Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.16
मूल श्लोक :
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 503) क्रतु मैं हूँ? यज्ञ मैं हूँ? स्वधा मैं हूँ? औषध मैं हूँ? मन्त्र मैं हूँ? घृत मैं हूँ? अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य? पवित्र? ओंकार? ऋग्वेद? सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता? धाता? माता? पितामह? गति? भर्ता? प्रभु? साक्षी? निवास? आश्रय? सुहृद्? उत्पत्ति? प्रलय? स्थान? निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
,इस श्लोक में उक्त विचार को इसके पूर्व भी एक प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया था। हवन क्रिया तथा उसमें प्रयुक्त विविध सामग्रियों के रूपक के द्वारा इस श्लोक में आत्मा की सर्वरूपता एवं सर्वात्मकता का बोध कराया गया है। कर्मकाण्ड में वर्णित कर्मानुष्ठान ही पूजाविधि है। वेदों में उपदिष्ट यज्ञ कर्म को क्रतु तथा स्मृतिग्रन्थों में कथित कर्म को ही यज्ञ कहा जाता है? जिसका अनुष्ठान महाभारत काल में किया जाता था। पितरों को दिया जाने वाला अन्न स्वधा कहलाता है। अर्जुन को यहाँ उपदेश में बताया गया है कि उपर्युक्त ये सब क्रतु आदि मैं ही हूँ।इतना ही नही वरन् यज्ञकर्म में प्रयुक्त औषधि? अग्नि में आहुति के रूप में अर्पित किया जाने वाला घी (आज्यम्)? अग्नि? कर्म में उच्चारित मन्त्र और हवन क्रिया ये सब विविध रूपों में आत्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। जब स्वर्ण से अनेक आभूषण बनाये जाते हैं? तब स्वर्ण निश्चय ही यह कह सकता है कि मैं कुण्डल हूँ? मैं अंगूठी हूँ? मैं कण्ठी हूँ? मैं इन सब की चमक हूँ आदि। इसी प्रकार? आत्मा ही सब रूपों का? घटनाओं आदि का सारतत्त्व होने के कारण भगवान् श्रीकृष्ण का उक्त कथन दार्शनिक बुद्धि से सभी पाठकों को स्वीकार्य होगा।और --
English Translation By Swami Sivananda
I am the Kratu; I am the Yajna; I am the offering (food) to the manes; I am the medicinal herbs and all the plants; I am the Mantra; I am also the Ghee or the melted butter; I am the fire; I am the oblation.
Transliteration
ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhā'hamahamauṣadham
mantro'hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutamअनुवाद
मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, पितरों को दिया जाने वाला अन्न (स्वधा) मैं हूँ, मैं ही ओषधि हूँ मंत्र मैं हूँ, घी मैं ही हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन की क्रिया भी मैं ही हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी सर्वव्यापकता का बोध करा रहे हैं। वे समझाते हैं कि सृष्टि में होने वाले सभी वैदिक और तांत्रिक अनुष्ठान, यज्ञ, और उनमें दी जाने वाली आहुतियाँ उन्हीं के स्वरूप हैं। यहाँ तक कि मंत्र, हविष्य (घी), अग्नि और हवन की संपूर्ण प्रक्रिया भी परमात्मा से भिन्न नहीं है।
Translation
I am the Vedic ritual, I am the sacrifice, I am the oblation to the ancestors, I am the healing herb I am the sacred mantra, I am the clarified butter, I am the fire, and I am the act of offering
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains His omnipresence to Arjuna by identifying Himself with all aspects of Vedic rituals. He states that He is the ritual, the sacrifice, the offering, the healing herb, the mantra, the clarified butter, the fire, and the act of offering itself. This emphasizes that everything in the cosmos, especially the sacred rites, is a manifestation of the Supreme Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अहम् | मैं |
| क्रतुः | वैदिक यज्ञ (क्रतु) |
| अहम् | मैं |
| यज्ञः | पंचमहायज्ञ (स्मार्त यज्ञ) |
| स्वधा | पितरों को दिया जाने वाला अन्न (स्वधा) |
| अहम् | मैं |
| अहम् | मैं |
| औषधम् | जड़ी-बूटी या अन्न (औषधि) |
| मन्त्रः | वैदिक मंत्र |
| अहम् | मैं |
| अहम् | मैं |
| एव | ही |
| आज्यम् | घृत (घी) |
| अहम् | मैं |
| अग्निः | हवन की अग्नि |
| अहम् | मैं |
| हुतम् | हवन की क्रिया (आहुति) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| aham | I |
| kratuḥ | the Vedic ritual |
| aham | I |
| yajñaḥ | the sacrifice |
| svadhā | the oblation to the ancestors |
| aham | I |
| aham | I |
| auṣadham | the healing herb or food |
| mantraḥ | the sacred chant |
| aham | I |
| aham | I |
| eva | indeed |
| ājyam | the clarified butter (ghee) |
| aham | I |
| agniḥ | the sacrificial fire |
| aham | I |
| hutam | the act of offering (oblation) |