Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.20
मूल श्लोक :
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
परन्तु उस अव्यक्त(ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विद्यालय की कक्षा में एक श्यामपट लगा होता है जिसका उपयोग एक ही दिन में अनेक अध्यापक विभिन्न विषयों को समझाने के लिए करते हैं। प्रत्येक अध्यापक अपने पूर्व के अध्यापक द्वारा श्यामपट पर लिखे अक्षरों को मिटाकर अपना विषय समझाता है। इस प्रकार गणित का अध्यापक अंकगणित या रेखागणित की आकृतियाँ खींचता है तो भूगोल पढ़ाने वाले अध्यापक नक्शों को जिनमें नदी पर्वत आदि का ज्ञान कराया जाता है। रासायन शास्त्र के शिक्षक रासायनिक क्रियाएँ एवं सूत्र समझाते हैं और इतिहास के शिक्षक पूर्वजों की वंश परम्पराओं का ज्ञान कराते हैं। प्रत्येक अध्यापक विभिन्न प्रकार के अंक आकृति चिह्न आदि के द्वारा अपने ज्ञान को व्यक्त करता है। यद्यप्ा सबके विषय आकृतियाँ भिन्नभिन्न थीं परन्तु उन सबके लिए उपयोग किया गया श्यामपट एक ही था।इसी प्रकार इस परिवर्तनशील जगत् के लिए भी जो कि अव्यक्त का व्यक्त रूप है एक अपरिवर्तनशील अधिष्ठान की आवश्यकता है जो सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। जब संध्याकाल में सब विद्यार्थी और शिक्षक अपने घर चले जाते हैं तब भी वह श्यामपट अपने स्थान पर ही स्थित रहता है। यह चैतन्य तत्त्व जो स्वयं इन्द्रिय मन और बुद्धि के द्वारा अग्राह्य होने के कारण अव्यक्त कहलाता है इस जगत् का अधिष्ठान है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण के इस कथन में इंगित किया गया है परन्तु इस अव्यक्त से परे अन्य सनातन अव्यक्त भाव है। इस प्रकार हम देखते है कि यहाँ व्यक्त सृष्टि के कारण को तथा चैतन्य तत्त्व दोनों को ही अव्यक्त कहा गया है। परन्तु दोनों में भेद यह है कि चैतन्य तत्त्व कभी भी व्यक्त होकर प्रमाणों का विषय नहीं बनता जबकि सृष्टि की कारणावस्था जो अव्यक्त कहलाती है कल्प के प्रारम्भ में सूक्ष्म तथा स्थूल रूप में व्यक्त भी होती है।अव्यक्त (वासनाएँ) व्यक्त सृष्टि की बीजावस्था है जिसे वेदान्त में अविद्या भी कहते हैं। अविद्या या अज्ञान स्वयं कोई वस्तु नहीं है किन्तु अज्ञान किसी विद्यमान वस्तु का ही हो सकता है। किसी मनुष्य को अपनी पूँछ का अज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि पूँछ अभावरूप है। इससे एक भावरूप परमार्थ सत्य का अस्तित्व सिद्ध होता है। जैसे कक्षा में पढ़ाये गये विषय ज्ञान के लिए श्यामपट अधिष्ठान है वैसे ही इस सृष्टि के लिए यह चैतन्य तत्त्व आधार है। इस सत्य को नहीं जानना ही अविद्या है जो इस परिवर्तनशील नामरूपमय सृष्टि को व्यक्त करती है। पुनः पुनः सर्ग स्थिति और लय को प्राप्त होने वाली इस अविद्याजनित सृष्टि से परे जो तत्त्व है उसी का संकेत यहाँ सन्ाातन अव्यय भाव इन शब्दों द्वारा किया गया है।क्या यह अव्यक्त ही परम तत्त्व है अथवा इस सनातन अव्यय से परे श्रेष्ठ कोई भाव जीवन का लक्ष्य बनने योग्य है
English Translation By Swami Sivananda
But verily there exists, higher than this Unmanifested, another unmanifested Eternal, which is not destroyed when all beings are destroyed.
Transliteration
paras tasmāt tu bhāvo 'nyo 'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ
yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyatiअनुवाद
परन्तु उस अव्यक्त से भी परे दूसरा सनातन अव्यक्त भाव है जो सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को परम सत्य के बारे में बता रहे हैं। ब्रह्मा के दिन और रात के चक्र से परे एक और सनातन सत्ता है जो कभी नष्ट नहीं होती। जब प्रलय काल में सभी भौतिक प्राणी और लोक नष्ट हो जाते हैं, तब भी वह दिव्य परम धाम और परम पुरुष सदा स्थिर रहते हैं।
Translation
But beyond that unmanifested, there is another eternal unmanifested existence which, when all beings perish, does not perish
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that beyond the temporary unmanifested state of Brahma’s night, there exists another eternal unmanifested reality. This supreme spiritual realm and its Lord remain completely unaffected and do not perish even when all material elements and living beings are destroyed during the cosmic dissolution.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| परः | परे / श्रेष्ठ |
| तस्मात् | उससे |
| तु | परन्तु |
| भावः | अस्तित्व / भाव |
| अन्यः | दूसरा |
| अव्यक्तः | अव्यक्त |
| अव्यक्तात् | अव्यक्त से |
| सनातनः | सनातन / शाश्वत |
| यः | जो |
| सः | वह |
| सर्वेषु | सभी |
| भूतेषु | प्राणियों के |
| नश्यत्सु | नष्ट होने पर |
| न | नहीं |
| विनश्यति | नष्ट होता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| paraḥ | beyond / superior |
| tasmāt | from that |
| tu | but |
| bhāvaḥ | existence / nature |
| anyaḥ | another |
| avyaktaḥ | unmanifested |
| avyaktāt | from the unmanifested |
| sanātanaḥ | eternal |
| yaḥ | which |
| saḥ | that |
| sarveṣu | in all |
| bhūteṣu | beings |
| naśyatsu | being destroyed |
| na | not |
| vinaśyati | perishes |