ उस मूढ़ पुरुष के प्रति असीम प्रेम के कारण भगवान् श्रीकृष्ण के समान ही उपदेश देगा। वह कहेगा निसन्देह ही वह प्रेत मुझमें स्थित है? परन्तु मैं उसमें नहीं हूँ और इसलिए? मैने कदापि किसी भी मूढ़ यात्री को भयभीत नहीं किया है। इसी प्रकार भगवान् यहाँ कहते हैं? मैं अपने अव्यक्त स्वरूप से इस सम्पूर्ण व्यक्त जगत् का अधिष्ठान हूँ। यद्यपि परमात्मा इस नानारूपमय सृष्टि का अधिष्ठान है? तथापि वह उनके गुण दोष? सुख दुख? जन्ममृत्यु आदि से लिप्त नहीं होता? क्योंकि मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ।इस पंक्ति में पूर्व1 कथित सिद्धांत ही प्रतिध्वनित होता है? जहाँ सम्भवत और अधिक लहरदार भाषा में इसे व्यक्त किया गया था कि? मैं उनमें नहीं हूँ? वे मुझमें है। संक्षेप में? यहाँ सूचित किया गया है कि जड़ उपाधियों से तादात्म्य के कारण आत्मा उनमें स्थित हुआ मानो दुखीसंसारी जीव बना है और इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति से उसे बोध होता है कि वास्तव में? मैं अविनाशी? अव्यक्तस्वरूप आत्मा उनमें स्थित नहीं हूँ।उपर्युक्त कथन से मन में यह विचार आ सकता है कि तब अनन्त तत्त्व में परिच्छिन्न का किसी अन्य प्रकार का अस्तित्व हो सकता है परन्तु भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
All this world is pervaded by Me in My unmanifest aspect; all beings exist in Me, but I do not dwell in them.
Transliteration
mayā tatamidaṃ sarvaṃ jagadavyaktamūrtinā
matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥअनुवाद
मुझ अव्यक्त रूप वाले द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। सब भूत मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी सर्वव्यापकता और अनासक्ति का वर्णन करते हैं। वे समझाते हैं कि यद्यपि सम्पूर्ण सृष्टि उनके अव्यक्त रूप से व्याप्त है और सभी प्राणी उन्हीं के आश्रित हैं, फिर भी वे स्वयं इन भौतिक विकारों और प्राणियों से सर्वथा परे और निर्लेप हैं।
Translation
By Me, in My unmanifested form, this entire universe is pervaded. All beings dwell in Me, but I do not dwell in them.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains His omnipresence and transcendence. He states that while the entire universe is pervaded by His unmanifest aspect and all living beings exist within Him, He remains detached and independent of them, unaffected by material nature.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मया | मेरे द्वारा |
| ततम् | व्याप्त है |
| इदम् | यह |
| सर्वम् | सम्पूर्ण |
| जगत् | जगत् |
| अव्यक्त-मूर्तिना | अव्यक्त रूप वाले (मेरे) द्वारा |
| मत्-स्थानि | मुझमें स्थित हैं |
| सर्व-भूतानि | सभी प्राणी |
| न | नहीं |
| च | और |
| अहम् | मैं |
| तेषु | उनमें |
| अवस्थितः | स्थित |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mayā | by Me |
| tatam | pervaded |
| idam | this |
| sarvam | all |
| jagat | universe |
| avyakta-mūrtinā | by the unmanifested form |
| mat-sthāni | situated in Me |
| sarva-bhūtāni | all living beings |
| na | not |
| ca | and |
| aham | I |
| teṣu | in them |
| avasthitaḥ | situated |