Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.11
मूल श्लोक :
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सातवें अध्याय में ब्रह्म की परा और अपरा प्रकृति का वर्णन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने यह घोषित किया था कि मूढ़ लोग? मेरे अव्यय और परम भाव को नहीं जानते हैं और परमार्थत अव्यक्तस्वरूप मुझको व्यक्त मानते हैं।इस अध्याय में स्वयं को सबकी आत्मा बताते हुए श्रीकृष्ण पुन उसी कठोर शब्द मूढ़ का प्रयोग उन लोगों की निन्दा के लिए करते हैं? जो तत्त्व को छोड़कर केवल रूप को ही पकड़े रहते हैं। मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मुझे किसी देह विशेष में ही स्थित मानते हैं प्रतिमा को ही भगवान् मानना या गुरु के शरीर को ही अनन्त परमात्मा समझना उसी प्रकार की त्रुटि या विपरीत ज्ञान है? जैसे घट को ही उसमें निहित वस्तु मान लेना है। मूर्ति तो उस इन्द्रिय अगोचर सूक्ष्म सत्य का मात्र प्रतीक है। भूखे या प्यासे होने पर केवल दूध की बोतल से खेलने से ही ताजगी अनुभव नहीं होती वास्तव में भूखे होने पर थाली पर चम्मच बजाने से कोई सन्तोष नहीं मिलता। प्रतीक को ही ध्येय समझने का अर्थ है साधन को ही साध्य मानने की गलती करना। ऐसी विपरीत धारणायें धार्मिक कट्टरता एवं असहिष्णुता को जन्म देती हैं जो लोगों में शत्रुता और ईर्ष्या के बीज बोती हैं। इन बीजों से? समय आने पर? केवल विपत्ति और नाश की फसल ही प्राप्त होती है यह सब कुछ विभिन्न धर्मावलम्बियों के अपनेअपने पाषाण के देवता? काष्ठ के बने प्रतीक और पीपल के बने भगवान् के नाम पर होता है खादी का तिरंगा कपड़ा राष्ट्रध्वज हो सकता है? परन्तु वह स्वयं मेरी मातृभूमि नहीं है परन्तु जब ध्वजारोहण के समय मैं अपना शीश झुकाता हूँ तो राष्ट्र के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करता हूँ वह ध्वज मेरे राष्ट्र की संस्कृति एवं महत्वाकांक्षाओं का पवित्र प्रतीक है।इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर इस श्लोक का अध्ययन करने पर वह अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है। भगवान् कहते हैं कि साधारण भक्तजन मुझे भूतमात्र के महेश्वर के रूप में नहीं जानते हैं और मनुष्य शरीर धारण करने पर मेरा अनादर करते हैं।क्यों ये मूढ़ लोग आत्मा का सम्यक् परिचय प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं उत्तर में कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Fools disregard Me, clad in human form, not knowing My higher Being as the great Lord of (all) beings.
Transliteration
avajānanti māṃ mūḍhā mānuṣīṃ tanumāśritam
paraṃ bhāvamajānanto mama bhūtamaheśvaramअनुवाद
मूर्ख लोग मेरे परम भाव को न जानते हुए, जो कि समस्त भूतों का महान ईश्वर है, मुझे मनुष्य शरीर धारण किए हुए मानकर मेरी अवहेलना करते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि अज्ञानी लोग उनके वास्तविक दिव्य स्वरूप को नहीं पहचान पाते। वे उन्हें केवल एक साधारण मनुष्य समझते हैं क्योंकि वे उनके भौतिक शरीर के परे उनके अविनाशी और सर्वोपरि ईश्वर रूप को जानने में असमर्थ होते हैं। यह अज्ञानता ही उन्हें भगवान का अनादर करने की ओर ले जाती है।
Translation
Fools deride Me when I descend in the human form, being ignorant of My supreme nature as the great Lord of all beings
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that ignorant people fail to recognize His divine nature. They mistake Him for an ordinary mortal because they cannot perceive His supreme, imperishable existence as the Lord of all creation. This lack of spiritual vision leads them to disregard and disrespect Him.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अवजानन्ति | अवहेलना करते हैं / तुच्छ समझते हैं |
| माम् | मुझको |
| मूढाः | मूर्ख लोग |
| मानुषीम् | मनुष्य की |
| तनुम् | शरीर को |
| आश्रितम् | धारण किए हुए |
| परम् | परम / दिव्य |
| भावम् | स्वभाव को / अस्तित्व को |
| अजानन्तः | न जानते हुए |
| मम | मेरे |
| भूत-महा-ईश्वरम् | समस्त प्राणियों के महान ईश्वर रूप को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| avajānanti | deride / disregard |
| mām | Me |
| mūḍhāḥ | the foolish |
| mānuṣīm | human |
| tanum | form / body |
| āśritam | assumed / sheltered in |
| param | supreme |
| bhāvam | nature / state |
| ajānantaḥ | not knowing |
| mama | My |
| bhūta-mahā-īśvaram | the great Lord of all beings |