Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.17
मूल श्लोक :
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो मनुष्य ब्रह्माके सहस्र चतुर्युगीपर्यन्त एक दिनको और सहस्र चतुर्युगीपर्यन्त एक रातको जानते हैं वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जाननेवाले हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
आइन्स्टीन के सापेक्षवाद ने एक रहस्योद्घाटन किया है जो कि अब पश्चिमी देशों में स्वीकृत हो चुका है। इस सिद्धांत के अनुसार देश और काल की कल्पनाएं उन व्यक्तिगत तत्त्वों पर निर्भर करती हैं जो इनके मापदण्ड के नियामक होते हैं। जब मन क्षुब्ध होता है तब समय भार मालूम पड़ता है और मन्दगति से बीत रहा प्रतीत होता है जैसे जब कोई व्यक्ति किसी की व्याकुलता या अत्यन्त उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा होता है किन्तु उसी व्यक्ति को समय उड़ता हुआ प्रतीत होता है जब वह विश्राम और सुखदायक परिस्थितियों में बैठा हो जहाँ उसका मनोरंजन हो रहा हो। ताश खेलने में मग्न पुरुष को रात कैसे व्यतीत हो गई इसका भान नहीं रहता और उषाकाल की सूर्य की किरणों को खिड़की में से आते देखकर उसे आश्चर्य होता है। मन के प्रतिकूल कार्य करना पड़े अथवा शरीर में पीड़ा हो तो एकएक क्षण युगों के समान जान पड़ता है। निद्रावस्था के एक अखण्ड अनुभव में काल की कोई कल्पना नहीं होती।उपर्युक्त घटनाओं के निरीक्षण से हिन्दू दार्शनिक इस युक्तियुक्त निष्कर्ष पर पहुँचे कि वास्तव में जिसे हम काल कहते हैं वह दो भिन्नभिन्न अनुभवों के मध्य के अन्तराल की गणना है। मन को क्षुब्ध करने वाले अनुभवों की संख्या जितनी ही अधिक होगी समय की गति मन्द अनुभव होगी। एक ही अनुभव यदि दीर्घकाल तक बना रहे तो समय तीव्र गति से व्यतीत होगा। केवल एक ही अनुभव में काल का अनुभव नहीं होता जैसे एक ही बिन्दु पर दूरी की गणना नहीं होती क्योंकि दो बिन्दुओं के मध्य अन्तराल की गणना से ही दूरी नापी जा सकती है। इस सिद्धांत के आधार पर काल की गणना करते हुए पौराणिक कवियों ने जो कहा कि देवताओं की घड़ियों के डायल बड़े होते हैं तो उनका कथन उपयुक्त ही है उपनिषदों में भी आनन्द की मीमांसा की गई है जिसमें एक मानवीय आनन्द को इकाई मानकर ब्रह्माजी तक के देवों को प्राप्त आनन्द की मात्रा की गणना की गई है। र्मत्यलोक से उच्चतर विभिन्न लोकों में आनन्द की मात्रा में वृद्धि उन लोकों में प्राप्त होने वाली मन की शान्ति एवं समता के तारतम्य को दर्शाती है।इस श्लोक में कहा गया है कि ब्रह्माजी का एक दिन एक सहस्र युगों का होता है तथा एक रात्रि भी उतनी ही दीर्घ होती है। युग से तात्पर्य कल्प से है। कालविदों ने जो यह गणना की है वह हमारे 365 दिनों के एक वर्ष की गणना के अनुसार है। चार युगों का एक कल्प होता है और ब्रह्माजी का एक दिन एक सहस्र कल्पों का माना गया है।जैसे व्यष्टि इकाइयाँ होंगी वैसे ही समष्टि होगी। व्यष्टि (एक) मन स्वेच्छा से अपनी सृष्टि की रचना करता है और उसका पोषण भी करता है। तत्पश्चात् उसे नष्ट कर देता है केवल पुनः नई सृष्टि रचने के लिए। सृष्टि और लय का यह निरन्तर कार्य मनुष्य केवल दिन में अर्थात् अपनी जाग्रत्अवस्था में ही करता है। इसी प्रकार यह माना जाता है कि समष्टि मन अर्थात् ब्रह्मा जी इस चराचर सृष्टि की रचना केवल उनकी जाग्रत् अवस्था में करते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
Those people who know the day of Brahma which is of a duration of a thousand Yugas (ages) and the night which is also of a thousand Yugas duration, they know day and night.
Transliteration
sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇo viduḥ
rātriṃ yugasahasrāntāṃ te'horātravido janāḥअनुवाद
ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसे सहस्र (हजार) महायुगों की अवधि वाला जो जानते हैं और रात्रि को भी हजार महायुगों की अवधि वाली जानते हैं, वे मनुष्य वास्तव में दिन और रात्रि के तत्त्व को जानने वाले हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण काल (समय) की विशालता का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि मानव गणना के अनुसार चार युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) का एक चक्र एक महायुग कहलाता है, और ऐसे एक हजार महायुग मिलकर ब्रह्मा का केवल एक दिन बनाते हैं। इतनी ही लंबी उनकी रात्रि भी होती है; जो ज्ञानी पुरुष इस काल-चक्र को समझते हैं, वे ही समय की वास्तविक सीमा को जानते हैं।
Translation
Those who know that the day of Brahmā lasts for a thousand mahā-yugas, and that his night also ends after a thousand mahā-yugas, are the people who truly know day and night.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the vastness of cosmic time. He explains that one day of Brahmā lasts for one thousand mahā-yugas (great cosmic cycles), and his night is of equal duration. Those who understand this immense scale of time are the ones who truly comprehend the nature of day and night, realizing the temporary nature of even the highest material realms.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सहस्र | हजार |
| युग | युगों की |
| पर्यन्तम् | अवधि वाला |
| अहः | दिन |
| यत् | जो |
| ब्रह्मणः | ब्रह्मा का |
| विदुः | जानते हैं |
| रात्रिम् | रात्रि को |
| युग | युगों के |
| सहस्र | हजार |
| अन्ताम् | अंत वाली (अवधि वाली) |
| ते | वे |
| अहोरात्र | दिन और रात के |
| विदः | ज्ञाता |
| जनाः | मनुष्य (हैं) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sahasra | thousand |
| yuga | ages (yugas) |
| paryantam | comprising / lasting up to |
| ahaḥ | day |
| yat | which |
| brahmaṇaḥ | of Brahmā |
| viduḥ | they know |
| rātrim | night |
| yuga | ages |
| sahasra | thousand |
| antām | ending with / lasting |
| te | they |
| ahorātra | day and night |
| vidaḥ | knowers of |
| janāḥ | people |