Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.33
मूल श्लोक :
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान्के भक्त हों? वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ? इसमें तो कहना ही क्या है इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यदि पूर्व श्लोक में वर्णित गुणहीन और साधनहीन लोग भी भक्ति के द्वारा ईश्वर को प्राप्त हो सकते हैं? तो फिर साधन सम्पन्न व्यक्तियों के लिए परमार्थ की प्राप्ति कितनी सरल होगी? यह कहने की आवश्यकता नहीं है। ये साधनसम्पन्न लोग हैं ब्राह्मण अर्थात् शुद्धान्तकरण का व्यक्ति? तथा राजा माने उदार हृदय और दूर दृष्टि का बुद्धिमान व्यक्ति। जिस राजा ने बुद्धिमत्तापूर्वक अपनी राजसत्ता एवं धनवैभव का उपयोग किया हो? वह आत्मानुसंधान के द्वारा वास्तविक शान्ति का अनुभव प्राप्त करता है। ऐसे राजा को ही राजर्षि कहते हैं।सब प्रकार के सम्भावित बुद्धि और हृदय के लोगों का वर्णन करके? और आत्मज्ञान के लिए सबको उपयुक्त साधना का विधान करने के पश्चात्? अब? भगवान् इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए कहते हैं? इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त करके अब तुम मेरा भजन करो। अर्जुन के निमित्त दिया गया उपदेश हम सबके लिए ही है क्योंकि यदि श्रीकृष्ण आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं? तो अर्जुन उस मनुष्य का प्रतिनिधि है? जो जीवन संघर्षों की चुनौतियों का सामना करने में अपने आप को असमर्थ पाता है।असंख्य विषय? इन्द्रियाँ और मन के भाव इनसे युक्त जगत् में ही हमें जीवन जीना होता है। ये तीनों ही सदा बदलते रहते हैं। स्वाभाविक ही? इन्द्रियों के द्वारा विषयोपभोग का सुख अनित्य ही होगा। और दो सुखों के बीच का अन्तराल केवल दुखपूर्ण ही होगा।आशावाद का जो विधेयात्मक और शक्तिप्रद ज्ञान गीता सिखाती है? उसी स्वर में? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि यह जगत् केवल दुख का गर्त या निराशा की खाई या एक सुखरहित क्षेत्र है।भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर अब उसको नित्य और आनन्दस्वरूप आत्मा की पूजा में प्रवृत्त होना चाहिए। इस साधना में अर्जुन को प्रोत्साहित करने के लिए भगवान् ने यह कहा है कि गुणहीन लोगों के विपरीत जिस व्यक्ति में ब्राह्मण और राजर्षि के गुण होते हैं? उसके लिए सफलता सरल और निश्चित होती है। इसलिए भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करो।हे मेरे प्रभु जब मुझे युद्धभूमि में शत्रुओं का सामना करना हो? तब मैं आपकी पूजा किस प्रकार कर सकता हूँ इस पर भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
How much more (easily) then the hold Brahmins and devoted royal saints (attain the goal); having come to this impermanent and unhappy world, do thou worship Me.
Transliteration
kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā
anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva māmअनुवाद
फिर पुण्यशाली ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों के विषय में तो कहना ही क्या है! इसलिए इस अनित्य और सुखरहित संसार को प्राप्त करके तुम मेरा ही भजन करो।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब अत्यंत पापी व्यक्ति भी अनन्य भक्ति से परम गति पा सकते हैं, तो पवित्र आचरण वाले ब्राह्मणों और राजर्षियों के उद्धार में तो कोई संशय ही नहीं है। वे इस भौतिक संसार को क्षणभंगुर और दुखों का घर बताते हुए अर्जुन को केवल ईश्वर की भक्ति में मन लगाने की प्रेरणा देते हैं।
Translation
How much more, then, the holy brāhmaṇas and devoted royal sages! Having come to this transient and joyless world, do worship Me.
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes that if even the most sinful can attain liberation through devotion, then the salvation of righteous priests and royal sages is absolutely certain. He describes this material world as temporary and full of misery, urging Arjuna to dedicate himself to divine worship.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| किम् | क्या |
| पुनः | फिर (कहना ही क्या) |
| ब्राह्मणाः | ब्राह्मण |
| पुण्याः | पवित्र / पुण्यशाली |
| भक्ताः | भक्त |
| राजर्षयः | राजर्षि (राजा और ऋषि) |
| तथा | तथा / और |
| अनित्यम् | क्षणिक / अनित्य |
| असुखम् | सुखरहित / दुखमय |
| लोकम् | संसार को |
| इमम् | इस |
| प्राप्य | प्राप्त करके |
| भजस्व | भजन करो |
| माम् | मुझको |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| kiṃ | what |
| punaḥ | more / again (to say) |
| brāhmaṇāḥ | the brāhmaṇas |
| puṇyāḥ | holy / righteous |
| bhaktāḥ | devotees |
| rājarṣayaḥ | royal sages |
| tathā | as well as / and |
| anityam | temporary / transient |
| asukham | joyless / miserable |
| lokam | world |
| imam | this |
| prāpya | having attained |
| bhajasva | worship / devote yourself |
| mām | unto Me |