श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग

Bhagavad Gita 9.21

मूल श्लोक :

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं    क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना    गतागतं कामकामा लभन्ते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जिन्होंने तीनों वेदों के कर्मकाण्ड का अध्ययन किया हो और जो स्वर्गादि फल के प्रापक यज्ञयागादि के विधिविधान भी जानते हों? ऐसे लोग यदि सकाम भावना से श्रद्धापूर्वक उन कर्मों का अनुष्ठान करते हैं? तो वे  स्वर्ग लोक को प्राप्त हो कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगांे को भोगते हैं।सोम नामक एक लता होती है? जिसका दूधिया रस यज्ञ कर्म में प्रयोग किया जाता है और यज्ञ की समाप्ति पर अल्प मात्रा में तीर्थपान के समान इसे ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सोमपा शब्द से अभिप्राय यज्ञकर्म की समाप्ति से समझना चाहिए। सकाम भावना से किये गये ये यज्ञकर्म अनित्य फल देने वाले होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वर्ग को प्राप्त जीव पुण्य समाप्त होने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं।ऐसे अविवेकी कामी लोगों के प्रति भगवान् की अरुचि उनके इन शब्दों में स्पष्ट होती है कि वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान कर? भोगों की कामना करने वाले? बारम्बार (स्वर्ग को) जाते और (संसार को) आते हैं।परन्तु जो पुरुष निष्काम और तत्त्वदर्शी हैं? उनके विषय में भगवान् कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

They, having enjoyed the vast heaven, enter the world of mortals when their merit is exhausted; thus abiding by the injunctions of the ï1threeï1 (Vedas) and desiring (objects of) desires, they attain to the state of going and returning.

Transliteration

te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti
evaṃ trayīdharmamanuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante

अनुवाद

वे उस विशाल स्वर्गलोक का भोग करके, पुण्य के क्षीण होने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में बताए गए सकाम कर्मों का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना करने वाले लोग बार-बार आने-जाने (जन्म-मृत्यु) को प्राप्त होते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण सकाम कर्मों के फल की अनित्यता को स्पष्ट कर रहे हैं। जो लोग स्वर्ग की इच्छा से वैदिक अनुष्ठान करते हैं, वे पुण्य अर्जित कर स्वर्ग तो जाते हैं, परंतु वहाँ का सुख स्थायी नहीं है। पुण्य समाप्त होते ही उन्हें पुनः इस नश्वर संसार में जन्म लेना पड़ता है, जिससे वे जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसे रहते हैं।

Translation

Having enjoyed that vast heavenly world, they enter the mortal world when their merit is exhausted. Thus, conforming to the doctrine of the three Vedas and desiring desires, they obtain the state of going and returning.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the temporary nature of the rewards of fruitive activities. Those who perform Vedic rituals with the desire for heaven reach the celestial realms, but their enjoyment there is not permanent. Once their accumulated merits are exhausted, they must return to the mortal world, remaining trapped in the cycle of birth and death.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तेवे
तम्उस
भुक्त्वाभोगकर
स्वर्गलोकम्स्वर्गलोक को
विशालम्विशाल
क्षीणेनष्ट होने पर
पुण्येपुण्य के
मर्त्यलोकम्मृत्युलोक को
विशन्तिप्रवेश करते हैं
एवम्इस प्रकार
त्रयी-धर्मम्तीनों वेदों के धर्म का
अनुप्रपन्नाःशरण लेने वाले / पालन करने वाले
गत-आगतम्आने और जाने को (जन्म-मृत्यु को)
काम-कामाःभोगों की कामना करने वाले
लभन्तेप्राप्त करते हैं

Word by word

WordMeaning
tethey
tamthat
bhuktvāhaving enjoyed
svarga-lokamheavenly world
viśālamvast
kṣīṇeon being exhausted
puṇyemerit
martya-lokamthe mortal world
viśantithey enter
evamthus
trayī-dharmamthe doctrine of the three Vedas
anuprapannāḥfollowing / conforming to
gata-āgatamgoing and coming (repeated birth and death)
kāma-kāmāḥdesirers of desires
labhantethey obtain