Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.25
मूल श्लोक :
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्ततेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता रात्रिका अधिपति देवता कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है शरीर छोड़कर उस मार्गसे गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्ममरणको प्राप्त होता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पुनरावृत्ति के मार्ग को पितृयाण (पितरों का मार्ग) कहते हैं। इसका अधिष्ठाता देवता है चन्द्रमा जो जड़ पदार्थ जगत् का प्रतीक है। जो लोग उपासनारहित पुण्य कर्मों को जिनमें समाज सेवा तथा यज्ञयागादि कर्म सम्मिलित हैं करते हैं वे मरणोपरान्त पितृलोक को प्राप्त होते हैं जिसे प्रचलित भाषा में स्वर्ग कहते हैं। पुण्यकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त इस स्वर्गलोक में विषयोपभोग करने पर जब पुण्यकर्म क्षीण हो जाते हैं तब इन स्वर्ग के निवासियों को अपनी अवशिष्ट वासनाओं के अनुसार उचित शरीर को धारण करने के लिए पुनः संसार में आना पड़ता है। उस देह में ही उनकी वासनाएं व्यक्त एवं तृप्त हो सकती हैं।धूम रात्रि कृष्णपक्ष और दक्षिणायन ये सब पितृलोक प्राप्ति का मार्ग बताने वाले हैं।चन्द्रमा जड़ पदार्थ का प्रतीक और विषयोपभोग का अधिष्ठाता है। उसके अनुग्रह से कुछ काल तक स्वर्ग सुख भोगने के पश्चात् जीव को पुनः र्मत्यलोक में आना पड़ता है।संक्षेप में इन दो श्लोकों में यह बताया गया है कि निःश्रेयस की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील साधक परम लक्ष्य को प्राप्त होता है और भोग की कामना करने वाला पुरुष भोग के पश्चात् पुनः शरीर को धारण करता है जहाँ वह चाहे तो अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है।विषय का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Attaining to the lunar light by smoke, night time, the dark fortnight also, the six months of the southern path of the sun (the southern solstice), the Yogi returns.
Transliteration
dhūmo rātris tathā kṛṣṇaḥ ṣaṇ-māsā dakṣiṇāyanam
tatra cāndramasaṃ jyotir yogī prāpya nivartateअनुवाद
धूम, रात्रि, तथा कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छह महीने— इस मार्ग में प्रयाण करने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर वापस लौट आता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस मार्ग का वर्णन करते हैं जिसे ‘धूम मार्ग’ या ‘पितृयान’ कहा जाता है। जो योगी सकाम कर्मों में लगे रहते हैं और इस अंधकारमय मार्ग से शरीर त्यागते हैं, वे स्वर्गलोक या चंद्रलोक को प्राप्त करते हैं। वहाँ अपने पुण्यों का भोग करने के बाद, उन्हें पुनः इस मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ता है।
Translation
Smoke, night, as well as the dark fortnight, and the six months of the southern solstice— there, attaining the lunar light, the yogi returns.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the path of darkness, also known as the ‘Dhuma-marga’ or ‘Pitriyana’. Yogis who depart from the world during these times of darkness (smoke, night, dark fortnight, or the southern solstice) reach the lunar sphere. After enjoying the fruits of their pious actions there, they are bound to return to the mortal world.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| धूमः | धुआँ |
| रात्रिः | रात्रि |
| तथा | तथा |
| कृष्णः | कृष्णपक्ष |
| षण्मासाः | छह महीने |
| दक्षिणायनम् | दक्षिणायन के |
| तत्र | वहाँ (उस मार्ग में) |
| चान्द्रमसम् | चन्द्रमा की |
| ज्योतिः | ज्योति को |
| योगी | योगी |
| प्राप्य | प्राप्त करके |
| निवर्तते | लौट आता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| dhūmaḥ | smoke |
| rātriḥ | night |
| tathā | as well as |
| kṛṣṇaḥ | the dark fortnight |
| ṣaṇ-māsāḥ | the six months |
| dakṣiṇāyanam | of the southern solstice |
| tatra | there |
| cāndramasam | lunar |
| jyotiḥ | light |
| yogī | the yogi |
| prāpya | attaining |
| nivartate | returns |