श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग

Bhagavad Gita 9.23

मूल श्लोक :

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुन्तीनन्दन जो भी भक्त (मनुष्य) श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं? वे भी करते तो हैं मेरी ही पूजन? पर करते हैं अविधिपूर्वक।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

विश्व के सभी लोग एक ही पूजास्थल पर पूजा नहीं करते। न केवल शारीरिक दृष्टि से यह असम्भव है? वरन् मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह तर्कसंगत नहीं है? क्योंकि सब लोगों की अभिरुचियाँ भिन्नभिन्न होती हैं।भक्तगण जब भिन्नभिन्न देव स्थानों पर पूजा करते हैं? तब ये एक ही चेतन सत्य की आराधना करते हैं? जो इस परिवर्तनशील सृष्ट जगत् का अधिष्ठान है। जब वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं? तब भी वे उस एक सनातन सत्य का ही आह्वान करते हैं? जो उनके इष्ट देवता के रूप में व्यक्त हो रहा है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि अनन्त सत्य एकमेव अद्वितीय है? जो भूत? वर्तमान और भविष्य काल तीनों में एक समान रहता है? तब यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी ऋषिमुनियों? साधुसन्तों? पैगम्बरों और अवतारों की उपाधियों में व्यक्त होने वाला आत्मचैतन्य एक ही है।सहिष्णुता हिन्दू धर्म का प्राण है। हम पहले भी विचार कर चुके हैं कि परमार्थ सत्य को अनन्तस्वरूप में स्वीकार करने वाले अद्वैती किस प्रकार सहिष्णु होने के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकते हैं। असहिष्णुता उस धर्म में पायी जाती है? जिसमें किसी देवदूत विशेष को ही ईश्वर के रूप में स्वीकारा जाता है। हिन्दुओं में भी प्राय भिन्नभिन्न पंथों एवं सम्प्रदायों के मतावलम्बी निर्दयता की सीमा तक कट्टर पाये जाते हैं। असभ्यता के कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं? जिनमें एक भक्त की यह धारणा होती है कि अन्य लोगों के देवताओं की निन्दा करना? अपने इष्ट देवता की स्तुति और भक्ति करना है  परन्तु इस प्रकार के मत विकृत? घृणित और अशिष्ट हैं? जिन्हें हिन्दू धर्मशास्त्र में कोई स्वीकृति नहीं है? और न ही ऋषियों द्वारा प्रवर्तित सांस्कृतिक परम्परा में उन्हें कोई स्थान प्राप्त है।उदार हृदय? करुणासागर? प्रेमस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं? ये भक्त भी वास्तव में मुझे ही पूजते हैं? यद्यपि वह पूजन अविधिपूर्वक है।बाह्य जगत् में व्यावहारिक जीवन की दृष्टि से इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि परमानन्दस्वरूप आत्मा की प्राप्ति को त्यागकर जो लोग सांसारिक विषयों की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करते हैं? वे भी आत्मकृपा का ही आह्वान करते हैं? परन्तु अविधिपूर्वक।अत्यन्त विषयोपभोगी पुरुष भी जब धन के अर्जन? रक्षण और व्यय की योजनाएं बनाता है? जिससे कि वह नित्य नवीन विषयों को प्राप्त कर उनको भोग सके? तब वह भी स्वयं में स्थित अव्यक्त क्षमताओं का ही आह्वान करता है। आत्मा के बिना कोई भी व्यक्ति न पापकर्म कर सकता है और न पुण्य कर्म। आत्महत्या जैसे कार्य में भी जीवनी शक्ति की आवश्यकता होती है? परन्तु शस्त्र उठाने में वह पुरुष आत्मचेतना का दुरुपयोग कर रहा होता है।इस सन्दर्भ में अविधिपूर्वक का अर्थ अज्ञानपूर्वक है? जिसका अन्तिम परिणाम दुख और विषाद् होता है? तथा साधक आत्मा के परम आनन्द से वंचित रह जाता है।इन भक्तों के पूजन को अविधिपूर्वक क्यों कहा गया है  इसके उत्तर में कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

Even those devotees who, endowed with faith, worship other gods, worship Me alone, O Arjuna, b the wrong method.

Transliteration

ye 'py anyadevatā bhaktā yajante śraddhayānvitāḥ
te 'pi mām eva kaunteya yajanty avidhipūrvakam

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! जो भी अन्य देवताओं के भक्त हैं और श्रद्धा से युक्त होकर उनका पूजन करते हैं, वे भी वास्तव में मेरा ही पूजन करते हैं, किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक (अज्ञानवश) होता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि परम सत्य केवल एक ही है। जो लोग अन्य देवी-देवताओं की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, वे भी परोक्ष रूप से परमेश्वर की ही पूजा कर रहे होते हैं क्योंकि सभी शक्तियां उन्हीं से आती हैं। परन्तु, क्योंकि वे इस परम सत्य को सीधे नहीं जानते, इसलिए उनकी यह पूजा अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञान और गलत विधि से की गई मानी जाती है।

Translation

O son of Kunti, even those devotees who worship other demigods with faith, they too worship Me alone, but they do so in an improper manner.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the ultimate unity of worship. Those who worship other deities with faith are indirectly worshipping the Supreme Lord Himself, as all powers emanate from Him. However, because they lack the direct knowledge of the Supreme Source, their worship is considered ‘avidhi-purvakam’—done without following the proper, direct method of realization.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
अपिभी
अन्य-देवताःअन्य देवताओं के
भक्ताःभक्त
यजन्तेपूजन करते हैं
श्रद्धयाश्रद्धा से
अन्विताःयुक्त होकर
तेवे
अपिभी
माम्मेरा
एवही
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र अर्जुन
यजन्तिपूजन करते हैं
अविधि-पूर्वकम्अविधिपूर्वक (अज्ञानवश)

Word by word

WordMeaning
yewho
apieven
anya-devatāḥof other deities
bhaktāḥdevotees
yajanteworship
śraddhayāwith faith
anvitāḥendowed
tethey
apialso
māmMe
evaalone
kaunteyaO son of Kunti
yajantiworship
avidhi-pūrvakamby an improper method