श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.5

मूल श्लोक :

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है वह मेरेको ही प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

महर्षि व्यास वेदान्त के इस मूलभूत सिद्धांत पर बल देते हुए नहीं थकते कि कोई भी जीव किसी देह विशेष के साथ तब तक तादात्म्य किये रहता है जब तक उसे अपने इच्छित अनुभवों को प्राप्त करने में वह देह उपयोगी और आवश्यक होता है। एक बार यह प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर वह उस शरीर को सदा के लिए त्याग देता है। तत्पश्चात उस देह के प्रति न कोई कर्तव्य रहता है न सम्बन्ध और न ही कोई अभिमान। देह से विलग होने के समय जीव के मन में उस विषय के सम्बन्ध में विचार होंगे जिसके लिए वह प्रबल इच्छा या महत्वाकांक्षा रखता था  चाहे वह इच्छा किसी भी जन्म में उत्पन्न हुई हो। इस प्रकार की मान्यता युक्तियुक्त है। ध्यान और भक्ति की साधना मन को एकाग्र करने की वह कला है जिसमें ध्येय विषयक एक अखण्ड वृत्ति बनाए रखी जाती है। ऐसा साधक अन्तकाल में मुझ पर ही ध्यान करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है।मरण के पूर्व की जीव की यह अन्तिम प्रबल इच्छा उसकी भावी गति को निश्चित करती है। जो जीव अपने जीवन काल में केवल अहंकार और स्वार्थ का जीवन जीता रहा हो और देह के साथ तादात्म्य करके निम्न स्तर की कामनाओं को ही पूर्ण करने में व्यस्त रहा हो ऐसा जीव वैषयिक वासनाओं से युक्त होने के कारण ऐसे ही शरीर को धारण करेगा जिसमें उसकी पाशविक प्रवृत्तियाँ अधिक से अधिक सन्तुष्ट हो सकें।इसके विपरीत जब कोई साधक स्वविवेक से कामुक जीवन की व्यर्थता को पहचानता है और इस कारण स्वयं को उन बन्धनों से मुक्त करने के लिए आतुर हो उठता है तब देह त्याग के पश्चात् वह साधक निश्चित ही विकास की उच्चतर स्थिति को प्राप्त होता है। इसी युक्तियक्त एवं बुद्धिगम्य सिद्धांत के अनुसार वेदान्त यह घोषणा करता है कि मरणासन्न पुरुष की अन्तिम इच्छा उसके भावी शरीर तथा वातावरण को निश्चित करती है।इसलिए भगवान् यहाँ कहते हैं कि अन्तकाल में आगे जो पुरुष मेरा स्मरण करता हुआ देह त्यागता है वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।यह निश्चय केवल मेरे ही विषय में नहीं है वरन् --

English Translation By Swami Sivananda

And whosoever, leaving the body, goes forth remembering Me alone, at the time of death, he attains My Being: there is no doubt about this.

Transliteration

antakāle ca mām eva smaran muktvā kalevaram
yaḥ prayāti sa madbhāvaṃ yāti nāsty atra saṃśayaḥ

अनुवाद

और जो मनुष्य अंतकाल में भी मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर को छोड़कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति के महत्व को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जीवन के अंतिम क्षण में मनुष्य जिस भाव या स्वरूप का स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है। यदि कोई निरंतर अभ्यास द्वारा अंतकाल में केवल ईश्वर का स्मरण करता है, तो वह निश्चित रूप से परमधाम को प्राप्त करता है।

Translation

And whoever, at the time of death, leaves his body remembering Me alone, attains My being; of this there is no doubt.

Meaning

In this verse, Lord Krishna emphasizes the critical importance of one’s state of mind at the moment of death. He explains that whatever a person thinks of at the last moment determines their next destination. One who leaves the body while remembering Him alone is guaranteed to attain His divine nature, without any doubt.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अन्तकालेअंतकाल में (मृत्यु के समय)
चऔर
माम्मुझको
एवही
स्मरन्स्मरण करते हुए
मुक्त्वात्यागकर
कलेवरम्शरीर को
यःजो
प्रयातिजाता है (प्रयाण करता है)
सःवह
मद्भावम्मेरे भाव को (मेरे स्वरूप को)
यातिप्राप्त होता है
ननहीं
अस्तिहै
अत्रयहाँ (इस विषय में)
संशयःसंदेह

Word by word

WordMeaning
antakāleat the time of death
caand
māmMe
evaalone
smaranremembering
muktvāleaving
kalevaramthe body
yaḥwho
prayātigoes forth
saḥhe
madbhāvamMy nature
yātiattains
nanot
astithere is
atrahere (in this matter)
saṃśayaḥdoubt