Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.28
मूल श्लोक :
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें यज्ञोंमें तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण इस पर बल देते हैं कि जिस पुरुष में कुछ मात्रा में भी योग्यता है उसको ध्यान का अभ्यास करना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में वेदाध्ययन यज्ञ तप और दान को करने में जो पुण्य फल कहा गया है उस फल को योगी प्राप्त करता है। इतना ही नहीं भगवान् विशेष रूप से बल देकर कहते हैं कि योगी उन फलों का उल्लंघन कर जाता है अर्थात् सर्वोच्च फल को प्राप्त होता है। ध्यानाभ्यास द्वारा व्यक्तित्व का संगठन उपर्युक्त यज्ञादि साधनों की अपेक्षा लक्षगुना अधिक सरलता एवं शीघ्रता से हो सकता है किन्तु यहाँ यह मानकर चलते हैं कि ध्यान के साधक में आवश्यक मात्रा में विवेक और वैराग्य दोनों ही हैं। सतत नियमपूर्वक ध्यान करने से इनका भी विकास हो सकता है।इस प्रकार जब योगी ध्यान साधना से निष्काम कर्म एवं उपासना का फल प्राप्त करता है और ध्यान की निरन्तरता बनाये रखता है तो वह सफलता के उच्चतर शिखर की ओर अग्रसर होता हुआ अन्त में इस आद्य अक्षर पुरुष स्वरूप मेरे परम धाम को प्राप्त होकर पुनः संसार को नहीं लौटता।conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवां अध्याय समाप्त होता है।अक्षरब्रह्मयोग का अर्थ है अक्षरब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग । इस अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन द्वारा किये गये प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात् अपनी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रयाणकाल में परम पुरुष का स्मरण करने वालों को अनन्त की प्राप्ति कैसे होती है इसका वर्णन किया है और अर्जुन को ईश्वर स्मरण करते हुए जीवनसंघर्षों की चुनौतियों का कुशलता से सामना करने का उपदेश दिया है।
English Translation By Swami Sivananda
Whatever fruit of merit is declared (in the scriptures) to accrue from (the study of) the Vedas, (the performance of) sacrifices, (the practice of) austerities, and gifts beyond all this goes the Yogi, having known this; and he attains to the Supreme Primeval (first or ancient) Abode.
Transliteration
vedeṣu yajñeṣu tapaḥsu caiva dāneṣu yatpuṇyaphalaṃ pradiṣṭam
atyeti tatsarvamidaṃ viditvā yogī paraṃ sthānamupaiti cādyamअनुवाद
वेदों के अध्ययन में, यज्ञों के अनुष्ठान में, तपस्याओं में और दान देने में जो भी पुण्यफल कहा गया है योगी इस रहस्य को जानकर उस सब से परे चला जाता है और परम आदि स्थान को प्राप्त करता है
भावार्थ
इस अध्याय के अंत में भगवान कृष्ण अर्जुन को भक्ति मार्ग की महिमा बताते हैं। वे कहते हैं कि वेदों के अध्ययन, यज्ञ, तप और दान आदि से जो भी पुण्य फल प्राप्त होते हैं, वे सभी अनित्य हैं। परंतु जो योगी इस अध्याय में बताए गए परमेश्वर के रहस्य को जान लेता है, वह इन सभी फलों को लांघकर सीधे भगवान के परम सनातन धाम को प्राप्त करता है।
Translation
Whatever meritorious fruit is declared to accrue from the study of the Vedas, from the performance of sacrifices, from austerities, and from charities the yogi, having known this, transcends all these and attains to the supreme, primeval Abode
Meaning
In this concluding verse of the eighth chapter, Lord Krishna highlights the supreme efficacy of spiritual knowledge and devotion. While Vedic studies, sacrifices, austerities, and charities yield meritorious results, they are temporary. The yogi who understands the truths of this chapter transcends all these finite rewards and directly attains the eternal, primeval abode of the Supreme Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वेदेषु | वेदों के अध्ययन में |
| यज्ञेषु | यज्ञों के अनुष्ठान में |
| तपःसु | तपस्याओं में |
| च | और |
| एव | भी |
| दानेषु | दानों में |
| यत् | जो |
| पुण्य-फलम् | पुण्य का फल |
| प्रदिष्टम् | कहा गया है |
| अत्येति | पार कर जाता है |
| तत् | उस |
| सर्वम् | सबको |
| इदम् | इस (रहस्य) |
| विदित्वा | जानकर |
| योगी | योगी |
| परम् | परम |
| स्थानम् | धाम को |
| उपैति | प्राप्त करता है |
| च | और |
| आद्यम् | आदि (सनातन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| vedeṣu | in the study of the Vedas |
| yajñeṣu | in the performances of sacrifices |
| tapaḥsu | in the practices of austerities |
| ca | and |
| eva | indeed |
| dāneṣu | in the giving of charities |
| yat | which |
| puṇya-phalam | fruit of merit |
| pradiṣṭam | is declared |
| atyeti | transcends |
| tat | that |
| sarvam | all |
| idam | this |
| viditvā | having known |
| yogī | the yogi |
| param | supreme |
| sthānam | abode |
| upaiti | attains |
| ca | and |
| ādyam | primeval |