श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.23

मूल श्लोक :

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अभ्युदय और निःश्रेयस  ये वे दो लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपने जीवन में प्रयत्न करते हैं। अभ्युदय का अर्थ है  लौकिक सम्पदा और भौतिक उन्नति के माध्यम से अधिकाधिक विषयों के उपभोग के द्वारा सुख प्राप्त करना। यह वास्तव में सुख का आभास मात्र है क्योंकि प्रत्येक उपभोग के गर्भ में दुःख छिपा रहता है। निःश्रेयस का अर्थ है अनात्मबंध से मोक्ष। इसमें मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है जो सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठान है। इस स्वरूपानुभूति में संसारी जीव की समाप्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है।ये दोनों लक्ष्य परस्पर विपरीत धर्मों वाले हैं। भोग अनित्य है और मोक्ष नित्य एक में संसार का पुनरावर्तन है तो अन्य में अपुनरावृत्ति। अभ्युदय में जीवभाव बना रहता है जबकि ज्ञान में आत्मभाव दृढ़ बनता है। आत्मानुभवी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप का अखण्ड अनुभव करता है।यदि लक्ष्य परस्पर भिन्नभिन्न हैं तो उन दोनों की प्राप्ति के मार्ग भी भिन्नभिन्न होने चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वचन देते हैं कि वे उन दो  आवृत्ति और अनावृत्ति  मार्गों का वर्णन करेंगे।यहाँ काल शब्द का द्वयर्थक प्रयोग किया गया है। काल का अर्थ है प्रयाण काल और उसी प्रकार प्रस्तुत सन्दर्भ में उसका दूसरा अर्थ है मार्ग जिससे साधकगण देहत्याग के उपरान्त अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।प्रथम अपुनरावृत्ति का मार्ग बताते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

Now I will tell thee, O chief of Bharatas, the times departing at which the Yogis will return or not return.

Transliteration

yatra kāle tvanāvṛttimāvṛttiṃ caiva yoginaḥ
prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha

अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल में शरीर त्यागकर जाने वाले योगी वापस न लौटने वाली गति (मुक्ति) को और वापस लौटने वाली गति (पुनर्जन्म) को प्राप्त होते हैं, मैं उस काल (मार्ग) के विषय में कहूँगा

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को उन दो मार्गों या कालों के विषय में बताना शुरू कर रहे हैं, जिनसे होकर मृत्यु के बाद योगी परम गति या पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। यहाँ ‘काल’ शब्द का तात्पर्य केवल समय से नहीं, बल्कि उस समय के अधिष्ठाता देवों और उनके द्वारा प्रकाशित मार्गों से भी है। यह अगले श्लोकों में वर्णित होने वाले उत्तरायण और दक्षिणायन मार्गों की भूमिका है।

Translation

O best of the Bharatas, I shall now describe to you the times (and paths) departing in which yogis either do not return or return to this world

Meaning

In this verse, Lord Krishna begins to explain the two paths or times of departure, traveling along which yogis either attain liberation (non-return) or rebirth (return). The word ‘kala’ (time) here refers not just to chronological time, but also to the presiding deities of those times who guide the soul. This serves as an introduction to the paths of the sun’s northern and southern courses described in the subsequent verses.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यत्रजिस
कालेकाल में
तुतो
अनावृत्तिम्न लौटने वाली गति को
आवृत्तिम्लौटने वाली गति को
चऔर
एवही
योगिनःयोगी जन
प्रयाताःशरीर छोड़कर गए हुए
यान्तिप्राप्त होते हैं
तम्उस
कालम्काल को
वक्ष्यामिमैं कहूँगा
भरतर्षभहे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
yatrain which
kāletime
tuindeed
anāvṛttimnon-return (liberation)
āvṛttimreturn (rebirth)
caand
evaalso
yoginaḥthe yogis
prayātāḥhaving departed
yāntiattain
tamthat
kālamtime (path)
vakṣyāmiI shall describe
bharatarṣabhaO best of the Bharatas