श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.26

मूल श्लोक :

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

क्योंकि शुक्ल और कृष्ण -- ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्(प्राणिमात्र) के साथ सम्बन्ध रखनेवाली हैं। इनमेंसे एक गतिमें जानेवालेको लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गतिमें जाननेवालेको लौटना पड़ता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्वोक्त देवयान और पितृयान को ही यहाँ क्रमशः शुक्लगति और कृष्णगति कहा गया है। लक्ष्य के स्वरूप के अनुसार यह उनका पुनर्नामकरण किया गया है। प्रथम मार्ग साधक को उत्थान के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाता है तो अन्य मार्ग परिणामस्वरूप पतन की गर्त में ले जाता है। इन्हीं दो मार्गों को क्रमशः मोक्ष का मार्ग और संसार का मार्ग माना जा सकता है।मानव की प्रत्येक पीढ़ी में जीवन जीने के दो मार्ग या प्रकार होते हैं  भौतिक और आध्यात्मिक। भौतिकवादियों के अनुसार मानव की आवश्यकताएं केवल भोजन वस्त्र और गृह हैं। उनके मतानुसार जीवन का परम पुरुषार्थ वैषयिक सुखोपभोग के द्वारा शरीर और मन की उत्तेजनाओं को सन्तुष्ट करना ही है। केवल इतने से ही उनको सन्तोष हो जाता है। इससे उच्चतर तथा दिव्य आदर्श के प्रति न कोई उनकी रुचि होती है और न प्रवृत्ति। परन्तु अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले विवेकीजन अपने समक्ष आकर्षक विषयों को देखकर लुब्ध नहीं हो जाते। उनकी बुद्धि अग्निशिखा के समान सदा उर्ध्वगामी होती है जो सतही जीवन में उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की खोज में रमण करती है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये दोनों ही मार्ग सनातन हैं और अनादिकाल से इन पर चलने वाले दो भिन्न प्रवृत्तियों के लोग रहे हैं। व्यापक अर्थ की दृष्टि से इन दोनों का सम्मिलित रूप ही संसार है। परन्तु वेदान्त का सिद्धांत है कि जीव संसार दुःख से निवृत्त हो सकता है। यह ऋषियों का प्रत्यक्ष अनुभव है।एक साधक की दृष्टि से विचार करने पर इस श्लोक में सफल योगी बनने के लिए दिये गये निर्देश का बोध हो सकता है। कभीकभी साधना काल में मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण साधक विषयों की ओर आकर्षित होकर उनमें आसक्त हो जाता है। ऐसे क्षणों में न हमें स्वयं को धिक्कारने की आवश्यकता है और न आश्चर्य मुग्ध होने की। भगवान् स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के मन में उच्च जीवन की महत्वाकांक्षा और निम्न जीवन के प्रति आकर्षण इन दोनों विरोधी प्रवृत्तियों में अनादि काल से कशिश चल रही है। धैर्य से काम लेने पर निम्न प्रवृत्तियों पर हम विजय प्राप्त कर सकते हैं।इन दो मार्गों तथा उनके सनातन स्वरूप को जानने का निश्चित फल क्या है

English Translation By Swami Sivananda

The bright and the dark paths of the world are verily thought to be eternal; by the one (the bright path) a man goes not to return and by the other (the dark path) he returns.

Transliteration

śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate
ekayā yātyanāvṛttimanyayā'vartate punaḥ

अनुवाद

क्योंकि जगत के ये दो मार्ग — शुक्ल और कृष्ण — सनातन माने गए हैं। एक के द्वारा मनुष्य वापस न लौटने वाली परम गति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा पुनः वापस लौटता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण ब्रह्मांड के दो शाश्वत मार्गों, शुक्ल (प्रकाश का मार्ग) और कृष्ण (अंधकार का मार्ग) का वर्णन करते हैं। शुक्ल मार्ग ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है, जिससे जीव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है। इसके विपरीत, कृष्ण मार्ग सकाम कर्मों और अज्ञान का मार्ग है, जो जीव को पुनः मृत्युलोक में वापस ले आता है।

Translation

For these two paths of the world — the bright and the dark — are considered eternal. By the one, a person goes to non-return; by the other, he returns again.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the two eternal paths of the universe, the bright (shukla) and the dark (krishna). The path of light leads to liberation and non-return to the material world, whereas the path of darkness leads to rebirth and return to the cycle of samsara. These paths represent the spiritual journey of knowledge versus the ritualistic journey of material desires.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
शुक्ल-कृष्णेशुक्ल (प्रकाशमय) और कृष्ण (अंधकारमय)
गतीदो मार्ग
हिनिश्चय ही
एतेये
जगतःजगत के
शाश्वतेसनातन
मतेमाने गए हैं
एकयाएक के द्वारा (शुक्ल मार्ग से)
यातिजाता है
अनावृत्तिम्पुनः न लौटने की स्थिति को
अन्ययादूसरे के द्वारा (कृष्ण मार्ग से)
आवर्ततेलौट आता है
पुनःफिर से

Word by word

WordMeaning
śukla-kṛṣṇethe bright and the dark
gatītwo paths
hiindeed
etethese
jagataḥof the world
śāśvateeternal
mateare considered
ekayāby one
yātione goes
anāvṛttimto non-return
anyayāby the other
āvartatereturns
punaḥagain