Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.3
मूल श्लोक :
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे परंतप इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरेको प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बारबार जन्मतेमरते रहते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
नित्यसिद्ध आत्मा का अनादर करके जीने वाले लोग निश्चय ही नित्यस्वरूप मुझे प्राप्त न होकर संसार को लौटते हैं। बहिर्मुखी प्रवृत्ति के लोग सदैव विषयों का ही चिन्तन करके अपनी बौद्धिक क्षमता? मानसिक शक्ति और शारीरिक बल का अपव्यय करते हैं। विषयभोग के नित्य नवीन साधन खोजने में लगे हुए ये लोग मृत्युरूपी संसार में ही भ्रमण करते रहते हैं।जब मनुष्य विषयों का चिन्तन करके उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है तब उसे भोग प्राप्त तो हो जाते हैं? परन्तु वे सब अनित्य होने के कारण उनका अन्तिम परिणाम दुख ही होता है। और विडम्बना यह है कि वह फिर भी उनमें ही और अधिक आसक्त हो जाता है परमात्मा की अपरा प्रकृति का वह पूजक बन जाता है। कितना ही विशाल समुद्र क्यों न हो? उसमें से किसी भी स्थान से लिया गया प्रत्येक बूँद स्वाद में खारा ही होता है। इसी प्रकार? विषय प्रेम के पीछे हमारा कोई भी उद्देश्य क्यों न हो? एक बार विषयलोलुप हो जाने पर हम निश्चय ही दुख के खारे अश्रु पीने को बाध्य हो जाते हैं? क्योंकि अनित्यता? नश्वरता तो हमारे प्रेम के विषय का स्वरूप ही है। नामरूपमय यह जगत् परिच्छिन्न और नित्य परिवर्तनशील है। यहाँ प्रतिक्षण प्रत्येक वस्तु परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रही है? और प्रत्येक परिवर्तन वस्तु की पूर्व स्थिति की मृत्यु है। इस प्रकार? यहाँ भगवान् द्वारा प्रयुक्त मृत्यु शब्द को उसके व्यापक अर्थ में ग्रहण करना चाहिए। संक्षेप में? विषयलोलुप लोग सदैव दुखपूर्ण मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं।यद्यपि वेदान्तशास्त्र में श्रद्धा शब्द गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के आशय को भी सूचित करता है? तथापि यह श्रद्धा भावुकता के कोहरे पर निर्मित नहीं? वरन् सिद्धांत की युक्तियुक्तता के ज्ञान के स्थित प्रकाश पर स्थिर है। श्रीशंकराचार्य श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार देते हैं? शास्त्र और आचार्य के उपदेश को सत्यबुद्धि से ग्रहण करना श्रद्धा है जिसके द्वारा परमार्थ सत्य वस्तु की प्राप्ति होती है। श्रद्धा वह दृढ़ विश्वास है? जो हमें मन और बुद्धि से परे तत्त्व की ऊँचाई तक उठाता है? और र्मत्यपरिच्छिन्न जीव से अमृत स्वरूप अनन्त सत्य के गढ़ने में सहायक होता है।किसी वस्तु का धर्म वह कुछ होता है? जिसके बिना उस वस्तु का उस रूप में अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकता? जैसे अग्नि की उष्णता? बर्फ की शीतलता और सूर्य का प्रकाश। जिन लोगों को अपने दिव्य आत्मस्वरूप के अस्तित्व में श्रद्धा नहीं होती वे अपनी भावनाओं के कूजन? बुद्धि के गर्जन और देह की फुंकारों द्वारा बड़ी सरलता से आनन्दस्वरूप से अपहरण कर लिये जाते हैं। वे विकास की सीढ़ी से नीचे गिर कर द्विपाद पशुओं के समान जीवन जीते हैं। जैसे कोई विक्षिप्त (पागल) राजा अपने आप को भूलकर अपनी राजप्रतिष्ठा को धूल में मिला देता है? और फिर एक निराश्रित व्रात्य (आवारा) पुरुष के समान व्यवहार करता हुआ गलियों मे नग्नावस्था में घूम्ाता रहता है? वैसे ही यह जीव अज्ञानवश अपने आत्मस्वरूप की गरिमा को भूलकर विषयोपभोगांे की खुली नालियों में सुख को खोजता हुआ ऐसे घूमता है? मानो वह किसी नाली में रेंगने वाले काड़े से भी निकृष्ट हो।सरलता का आभास लिये हुए? यह श्लोक वास्तव में अत्यन्त सारगर्भित है। अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में ज्ञान के मार्ग का अज्ञान के मार्ग से भेद दर्शाकर? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की बुद्धि में ज्ञानमार्ग की उपादेयता को बैठा देते हैं। ज्ञानमार्ग अक्षर पुरुष की स्वानुभूति का मार्ग है।अब भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान का उपदेश देना प्रारम्भ करते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Those who have no faith in this Dharma (knowledge of the Self), O Parantapa (Arjuna), return to the path of this world of death without attaining Me.
Transliteration
aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa
aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmaniअनुवाद
हे परंतप! इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न करके मृत्यु रूपी संसार के चक्र में लौटते रहते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति के लिए श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है। जो लोग इस परम सत्य और भक्ति मार्ग में विश्वास नहीं रखते, वे ईश्वर को प्राप्त करने का अवसर खो देते हैं। परिणामस्वरूप, वे जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र में बार-बार लौटते रहते हैं।
Translation
O scorcher of enemies, those people who have no faith in this dharma, failing to attain Me, return to the path of the mortal world.
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes that faith is a vital prerequisite for spiritual progress. Those who lack faith in this sacred path of self-realization fail to attain the Divine. Consequently, they remain bound to the material world, repeatedly returning to the cycle of birth and death.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अश्रद्दधानाः | श्रद्धा रहित |
| पुरुषाः | मनुष्य |
| धर्मस्य | धर्म के |
| अस्य | इस |
| परन्तप | हे परंतप (अर्जुन) |
| अप्राप्य | न प्राप्त करके |
| माम् | मुझको |
| निवर्तन्ते | लौट आते हैं |
| मृत्युसंसारवर्त्मनि | मृत्यु रूपी संसार के मार्ग पर |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| aśraddadhānāḥ | those who are faithless |
| puruṣāḥ | people |
| dharmasya | of the dharma |
| asya | of this |
| parantapa | O chastiser of enemies (Arjuna) |
| aprāpya | without attaining |
| mām | Me |
| nivartante | return |
| mṛtyusaṃsāravartmani | on the path of the mortal world |