Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.13
मूल श्लोक :
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
परन्तु हे पृथानन्दन दैवी प्रकृतिके आश्रित महात्मालोग मेरेको सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर अनन्यमनसे मेरा भजन करते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
किसी तर्क को समझाने के लिए प्राय भगवान् श्रीकृष्ण दो परस्पर विरोधी तथ्यों को एक स्थान पर ही बताने की शैली अपनाते हैं? जिससे एक दूसरे की पृष्ठभूमि में दोनों का स्पष्ट ज्ञान हो सके। प्रथम श्लोक में उन मोहित पुरुषों का वर्णन है? जो अपनी निम्न स्तर की प्रवृत्तियों का अनुकरण करते हैं। दूसरे श्लोक में उन महात्मा पुरुषों का चित्रण किया गया है? जो समस्त दिव्य गुणों से सम्पन्न होते हैं। झूठी आशाओं से मोहित होकर उनकी पूर्ति के लिए व्यर्थ के निकृष्ट कर्मों से थके हुए मूढ़ लोग विचार करने में सर्वथा भ्रमित और विचलित हो जाते हैं। ऐसे लोग जगत् की ओर देखने के दैवी दृष्टिकोण को खोकर अपने कर्मों में राक्षसी बन जाते हैं? और समस्त कालों में अपने कामुक और आसुरी स्वभाव का ही प्रदर्शन करते हैं। रावण की परम्परा वाले इन लोगों को ही यहाँ राक्षस और असुर कहा गया है।वर्तमान में किये गये कर्म मनुष्य के मन में अपनी वासनाएं उत्पन्न करते हैं? जिसके अनुरूप ही उस मनुष्य की इच्छाएं और विचार होते हैं। वृथा और निषिद्ध कर्मों से नकारात्मक वासनाओं की ही वृद्धि होती है जो मन्दबुद्धि पुरुष की बुद्धि की जड़ता को और अधिक स्थूल कर देती हैं। ज्ञानी की दृष्टि में? मिथ्यात्व और अशुद्धता की इस खाई में रहने वाला मनुष्य एक दैत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।राक्षसी संस्कृति के इन लोगों के विपरीत? दैवी स्वभाव के महात्मा पुरुष होते हैं। दूसरा श्लोक हमें दर्शाता है कि इन ज्ञानी पुरुषों का अनुभव और कर्म किस प्रकार का होता है। इन दोनों के दर्शाये अन्तर से आत्मोन्नति के साधक को चाहिए कि वे कर्मों में सही भावना और जगत् की ओर देखने के सही दृष्टिकोण को अपनायें।दैवी गुणों से सम्पन्न महात्मा पुरुष अनन्यभाव से मुझ अनन्त अमृतस्वरूप का ही साक्षात्कार चाहते हैं। वे जानते हैं कि मैं भूतमात्र का आदिकारण हूँ जो लोग मिट्टी को जानते हैं? वे मिट्टी के बने सभी घटों में मिट्टी को देख पाते हैं। इसी प्रकार? हिन्दू संस्कृति ऋ़े वे सच्चे सुपुत्र जो इस चैतन्य आत्मा को जगत् के आदिकारण के रूप में जानते हैं? समाज के अन्य व्यक्तियों को अपने समान ही देखते और उनका आदर करते हैं। सम्पूर्ण विश्व में इससे अधिक महान् और प्रभावशाली समाजवाद न कभी पढ़ाया गया है और न प्रचारित ही किया गया है। यदि वर्तमान पीढ़ी इस आध्यात्मिक समाजवाद को समझ नहीं पाती या पसंद नहीं करती हैं? जो कि वास्तव में विश्व की समस्त व्याधियों और बुराइयों की? एकमात्र रामबाण औषधि है? तो उसका कारण पूर्व के श्लोक में ही वर्णित है कि? लोग आसुरी और राक्षसी प्रकृति के वशात् मोहित हुए हैं।महात्मा पुरुष अनन्य भाव से आपको किस प्रकार भजते हैं
English Translation By Swami Sivananda
But the great souls, O Arjuna, partaking of My divine nature, worship Me with a single mind (with the mind devoted to nothing else), knowing Me as the imperishable source of beings.
Transliteration
mahātmānas tu māṃ pārtha daivīṃ prakṛtim āśritāḥ
bhajanty ananyamanaso jñātvā bhūtādim avyayamअनुवाद
हे पार्थ! दैवी प्रकृति के आश्रित महापुरुष तो मुझे सब भूतों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से भजते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो लोग आसुरी स्वभाव से मुक्त हैं और दैवी प्रकृति के आश्रित हैं, वे महापुरुष कहलाते हैं। वे कृष्ण को समस्त सृष्टि का आदि कारण और अविनाशी परमेश्वर जानकर अनन्य भाव से उनकी भक्ति करते हैं। उनका मन कभी भी भगवान से विचलित नहीं होता।
Translation
O Partha, the great souls, however, taking shelter of the divine nature, worship Me with single-minded devotion, knowing Me as the imperishable source of all beings.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the great souls (mahatmas) who are free from delusional, demoniac natures and are sheltered in the divine nature. Knowing Krishna as the primeval, imperishable source of all creation, they worship Him with undivided attention and single-minded devotion.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| महात्मानः | महापुरुष |
| तु | लेकिन |
| माम् | मुझको |
| पार्थ | हे अर्जुन |
| दैवीम् | दैवी |
| प्रकृतिम् | प्रकृति का |
| आश्रिताः | आश्रय लिए हुए |
| भजन्ति | भजते हैं |
| अनन्यमनसः | अनन्य मन से |
| ज्ञात्वा | जानकर |
| भूतादिम् | भूतों का आदि कारण |
| अव्ययम् | अविनाशी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mahātmānaḥ | the great souls |
| tu | but |
| mām | Me |
| pārtha | O Partha (Arjuna) |
| daivīm | divine |
| prakṛtim | nature |
| āśritāḥ | having taken shelter of |
| bhajanti | worship |
| ananya-manasaḥ | with undivided mind |
| jñātvā | knowing |
| bhūtādim | the source of all beings |
| avyayam | imperishable |