Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.7
मूल श्लोक :
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कोई भी धर्म तब तक समाज की निरन्तर सेवा नहीं कर सकता जब तक वह धर्मानुयायी लोगों को अपना व्यावहारिक दैनिक जीवन सफलतापूर्वक जीने की विधि और साधना का उपदेश नहीं देता। यहाँ एक ऐसी साधना बतायी गयी है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लागू होती है। इस सरल उपदेश के पालन से न केवल रहन सहन का स्तर बल्कि सम्पूर्ण जीवन का स्तर भी उच्च किया जा सकता है।अनेक लोग हैं जिन्हें सन्देह होता है कि मन को धर्म तथा व्यावहारिक जीवन में बाँटना किसी भी क्षेत्र में वास्तविक सफलता पाने में हानिकारक है। वास्तव में यह एक अविचारपूर्ण तर्क है। बहुत ही कम अवसरों पर व्यक्ति का मन पूर्णतया उसी स्थान पर होता है जहाँ वह काम कर रहा होता है। सामान्यतः मन का एक बड़ा भाग भय के भयंकर जंगलों में या ईर्ष्या की गुफाओं में या फिर असफलता की काल्पनिक सम्भावनाओं के रेगिस्तान में सदैव भटकता रहता है। इस प्रकार मन की सम्पूर्ण शक्ति का अपव्यय करने के स्थान पर भगवान् उपदेश देते हैं कि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सर्वोच्च लाभ पाने के इच्छुक और प्रयत्नशील पुरुष्ा को अपना मन शान्त और पावन सत्यस्वरूप में स्थिर करना चाहिए। ऐसा करने से वह अपनी सम्पूर्ण क्षमता को अपने कार्य के उपयोग में ला सकता है और इस प्रकार इह और पर दोनों ही लोकों में सर्वोच्च सम्मान का स्थान प्राप्त कर सकता है।हिन्दु धर्म में धर्म और जीवन परस्पर विलग नहीं हैं। एक दूसरे से विलग होने से दोनों ही नष्ट हो जायेंगे। वे परस्पर वैसे ही जुड़े हुए हैं जैसे मनुष्य का धड़ और मस्तक। वियुक्त होकर दोनों ही जीवित नहीं रह सकते। जीवन में आने वाली परीक्षा का घड़ियों में भी एक सच्चे साधक को चाहिए कि वह अपने मन के निरन्तर शुद्ध आत्मस्वरूप तथा विश्व के अधिष्ठान ब्रह्म में एकत्व भाव से स्थिर रखना सीखे। न तो यह कठिन है और न ही अनभ्यसनीय।रंगमंच पर राजा की भूमिका करते हुये एक अभिनेता को कभी यह विस्मृत नहीं होता कि शहर में उसकी एक पत्नी और पुत्र भी है। यदि अपनी यह पहचान भूलकर रंगमंच के बाहर भी वह राजा के समान व्यवहार करने लगे तो तत्काल ही उसे समाज के हित में किसी पागलखाने में भर्ती करा दिया जायेगा। परन्तु वह अपने वास्तविक व्यक्तित्व को जानता है इसलिए वह कुशल अभिनेता होता है। इसी प्रकार सदा अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक रहते हुए भी हम जगत् में बिना किसी बाधा के कार्य कर सकते हैं। इस ज्ञान में स्थित होकर कर्म करने से हमारी उपलब्धियों को विशेष आभा प्राप्त होती है और उसके साथ ही जीवन में आने वाली निराशा की घड़ी में उत्पन्न होने वाली मन की प्रतिक्रियाओं को हम शान्त और मन्द करने में समर्थ बनते हैं।वास्तविक अर्थ में एक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत पुरुष को कभी भी अपनी शिक्षा का विस्मरण नहीं होता। वह तो उसके जीवन का अंग बन जाती है। उसके आचार विचार और व्यवहार में शिक्षा की सुरभि का सतत निस्सरण होता रहता है। उसी प्रकार आत्मभाव में स्थित पुरुष के मन में सबके प्रति करुणा और प्रेम तथा कर्मों में निःस्वार्थ भाव होता है। यही वह रहस्य है जिसके कारण वैदिक सभ्यता ने अपने काल में सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया और वह भावी पीढ़ियों के सम्मान का पात्र बनी।भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जो पुरुष केवल धर्म प्रतिपादित फल के लिए युद्ध का जीवन जीते हुए भी मेरा स्मरण करता है उसका मन और बुद्धि मुझमें ही समाहित हो जाती है। अपने विचारों के अनुसार तुम बनोगे इस सिद्धांत के अनुसार तुम मुझे निःसन्देह प्राप्त होगे।आगे कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Therefore at all times remember Me only and fight. With mind and intellect fixed (or absorbed) in Me, thou shalt doubtessly come to Me alone.
Transliteration
tasmāt sarveṣu kāleṣu mām anusmara yudhya ca
mayy arpita-mano-buddhir mām evaiṣyasy asaṃśayamअनुवाद
इसलिए तुम सब समय में मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाला होकर तुम निस्संदेह मुझे ही प्राप्त होगे
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को कर्म और भक्ति के समन्वय का उपदेश दे रहे हैं। वे कहते हैं कि अपने कर्तव्य (युद्ध) का पालन करते हुए भी निरंतर ईश्वर का स्मरण किया जा सकता है। जब मनुष्य अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में समर्पित कर देता है, तो वह संसार में रहते हुए भी अंततः परमात्मा को ही प्राप्त होता है।
Translation
Therefore, at all times remember Me and fight With your mind and intellect absorbed in Me, you will surely come to Me alone, without doubt
Meaning
In this verse, Lord Krishna teaches Arjuna the synthesis of action and devotion. He explains that it is possible to perform one’s prescribed duty (fighting, in Arjuna’s case) while constantly remembering God. By dedicating both mind and intellect to the Divine, a person remains spiritually connected and ultimately attains Him without any doubt.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तस्मात् | इसलिए |
| सर्वेषु | सब |
| कालेषु | समयों में |
| माम् | मुझको |
| अनुस्मर | स्मरण करो |
| युध्य | युद्ध करो |
| च | और |
| मयि | मुझमें |
| अर्पित | अर्पण किए हुए |
| मनः | मन |
| बुद्धिः | और बुद्धि वाला (होकर) |
| माम् | मुझको |
| एव | ही |
| एष्यसि | प्राप्त होगे |
| असंशयम् | बिना किसी संशय के |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tasmāt | therefore |
| sarveṣu | at all |
| kāleṣu | times |
| mām | Me |
| anusmara | remember |
| yudhya | fight |
| ca | and |
| mayi | in Me |
| arpita | surrendered |
| manaḥ | mind |
| buddhiḥ | intellect |
| mām | to Me |
| eva | surely |
| eṣyasi | you shall come |
| asaṃśayam | without doubt |