Chapter 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
Bhagavad Gita 9.1
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले -- यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा? जिसको जानकर तू अशुभसे अर्थात् जन्ममरणरूप संसारसे मुक्त हो जायगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन में एक मुमुक्षु के लक्षण पाते हैं? जो वास्तव में आत्मोन्नति के द्वारा संसार के समस्त बंधनों का विच्छेदन करना चाहता है। उसे केवल किसी ऐसी सहायता की आवश्यकता है? जिससे कि उसे अपने साधन मार्ग की प्रामाणिकता का दृढ़ निश्चय हो सके। भगवान् कहते हैं कि वे अनसूयु अर्जुन को विज्ञान के सहित ज्ञान का अर्थात् सैद्धान्तिक ज्ञान तथा उसके अनुभव का उपदेश देंगे। असूया का अर्थ है गुणों में भी दोष देखना। अत अनसूयु का अर्थ है वह पुरुष जो असूया रहित है अथवा दोष दृष्टि रहित है। इस ज्ञान का प्रयोजन है? जिसे जानकर तुम अशुभ अर्थात् संसार बंधनों से मुक्त हो जाओगे।जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मनुष्य की अक्षमता का कारण यह है कि वह वस्तु और व्यक्ति अर्थात् जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करता है। फलत जीवनसंगीत के सुर और लय को वह खो देता है। अपने तथा बाह्य जगत् के वास्तविक स्वरूप को समझने का अर्थ है जगत् के साथ स्वस्थ एवं सुखवर्धक संबंध रखने के रहस्य को जानना। जो पुरुष इस प्रकार समष्टि के साथ एकरूपता पाने में सक्षम है? वही जीवन में निश्चित सफलता और पूर्ण विजय का भागीदार होता है।आन्तरिक विघटन के कारण अपने समय का वीर योद्धा अर्जुन एक विक्षिप्त पुरुष के समान व्यवहार करने लगा था। ऐसे पुरुष को जीवन की समस्यायें अत्यन्त गम्भीर? कर्तव्य महत् कष्टप्रद और स्वयं जीवन एक बहुत बड़ा भार प्रतीत होने लगता है। वे सभी लोग संसारी कहलाते हैं? जो जीवनइंजिन को अपने ऊपर से चलने देकर छिन्नभिन्न हो जाते हैं। इनके विपरीत? जो पुरुष इस जीवनइंजिन में चालक के स्थान पर बैठकर मार्ग के सभी गन्तव्यों को पार करके अपने गन्तव्य तक सुरक्षित पहुँचते हैं? वे आत्मज्ञानी? और सन्त ऋषि कहलाते हैं। यद्यपि आत्मज्ञानी का यह पद मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है? तथापि इस धरोहर का लाभ केवल वह विवेकी प्ाुरुष पाता है? जिसमें अपने जीवन पर विजय पाने का उत्साह और साहस होता है और जो इस पृथ्वी पर ईश्वर के समान रहता है सभी परिस्थितियों का शासक बनकर और जीवन की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में हँसता हुआ।जीवन जीने की इस कला के प्रति साधक के मन में रुचि और उत्साह उत्पन्न करने के लिए इस ज्ञान की स्तुति करते हुए भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said I shall now declare to thee who does not cavil, the greatest secret, the knowledge combined with experience (Self-realisation). Having known this thou shalt be free evil.
Transliteration
śrībhagavānuvāca
idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmyanasūyave
jñānaṃ vijñānasahitaṃ yajjñātvā mokṣyase'śubhātअनुवाद
श्रीभगवान् ने कहा — इस परम गोपनीय ज्ञान को, जो कि विज्ञान (अनुभव) सहित है, मैं तुम्हारे लिए कहूँगा जो ईर्ष्या-रहित हो, जिसे जानकर तुम इस संसार के अमंगल से मुक्त हो जाओगे।
भावार्थ
इस अध्याय के आरम्भ में भगवान कृष्ण अर्जुन को सबसे गोपनीय ज्ञान प्रदान करने की प्रतिज्ञा करते हैं। वे अर्जुन को ‘अनसूयु’ अर्थात् ईर्ष्या-रहित कहकर संबोधित करते हैं, क्योंकि केवल श्रद्धावान और द्वेष-रहित साधक ही इस परम सत्य को ग्रहण कर सकता है। यह ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि अनुभवजन्य विज्ञान से युक्त है, जो साधक को संसार के सभी दुखों और बंधनों से मुक्त कर देता है।
Translation
The Blessed Lord said: To you, who are free from malice, I shall now declare this most secret knowledge combined with realized experience, knowing which you shall be liberated from the evil of material existence.
Meaning
At the beginning of the ninth chapter, Lord Krishna promises to impart the most confidential knowledge to Arjuna. He addresses Arjuna as ‘anasūyu’ (one who is non-envious), indicating that only a seeker free from malice and full of faith is qualified to receive this supreme truth. This knowledge is not merely theoretical but is combined with direct realization (vijñāna), which ultimately liberates the soul from the miseries of material existence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रीभगवान् | श्री भगवान् |
| उवाच | बोले |
| इदम् | इस |
| तु | तो |
| ते | तुम्हारे लिए |
| गुह्यतमम् | अत्यंत गोपनीय |
| प्रवक्ष्यामि | मैं कहूँगा |
| अनसूयवे | ईर्ष्या-रहित के लिए |
| ज्ञानम् | ज्ञान को |
| विज्ञान-सहितम् | अनुभवजन्य ज्ञान (विज्ञान) सहित |
| यत् | जिसे |
| ज्ञात्वा | जानकर |
| मोक्ष्यसे | तुम मुक्त हो जाओगे |
| अशुभात् | अमंगल (संसार-बंधन) से |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī-bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| idam | this |
| tu | indeed |
| te | unto you |
| guhyatamam | most confidential |
| pravakṣyāmi | I shall declare |
| anasūyave | to one who is non-envious |
| jñānam | knowledge |
| vijñāna-sahitam | combined with realized knowledge |
| yat | which |
| jñātvā | knowing |
| mokṣyase | you will be released |
| aśubhāt | from the inauspicious (material existence) |