Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.10
मूल श्लोक :
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्
हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्ततेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत्को रचती है। हे कुन्तीनन्दन इसी हेतुसे जगत्का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वेदान्त में? अकर्म आत्मा और क्रियाशील अनात्मा के सम्बन्ध को अनेक उपमाओं के द्वारा स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक उपमा इस संबंध रहित संबध के किसी एक पक्ष पर विशेष रूप से प्रकाश डालती है।सूर्य की किरणें जिन वस्तुओं पर पड़ती हैं? उन्हें उष्ण कर देती हैं? परन्तु बीच के उस माध्यम को नहीं? जिसमें से निकल कर वह उस वस्तु तक पहुँचती हैं। आत्मा भी अपने अनन्त वैभव में स्थित रहता है और उसके सान्निध्य से अनात्मा चेतनवत् व्यवहार करने में सक्षम हो जाता है। अनात्मा और प्रकृति पर्यायवाची शब्द हैं।किसी राजा के मन में संकल्प उठा कि आगामी माह की पूर्णिमा के दिन उसको एक विशेष तीर्थ क्षेत्र को दर्शन करने के लिए जाना चाहिये। अपने मन्त्री को अपना संकल्प बताकर राजा उस विषय को भूल जाता है। किन्तु पूर्णिमा के एक दिन पूर्व वह मन्त्री राजा के पास पहुँचकर उसे तीर्थ दर्शन का स्मरण कराता है। दूसरे दिन जब राजा राजप्रासाद के बाहर आकर यात्रा प्रारम्भ करता है? तब देखता है कि सम्पूर्ण मार्ग में उसकी प्रजा एकत्र हुई है और स्थानस्थान पर स्वागत द्वार बनाये गये हैं। राजा के इस तीर्थ दर्शन और वापसी के लिए विस्तृत व्यवस्था योजना बनाकर उसे सफलतापूर्वक और उत्साह सहित कार्यान्वित किया गया है। समस्त राजकीय अधिकारयों तथा प्रजाजनों ने अपनी सम्पूर्ण क्षमता और प्रयत्न को उड़ेल दिया है? जिससे राजा की तीर्थयात्रा सफल हो सके।इन समस्त उत्तेजनापूर्ण कर्मों में प्रत्येक व्यक्ति को कर्म का अधिकार और शक्ति राजा के कारण ही थी? परन्तु स्वयं राजा इन सब कार्यों में कहीं भी विद्यमान नहीं था। राजा की अनुमति प्राप्त होने से मन्त्री की आज्ञाओं का सबने निष्ठा से पालन किया। यदि केवल सामान्य नागरिक के रूप में वही मन्त्री यह प्रदर्शन आयोजित करना चाहता? तो वह कभी सफल नहीं हो सकता था। इसी प्रकार? आत्मा की सत्ता मात्र से प्रकृति कार्य क्षमता प्राप्त कर सृष्टि रचना की योजना एवं उसका कार्यान्वयन करने में समर्थ होती है।व्यष्टि की दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्धांत और अधिक स्पष्ट हो जाता है। आत्मा केवल अपनी विद्यमानता से ही मन और बुद्धि को प्रकाशित कर उनमें स्थित वासनाओं की अभिव्यक्ति एवं पूर्ति के लिए बाह्य भौतिक जगत् और उसके अनुभव के लिए आवश्यक ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को रचता है। मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है। यहाँ प्रकृति का अर्थ है अव्यक्त।नानाविध जगत् का यह नृत्य परिवर्तन एवं विनाश की लय के साथ आत्मा की सत्तामात्र से ही चलता रहता है। इसी कारण संसार चक्र घूमता रहता है। उपर्युक्त विचार का अन्तिम निष्कर्ष यही निकलता है कि आत्मा सदा अकर्त्ता ही रहता है। आत्मा के सान्निध्य से प्रकृति चेतनता प्राप्त कर सृष्टि का प्रक्षेपण करती है। उसकी सत्ता और चेतनता आत्मा के निमित्त से है? स्वयं की नहीं। आत्मा और अनात्मा? पुरुष और प्रकृति के मध्य यही सम्बन्ध है।स्तम्भ के ऊपर अध्यस्त प्रेत के दृष्टान्त में स्तम्भ और प्रेत के सम्बन्ध पर विचार करने से जिज्ञासु को पुरुष और प्रकृति का संबंध अधिक स्पष्टतया ज्ञात होगा।यदि? इस प्रकार? सम्पूर्ण जगत् का मूल स्वरूप नित्यमुक्त आत्मा ही है तो क्या कारण है कि समस्त जीव उसे अपने आत्मस्वरूप से नहीं जान पाते हैं इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Under Me as supervisor, Nature produces the moving and the unmoving; because of this, O Arjuna, the world revolves.
Transliteration
mayā'dhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram
hetunā'nena kaunteya jagadviparivartateअनुवाद
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में मेरी माया (प्रकृति) चराचर सहित समस्त सृष्टि की रचना करती है और इसी कारण से यह संसार चक्र घूमता रहता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि यद्यपि वे स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, फिर भी उनकी अध्यक्षता और इच्छा मात्र से ही प्रकृति (भौतिक शक्ति) सजीव और निर्जीव जगत का सृजन करती है। ईश्वर की यही परम सत्ता सृष्टि के चक्र को गतिमान रखती है। प्रकृति स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करती, बल्कि वह परमात्मा के अधीन होकर ही कार्य करती है।
Translation
O son of Kunti, under My supervision, material nature produces all moving and non-moving beings; for this reason, the universe revolves.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that although He remains unattached, material nature (prakriti) functions under His supreme supervision to create all animate and inanimate beings. It is by His divine will and presence that the cosmic cycle of creation, maintenance, and dissolution keeps revolving. Nature does not act independently, but operates under the direction of the Supreme Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मया | मेरे द्वारा |
| अध्यक्षेण | अध्यक्ष (स्वामी) रूप में |
| प्रकृतिः | भौतिक प्रकृति |
| सूयते | उत्पन्न करती है |
| स-चर-अचरम् | चर और अचर (सजीव और निर्जीव) सहित |
| हेतुना | कारण से |
| अनेन | इस |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन) |
| जगत् | संसार |
| विपरिवर्तते | चक्र की तरह घूमता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mayā | by Me |
| adhyakṣeṇa | as supervisor |
| prakṛtiḥ | material nature |
| sūyate | manifests / produces |
| sa-cara-acaram | with the moving and non-moving |
| hetunā | by the cause |
| anena | this |
| kaunteya | O son of Kunti |
| jagat | the universe |
| viparivartate | revolves |