श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.22

मूल श्लोक :

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पृथानन्दन अर्जुन सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है वह परम पुरुष परमात्मा अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

हिन्दुओं के उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उस साधन मार्ग को बताते हैं जिसके द्वारा उस परम पुरुष को प्राप्त किया जा सकता है जिसे अव्यक्त अक्षर कहा गया था। वह साधन मार्ग है  अनन्य भक्ति। परम पुरुष से भक्ति (निष्काम परम प्रेम) तभी वास्तविक और पूर्ण हो सकती है जब साधक भक्त स्वयं को शरीर मन और बुद्धि द्वारा अनुभूयमान जगत् से विरत और वियुक्त करना सीख लेता है। नित्य पारमार्थिक सत्य से प्रेम ही वह साधन है जिसके द्वारा मिथ्या वस्तु से वैराग्य होता है। प्रखर जिज्ञासा से अनुप्राणित हुई आत्मतत्त्व की खोज और फिर उसके साथ एकत्त्व की यह अनुभूति कि यह आत्मा मैं हूँ अनन्य भक्ति है जिसके विषय में यहाँ बताया गया है।ध्यानावस्थित मन के द्वारा जिस आत्मा की अनुभूति स्वस्वरूप के रूप में होती है उसे कोई परिच्छिन्न चेतन तत्त्व नहीं समझना चाहिए जो केवल एक व्यष्टि उपाधि में ही स्थित उसे चेतनता प्रदान कर रहा हो। यद्यपि आत्मा की खोज और अनुभव साधक अपने हृदय में करता है तथापि उसका ज्ञान यह होता है कि यह चैतन्य आत्मा सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान है। इस हृदयस्थ आत्मा का जगदधिष्ठान सत्य ब्रह्म के साथ एकता का निर्देश भगवान् श्रीकृष्ण इस वाक्य में देते हैं कि जिसमें भूतमात्र स्थित है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है वह पुरुष है।मिट्टी के बने सभी घट मिट्टी में ही स्थित होते हैं और उनके नाम रूपरंग और आकार विविध होते हुए भी एक ही मिट्टी उन सबमें व्याप्त होती है। सभी लहरें तरंगें फेन आदि समुद्र में ही स्थित होते हैं और समुद्र उन्हें व्याप्त किये रहता है। घटों के अन्तर्बाह्य उनका उपादान कारण (मूल स्वरूप) मिट्टी और लहरों में समुद्र होता है।शुद्ध चैतन्य स्वरूप ही वह सनातन सत्य है जिसमें अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है। किसी वस्त्र पर धागे से बनाये गये चित्र का अधिष्ठान कपास है जिसके बिना वह चित्र नहीं बन सकता था। शुद्ध चैतन्य तत्त्व वासनाओं के विविध सांचों में ढलकर अविद्या से स्थूल रूप को प्राप्त होकर असंख्य नामरूपमय जगत् के रूप में प्रतीत होता है। तत्पश्चात् सर्वत्र सब लोग विषयों को देखकर आकर्षित होते हैं उनकी कामना करते हैं उन्हें प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। जो पुरुष आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर लेता है वह यह समझ लेता है कि इस नानाविध सृष्टि का एक ही अधिष्ठान है जिसके अज्ञान से ही इस जगत् का प्रत्यक्ष हो रहा है। जीव अज्ञान के वश इसे ही सत्य समझ कर संसार के मिथ्या दुःखों से पीड़ित रहता है व्यक्त से अव्यक्त को लौटने के दो विभिन्न मार्गों को बताने के पश्चात् अब भगवान् अगले प्रकरण में साधकों द्वारा प्राप्त किये जा सकने वाले दो विभिन्न लक्ष्यों के भिन्नभिन्न मार्गों का वर्णन करते हैं। कोई साधक उस लक्ष्य को प्राप्त होते हैं जहाँ से संसार का पुनरावर्तन होता है तथा अन्य लक्ष्य वह है जिसे प्राप्त कर पुनः संसार को नहीं लौटना पड़ता।वे दो मार्ग कौन से हैं  भगवान् कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

That highest Purusha, O Arjuna, is attainable by unswerving devotion to Him alone within Whom all beings dwell and by Whom all this is pervaded.

Transliteration

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas-tv-ananyayā
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvam-idaṃ tatam

अनुवाद

हे पार्थ! वह परम पुरुष तो अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है, जिसके अंतर्गत सभी भूत (प्राणी) स्थित हैं और जिससे यह सब जगत व्याप्त है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि परम पुरुष (परमात्मा) को केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वह परमात्मा सर्वव्यापी है; समस्त चराचर प्राणी उसी के भीतर स्थित हैं और उसी के द्वारा यह संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त है। यह भक्ति मार्ग की सर्वोच्चता और ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

Translation

O Partha! That Supreme Purusha is attainable only by unswerving devotion, within whom all beings dwell and by whom all this universe is pervaded.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that the Supreme Divine Person (Purusha) can be attained only through unswerving, single-minded devotion. This Supreme Being is all-pervading; all living entities exist within Him, and the entire universe is permeated by Him. This highlights the path of devotion (bhakti) as the ultimate means to reach the omnipresent Divine.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पुरुषःपरम पुरुष
सःवह
परःपरम / श्रेष्ठ
पार्थहे पृथापुत्र (अर्जुन)
भक्त्याभक्ति के द्वारा
लभ्यःप्राप्त करने योग्य
तुतो / ही
अनन्ययाअनन्य (बिना किसी अन्य के)
यस्यजिसके
अन्तःस्थानिभीतर स्थित हैं
भूतानिसमस्त प्राणी
येनजिसके द्वारा
सर्वम्सब कुछ
इदम्यह (जगत)
ततम्व्याप्त है

Word by word

WordMeaning
puruṣaḥthe Supreme Person
saḥHe
paraḥthe Supreme
pārthaO son of Pritha (Arjuna)
bhaktyāby devotion
labhyaḥis attainable
tuindeed
ananyayāby unswerving / exclusive
yasyawithin whom
antaḥsthānisituated inside
bhūtāniall living beings
yenaby whom
sarvamall
idamthis (universe)
tatamis pervaded