Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.26
मूल श्लोक :
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो भक्त पत्र? पुष्प? फल? जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है? उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार(भेंट) को मैं खा लेता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विश्व में कोई ऐसा धर्म नहीं है? जो भक्तों द्वारा ईश्वर को उपहार देने को मान्यता और प्रोत्साहन न देता हो। आधुनिक शिक्षित पुरुष को वास्तव में आश्चर्य होता है कि आखिर अनन्त परमात्मा को अपने दीपक के लिए तेल या एक मोमबत्ती या रहने के लिए मन्दिर या मस्जिद के रूप में एक घर जैसी क्षुद्र वस्तुओं की आवश्यकता क्यों होती है विपरीत धारणाओं के विष से विषाक्त हुई शुष्क व आनन्दहीन बुद्धि के लोग निर्लज्जतापूर्वक इसका भी आग्रह करने लगे हैं कि ईश्वर के इन घरों को अस्पताल? विद्यालय? मानसिक चिकित्सालय और प्रसूति गृहों में परिवर्तित कर देना चाहिए।परन्तु मेरा विश्वास है कि मैं ऐसे समाज को सम्बोधित कर रहा हूँ? जो कमसेकम अभी तो नैतिक पतन के अधोबिन्दु तक नहीं पहुँचा है। जिस समाज में अभी भी भावनापूर्ण स्वस्थ हृदय के विवेकशील लोग रहते हैं? वहाँ निश्चय ही मन्दिरों और पूजा की आवश्यकता है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि इन मन्दिरों में उनकी कलाकौशल पूर्ण रचना? कर्मकाण्ड का आडम्बर या स्वर्णाभूषणों की चमक और धन का प्रदर्शन उनकी सफलता के मूल कारण नहीं हैं। यहाँ तक कि प्रतिदिन वहाँ आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या पर भी उनकी सफलता निर्भर नहीं करती।इस श्लोक की प्रत्यक्ष भाषा और शैली ही यह स्पष्ट करती है कि विश्वपति भगवान् को इन भौतिक वस्तुओं का कोई मूल्य और महत्व नहीं है। वे अपने भक्त का वह प्रेम और भक्ति स्वीकार करते हैं जिससे प्रेरित होकर वह अल्प उपहार भगवान् को अर्पण करता है फिर अर्पित की हुई वस्तु चाहे पत्र? पुष्प? फल? या स्वर्ण मन्दिर हो? उसका महत्त्व नहीं भगवान् कहते हैं? शुद्धचित्त के उस भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पित वह उपहार मैं स्वीकार करता हूँ।इस श्लोक में विशेष रूप से चुनकर कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है जो त्याग और अर्पण के उस सिद्धांत को स्पष्ट करता है? जिस पर सभी धर्मों का आग्रह होता है। इसमें सन्देह नहीं है कि परमात्मा को अपना पूर्णत्व पूर्ण करने के लिए अथवा अनन्त वैभव को बनाये रखने के लिए भक्तों के उपहारों की आवश्यकता नहीं होती। भक्तगण अपने इष्ट देवता को कुछनकुछ अर्पण करना चाहते हैं? जो वास्तव में भगवान् के द्वारा निर्मित जगत् रूप उपवन की ही एक वस्तु होती है? जिसका भक्तजन उपयोग कर रहे थे। एक सार्वजनिक उपवन में भी कोई प्रेमी वहीं से फूल तोड़कर अपनी प्रेमिका को भेंट देता है। इसी प्रकार? भक्त भी भगवान् के ही उपवन से वस्तु चुराकर उन्हें ही पुन अर्पित करता है। विचार करने से ज्ञात होता है कि वास्तव में? भगवान् को कुछ भेंट देने का हमारा अभिमान कितना वृथा और खोखला है।फिर भी? ईश्वर की सब प्रकार की पूजाओं में उन्हें कुछ अर्पण करने का महत्त्वपूर्ण विधान है? जिसके पालन पर विशेष बल दिया जाता है। पत्रपुष्पादि अर्पण करते समय यदि भक्त यह समझता है कि वह उन वस्तुओं को ही समर्पित कर रहा है? तो वह इस विधान का ही दुरुपयोग कर रहा है। वह अर्पण के सिद्धांत को नहीं जानता है। यहाँ पुष्प आदि का प्रयोजन एक चम्मच के समान है। भोजन के समय हम चम्मच का उपयोग किसी खाद्य पदार्थ को मुँह तक ले जाने में करते हैं परन्तु भोजनोपरान्त चम्मच थाली में ही रखा रहता है। बगीचे में या मन्दिर में फूलफल आदि रहते ही हैं परन्तु जब एक भक्त उन्हें तोड़कर भगवान् को अर्पण करता है तब वे उसके प्रेम और समर्पण को व्यक्त करने के माध्यम बन जाते हैं।यही बात भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि? शुद्ध बुद्धि के भक्त द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पित वस्तु को मैं स्वीकार करता हूँ।इसलिए भगवान को कुछ अर्पण करने की क्रिया प्रभावपूर्ण होने के लिए दो बातों की आवश्यकता है (क) वह उपहार भक्तिपूर्वक अर्पण किया गया हो तथा (ख) वह शुद्ध बुद्धि के भक्त द्वारा अर्पण किया गया हो। इन दोनों बातों के बिना अर्पण केवल आर्थिक अपव्यय है और अन्धश्रद्धा तथा मिथ्याविश्वास है। यदि उसका उचित अनुसरण किया जाय तो आत्मविकास के आध्यात्मिक मार्ग के लिए उपयुक्त वाहन बन जाता है।इसलिए --
English Translation By Swami Sivananda
Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit or a little water that, so offered devotedly by the pure-minded, I accept.
Transliteration
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati
tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥअनुवाद
जो कोई भक्त मुझे प्रेमपूर्वक एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध बुद्धि वाले निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक भेंट किया हुआ वह उपहार मैं स्वीकार करता हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति की सुगमता और उसकी महिमा का वर्णन कर रहे हैं। भगवान को प्रसन्न करने के लिए किसी बहुमूल्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है, बल्कि केवल सच्ची भक्ति और प्रेम की आवश्यकता है। यदि कोई अत्यंत साधारण वस्तु जैसे पत्ता, फूल, फल या केवल जल भी प्रेम से अर्पित करता है, तो भगवान उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।
Translation
Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or water—that offering of the pure-hearted self-controlled devotee, offered with love, I accept
Meaning
In this verse, Lord Krishna emphasizes the simplicity and universality of devotion. He explains that He does not require expensive or elaborate offerings; rather, He values the love and devotion behind the offering. Even the simplest things like a leaf, flower, fruit, or water are accepted by Him with joy if offered with a pure and loving heart.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पत्रम् | पत्ता |
| पुष्पम् | फूल |
| फलम् | फल |
| तोयम् | जल |
| यः | जो |
| मे | मुझे |
| भक्त्या | भक्ति से / प्रेमपूर्वक |
| प्रयच्छति | अर्पित करता है |
| तत् | उस |
| अहम् | मैं |
| भक्ति-उपहृतम् | भक्तिपूर्वक भेंट किए गए उपहार को |
| अश्नामि | ग्रहण करता हूँ / खाता हूँ |
| प्रयत-आत्मनः | शुद्ध अंतःकरण वाले (भक्त) का |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| patram | a leaf |
| puṣpam | a flower |
| phalam | a fruit |
| toyam | water |
| yaḥ | whoever |
| me | to Me |
| bhaktyā | with devotion |
| prayacchati | offers |
| tat | that |
| aham | I |
| bhakti-upahṛtam | offered with devotion |
| aśnāmi | accept / eat |
| prayata-ātmanaḥ | of the pure-minded / self-controlled person |