श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.16

मूल श्लोक :

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे अर्जुन ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

गीताचार्य श्रीकृष्ण की किसी सिद्धांत को बल देकर समझाने की अपनी विशेष पद्धति यह है कि वे उस सिद्धांत को उसके विरोधी तथ्य की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करते हैं। गीता में प्रायः इस पद्धति का उपयोग किया गया है। इस श्लोक में भी परस्पर दो विरोधी तथ्यों को एक साथ व्यक्त किया गया है जिससे कोई भी विद्यार्थी उन्हें तुलनात्मक दृष्टि से स्पष्ट समझ सकता है। प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि ब्रह्मलोक तक के सब लोक पुनरावर्ती हैं। इसके विपरीत जो पुरुष आत्मा का साक्षात अनुभव करते हैं वे मुझे प्राप्त होकर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।वेदान्त में क्रममुक्ति का एक सिद्धांत प्रतिपादित है। इसके अनुसार जो पुरुष वैदिक कर्म एवं उपासना का युगपत् (एक साथ) अनुष्ठान करता है वह कर्म और उपासना के इस समुच्चय के फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् सृष्टिकर्त्ता के लोक को प्राप्त करता है। यहाँ कल्प की समाप्ति पर ब्रह्मा जी के उपदेश से परब्रह्म के साथ एकरूप हो जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है। इस ब्रह्मलोक में भी मुक्ति का अधिकारी बनने के लिए उसे आत्मसंयम ब्रह्मा जी के उपदेश का पालन तथा आत्मविचार करना आवश्यक होता है। तभी अज्ञान जनित बन्धन से उसकी पूर्ण मुक्ति हो सकती है। जो जीव ब्रह्मलोक तक नहीं पहुँच पाते वे मोक्ष का आनन्द नहीं अनुभव कर सकते। कल्प की समाप्ति पर उन्हें अवशिष्ट कर्मों के अनुसार पुनः किसी देह विशेष को धारण करना पड़ता है। इसी सिद्धांत को दृष्टि में रखते हुए भगवान् कहते हैं कि ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों को प्राप्त हुए जीवों को पुनः जन्म लेना पड़ता है। किन्तु ब्रह्मलोक को प्राप्त करने पर अधिकारी जीव मुक्त हो जाता है।परन्तु वर्तमान जीवन में ही जिन्होंने अपने वास्तविक नित्य स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर लिया है वे एक सर्वव्यापी आत्मस्वरूप मुझे प्राप्त होकर पुनः संसार को प्राप्त नहीं होते। स्वप्न से जाग्रत अवस्था में आने पर जाग्रत पुरुष पुनः स्वप्न में प्रवेश नहीं करता जागने का अर्थ है सदा के लिए स्वप्न में अनुभव किये सुख और दुःख से मुक्त हो जाना। जाग्रत पुरुष को (मुक्त को) प्राप्त होकर साधक स्वप्न (संसार) को पुनः लौटता नहीं।

English Translation By Swami Sivananda

(All) the worlds including the world of Brahma are subject to return again, O Arjuna; but he who reaches Me, O son of Kunti, has no r

Transliteration

ābrahmabhuvanāllokāḥ punarāvartino'rjuna
māmupetya tu kaunteya punarjanma na vidyate

अनुवाद

हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझे प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि ब्रह्मांड के सर्वोच्च लोक, ब्रह्मलोक तक जाने वाले जीवों को भी अपने पुण्यों के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में लौटना पड़ता है। भौतिक सृष्टि के सभी लोक नाशवान और पुनरावृत्ति के चक्र से बंधे हैं। इसके विपरीत, जो परमेश्वर के दिव्य धाम को प्राप्त कर लेता है, वह जन्म-मृत्यु के इस चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

Translation

O Arjuna, from the realm of Brahma downwards, all worlds are subject to return but, O son of Kunti, upon reaching Me, there is no rebirth

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that all realms within the material universe, up to the highest planet of Brahma, are temporary and subject to the cycle of rebirth. Even those who reach these higher heavens must return to the earthly plane once their merits are exhausted. However, those who attain the Supreme Lord’s eternal abode transcend this cycle and are never reborn.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
आ-ब्रह्म-भुवनात्ब्रह्मलोक तक
लोकाःसभी लोक
पुनःफिर से
आवर्तिनःलौटने वाले स्वभाव वाले
अर्जुनहे अर्जुन
माम्मुझको
उपेत्यप्राप्त करके
तुपरन्तु
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र
पुनः-जन्मपुनर्जन्म
नहीं
विद्यतेहोता है

Word by word

WordMeaning
ā-brahma-bhuvanātup to the realm of Brahma
lokāḥthe worlds
punaḥagain
āvartinaḥsubject to return
arjunaO Arjuna
māmMe
upetyahaving attained
tubut
kaunteyaO son of Kunti
punaḥ-janmarebirth
nanot
vidyateexists