श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.4

मूल श्लोक :

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देहमें अन्तर्यामीरूपसे मैं ही अधियज्ञ हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

परम अक्षर तत्त्व ब्रह्म है  ब्रह्म शब्द उस अपरिवर्तनशील और अविनाशी तत्त्व का संकेत करता है जो इस दृश्यमान जगत् का अधिष्ठान है। वही आत्मरूप से शरीर मन और बुद्धि को चैतन्य प्रदान कर उनके जन्म से लेकर मरण तक के असंख्य परिवर्तनों को प्रकाशित करता है।ब्रह्म का ही प्रतिदेह में आत्मभाव अध्यात्म कहलाता है। यद्यपि परमात्मा स्वयं निराकार और सूक्ष्म होने के कारण सर्वव्यापी है तथापि उसकी सार्मथ्य और कृपा का अनुभव प्रत्येक भौतिक शरीर में स्पष्ट होता है। देह उपाधि से मानो परिच्छिन्न हुआ ब्रह्म जब उस देह में व्यक्त होता है तब उसे अध्यात्म कहते हैं। श्री शंकाचार्य इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं प्रतिदेह में प्रत्यगात्मतया प्रवृत्त परमार्थ ब्रह्म अध्यात्म कहलाता है।मात्र उत्पादन ही कर्म नही है। उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने का आदेश दिया जा सकता है तथा केवल अधिक परिश्रम से उसे सम्पादित भी किया जा सकता है। यहाँ प्रयुक्त कर्म शब्द का तात्पर्य और अधिक गम्भीर सूक्ष्म और दिव्य है। बुद्धि में निहित वह सृजन शक्ति  वह सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति जिसके कारण बुद्धि निर्माण कार्य में प्रवृत्त होकर विभिन्न भावों का निर्माण करती है कर्म नाम से जानी जाती है। अन्य सब केवल स्वेद और श्रम है अर्जन और अपव्यय है स्मिति और गायन है सुबकन और रुदन है।नश्वर भाव अधिभूत है  अक्षर तत्त्व के विपरीत क्षर प्राकृतिक जगत् है जिसके माध्यम से आत्मा की चेतनता व्यक्त होने से सर्वत्र शक्ति और वैभव के दर्शन होते हैं। क्षर और अक्षर में उतना ही भेद है जितना इंजिन और वाष्प में रेडियो और विद्युत् में। संक्षेप में सम्पूर्ण दृश्यमान जड़ जगत् क्षर अधिभूत है। अध्यात्म दृष्टि से क्षर उपाधियाँ हैं  शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। पुरुष अधिदैव है। पुरुष का अर्थ है पुरी में शयन करने वाला अर्थात् देह में वास करने वाला। वेदान्तशास्त्र के अनुसार प्रत्येक इन्द्रिय मन और बुद्धि का अधिष्ठाता देवता है उनमें इन उपाधियों के स्वविषय ग्रहण करने की सार्मथ्य है। समष्टि की दृष्टि से शास्त्रीय भाषा में इसे हिरण्यगर्भ कहते हैं।इस देह में अधियज्ञ मैं हूँ  वेदों के अनुसार देवताओं के उद्देश्य से अग्नि में आहुति दी जाने की क्रिया यज्ञ कहलाती है। अध्यात्म (व्यक्ति) की दृष्टि से यज्ञ का अर्थ है विषय भावनाएं एवं विचारों का ग्रहण। बाह्य यज्ञ के समान यहाँ भी जब विषय रूपी आहुतियाँ इन्द्रियरूपी अग्नि में अर्पण की जाती हैं तब इन्द्रियों का अधिष्ठाता देवता (ग्रहण सार्मथ्य) प्रसन्न होता है जिसके अनुग्रह स्वरूप हमें फल प्राप्त होकर अर्थात् तत्सम्बन्धित विषय का ज्ञान होता है। इस यज्ञ का सम्पादन चैतन्य आत्मा की उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता। अत वही देह में अधियज्ञ कहलाता है।भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा यहाँ दी गयी परिभाषाओं का सूक्ष्म अभिप्राय या लक्ष्यार्थ यह है कि ब्रह्म ही एकमात्र पारमार्थिक सत्य है और शेष सब कुछ उस पर भ्रान्तिजन्य अध्यास है। अतः आत्मा को जानने का अर्थ है सम्पूर्ण जगत् को जानना। एक बार अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने के पश्चात् वह ज्ञानी पुरुष कर्तव्य अकर्तव्य और विधिनिषेध के समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। कर्म करने अथवा न करने में वह पूर्ण स्वतन्त्र होता है।जो पुरुष इस ज्ञान में स्थिर होकर अपने व्यक्तित्व के शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक स्तरों पर क्रीड़ा करते हुए आत्मा को देखता है वह स्वाभाविक ही स्वयं को उस दिव्य साक्षी के रूप में अनुभव करता है जो स्वइच्छित अनात्म बन्धनों की तिलतिल हो रही मृत्यु का भी अवलोकन करता रहता है।अन्तकाल में आपका स्मरण करता हुआ जो देहत्याग करता है उसकी क्या गति होती है

English Translation By Swami Sivananda

Adhibhuta (knowledge of the elements) pertains to My perishable Nature and the Purusha or the Soul is the Adhidaiva; I alone am the Adhiyajna here in this body, O best among the embodied (men).

Transliteration

adhibhūtaṃ kṣaro bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam
adhiyajño'hamevātra dehe dehabhṛtāṃ vara

अनुवाद

उत्पत्ति-विनाशशील समस्त पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (ब्रह्मा) अधिदैव हैं, और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूँ।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देते हुए अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ को स्पष्ट कर रहे हैं। वे बताते हैं कि भौतिक जगत के सभी परिवर्तनशील और नाशवान पदार्थ ‘अधिभूत’ हैं। समष्टि बुद्धि के अभिमानी हिरण्यमय पुरुष ‘अधिदैव’ हैं, और इस मानव शरीर के भीतर यज्ञों के भोक्ता रूप में स्वयं भगवान ही ‘अधियज्ञ’ के रूप में स्थित हैं।

Translation

The perishable existence is called Adhibhuta, the cosmic soul is Adhidaivata, and I alone am Adhiyajna here in this body, O best of the embodied beings.

Meaning

In this verse, Lord Krishna answers Arjuna’s questions by defining Adhibhuta, Adhidaivata, and Adhiyajna. He explains that all perishable physical entities constitute Adhibhuta, the cosmic soul (Purusha) is Adhidaivata, and He Himself, residing within the body of living beings, is Adhiyajna, the lord of all sacrifices.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अधिभूतम्अधिभूत (भौतिक जगत)
क्षरःनाशवान
भावःअस्तित्व / पदार्थ
पुरुषःपरम पुरुष (हिरण्यगर्भ)
और
अधिदैवतम्अधिदैव (दैवीय तत्व)
अधियज्ञःअधियज्ञ (यज्ञ का स्वामी)
अहम्मैं
एवही
अत्रयहाँ
देहेशरीर में
देहभृताम्देहधारियों में
वरश्रेष्ठ (हे अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
adhibhūtamthe physical manifestation
kṣaraḥperishable
bhāvaḥexistence
puruṣaḥthe cosmic soul
caand
adhidaivatamthe divine principle
adhiyajñaḥthe lord of sacrifice
ahamI
evaalone
atrahere
dehein the body
dehabhṛtāmof the embodied beings
varaO best