श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.24

मूल श्लोक :

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता दिनका अधिपति देवता शुक्लपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले उत्तरायणका अधिपति देवता है शरीर छोड़कर उस मार्गसे गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माजीके साथ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक में क्रममुक्ति के मार्ग को दर्शाया गया है। वेदप्रतिपादित कर्म एवं उपासना के समुच्चय अर्थात् दोनों का साथसाथ अनुष्ठान करने वाले साधक और उसी प्रकार जिन लोगों को वर्तमान जीवन में ही ब्रह्म का साक्षात् अनुभव न हुआ हो ऐसे ब्रह्म के उपासक इस क्रममुक्ति के अधिकारी होते हैं। उपनिषदों के अनुसार ये साधक जन देह त्याग के पश्चात् देवयान (देवताओं के मार्ग) के द्वारा ब्रह्मलोक अर्थात् सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के लोक में प्रवेश करते हैं। वहाँ कल्प की समाप्ति तक दिव्य अलौकिक विषयों के आनन्द का अनुभव करके प्रलय के समय ब्रह्माजी के साथ वे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। उपनिषदों में प्रयुक्त शब्दों का उपयोग कर भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ देवयान को इंगित करते हैं। ऋषि प्रतिपादित तत्त्व ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये अध्यात्म दृष्टि से यह श्लोक विशेष अर्थपूर्ण है।अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष उत्तरायण के षण्मास  ये सब सूर्य के द्वारा अधिष्ठित देवयान को सूचित करते हैं। प्रश्नोपनिषद् में परम सत्य की सृष्टि से उत्पत्ति का वर्णन करते हुए इन मार्गों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। वहाँ गुरु बताते हैं कि सृष्टिकर्ता प्रजापति स्वयं सूर्य और चन्द्र बन गये। आकाश में दृश्यमान सूर्य और चन्द्र क्रमशः चेतन और जड़ तत्त्व के प्रतीक स्वरूप हैं।चेतन तत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करके जो सत्य का उपासक अपना जीवन जीता है वह मरण के समय भी जीवन पर्यन्त की गई उपासना के उपास्य (ध्येय) का ही चिन्तन और स्मरण करता है स्वाभाविक है कि ऐसा उपासक अपने उपास्य के लोक को प्राप्त होगा क्योंकि वृत्ति के अनुरूप व्यक्ति बनता है। सम्पूर्ण जीवन काल में रचनात्मक दैवी एवं विकासशील विचारों का ही चिन्तन करते रहने पर मनुष्य निश्चित ही वर्तमान शरीर का त्याग करने पर विकास के मार्ग पर ही अग्रसर होगा। इस मार्ग को अग्नि ज्योति दिन आदि शब्दों से लक्षित किया गया है। इस प्रकार उपनिषदों की अपनी विशिष्ट भाषा में ब्रह्म के उपासकों की मुक्ति का मार्ग उत्तरायण कहलाता है। क्रममुक्ति को बताने के लिए ऋषियों द्वारा प्रायः प्रयोग किये जाने वाले इस शब्द उत्तरायण में उपर्युक्त सभी अभिप्राय समाविष्ट हैं।इस मार्ग के विपरीत वह मार्ग जिसे प्राप्त करने पर पुनः संसार को लौटना पड़ता है उसका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

Fire, light daytime, the bright fortnight, the six months of the northern path of the sun (the northern solstice)  departing then (by these) men who know Brahman go to Brahman.

Transliteration

agnirjyotirahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam
tatra prayātā gacchanti brahma brahmavido janāḥ

अनुवाद

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीने — इस मार्ग से शरीर त्यागकर जाने वाले ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्म को प्राप्त होते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस मार्ग का वर्णन करते हैं जिससे जाने वाले योगी पुनः जन्म नहीं लेते। अग्नि, प्रकाश, दिन का समय, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने ज्ञान और प्रकाश के प्रतीक हैं। इस मार्ग से शरीर त्यागने वाले ब्रह्मज्ञानी पुरुष सीधे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

Translation

Fire, light, daytime, the bright fortnight, and the six months of the northern solstice — departing by this path, those who know Brahman attain Brahman

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the path of light from which a departing soul does not return to the cycle of rebirth. Fire, light, daytime, the waxing moon, and the northern solstice of the sun represent the path of illumination and knowledge. Those who have realized the Supreme Truth and depart during these auspicious times merge into the Supreme Brahman.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अग्निःअग्नि
ज्योतिःप्रकाश
अहःदिन
शुक्लःशुक्ल पक्ष (चंद्रमा का बढ़ता हुआ पक्ष)
षण्मासाःछह महीने
उत्तरायणम्सूर्य का उत्तरायण काल
तत्रउस (मार्ग) में
प्रयाताःप्रयाण करने वाले (शरीर छोड़ने वाले)
गच्छन्तिप्राप्त होते हैं
ब्रह्मपरब्रह्म को
ब्रह्मविदःब्रह्म को जानने वाले
जनाःमनुष्य

Word by word

WordMeaning
agniḥfire
jyotiḥlight
ahaḥdaytime
śuklaḥthe bright fortnight of the moon
ṣaṇ-māsāḥthe six months
uttarāyaṇamthe northern path of the sun
tatrathere (on that path)
prayātāḥthose who have departed
gacchantiattain
brahmathe Supreme Brahman
brahma-vidaḥknowers of Brahman
janāḥpeople