श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.15

मूल श्लोक :

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आत्मानुभूति के द्वारा ज्ञानी पुरुष को प्राप्त लाभ का मूल्यांकन करते हुए यहाँ कहा गया है कि मुझे प्राप्त कर महात्मा जन पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते। तत्त्व चिन्तक दार्शनिकों के अनुसार समस्त दुःखों का मूल है  पुनर्जन्म। श्रीकृष्ण भी यहाँ पुनर्जन्म को दुःखालय और अशाश्वत कहते हैं।भारतीय दर्शन के इतिहास में एक बात ध्यान देने योग्य है कि प्रारम्भ में अमृतत्त्व को जीवन का लक्ष्य माना जाता था परन्तु बाद में पुनर्जन्म के अभाव को लक्ष्य स्वीकार किया गया। मनुष्य को सब अनुभवों में मृत्यु का अनुभव सर्वाधिक भयानक प्रतीत होता है। यही कारण है कि प्रारम्भ में साधक का समस्त प्रयत्न और व्याकुलता इस अपरिहार्य मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए थी। जीवन की घटनाओं का सम्यक् अवलोकन और मूल्यांकन करने पर जैसेजैसे उसके ज्ञान में वृद्धि हुई और विचारों में परिपक्वता आयी तब शीघ्र ही अध्यात्म के विचारक ऋषियों ने यह पाया कि जो लोग यह समझ लेते हैं कि जीवन के अनुभवों में मृत्यु भी एक है तो उनके लिए मृत्यु की भयंकरता समाप्त हो जाती है। जीवन के अखण्ड अस्तित्व को मृत्यु काट नहीं सकती। सत्य के विषय में अत्यन्त निष्पक्ष एवं निर्मम भाव से विचार करने वाले ऋषिगण तर्क एवं अनुभव के द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि समस्त दुःख जन्म के साथ प्रारम्भ होते हैं। अतः जीवन का लक्ष्य पुनर्जन्म का अभाव होना चाहिए।पुनर्जन्म का स्वप्न और उसके अपरिहार्य कष्ट मिथ्या अहंकार अथवा जीव को ही होते हैं। अजन्मा आत्मा ही जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य से जीवभाव को प्राप्त होता है। बल्ब उपाधि में व्यक्त विद्युत् ही प्रकाश है उस बल्ब के फूट जाने पर कार्यरूप प्रकाश अपने कारणरूप विद्युत् में लीन हो जाता है जबकि विद्युत् एकमेव अद्वितीय सर्वत्र समान रूप से विश्व के सभी बल्बों में प्रकाशित होती है। इसी प्रकार अन्तःकरण की उपाधि से विशिष्ट अथवा परिच्छिन्न आत्मा ही जीव कहलाता है उसको ही जन्म वृद्धि व्याधि क्षय और मृत्यु के सम्पूर्ण दुःख और कष्ट सहने होते हैं। उपाधि के लय होने पर अर्थात् उससे हुए तादात्म्य के निवृत्त होने पर जीव अनुभव करता है कि वह स्वयं ही चैतन्य स्वरूप आत्मा है।आत्मज्ञानी पुरुष जानता है कि उसका मन और बुद्धि से कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है। जैसै जाग्रत् पुरुष का स्वप्न में देखे हुए पत्नी और पुत्रों से कोई सम्बन्ध नहीं होता ठीक वैसे ही आत्मस्वरूप के प्रति जाग्रत् होने पर अहंकार (जीव) अपने दुःखपूर्ण परिच्छिन्न जीवन के साथ ही समाप्त हो जाता है। ऐसे महात्मा जनों को इस जगत् में पुनर्जन्म लेकर दुःखों को भोगने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।जिस पुरुष ने जीवन पर्यन्त सतत आत्मानुसंधान की साधना से इन्द्रियों का संयम करना सीख लिया हो और मन को हृदय में तथा प्राण को बुद्धि में स्थापित कर लिया हो ऐसा पुरुष अनन्त नित्य स्वरूप को साक्षात् आत्मभाव से अनुभव करता है। तत्पश्चात् वह पुनः किसी देह विशेष में जन्म लेकर परिच्छिन्न विषयों में अनन्त सुख की व्यर्थ खोज नहीं करता।तब क्या ऐसे लोग हैं जो परा गति को प्राप्त न होकर पुनः जगत् को लौटते हैं  इस पर कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

Having attained Me these great souls do not again take birth (here) which is the place of pain 
and is non-eternal: they have reached the highest perfection (liberation).

Transliteration

mām upetya punarjanma duḥkhālayam aśāśvatam
nāpnuvanti mahātmānaḥ saṃsiddhiṃ paramāṃ gatāḥ

अनुवाद

मुझे प्राप्त करके, दुःख के स्थान और क्षणभंगुर पुनर्जन्म को वे महात्मा प्राप्त नहीं होते, जो परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जो भक्त अनन्य भाव से उन्हें प्राप्त कर लेते हैं, वे इस नश्वर और दुःखों से भरे संसार में पुनः जन्म नहीं लेते। वे परम गति या मोक्ष को प्राप्त कर चुके होते हैं। भौतिक जगत को यहाँ ‘दुःखालय’ (दुःखों का घर) और ‘अशाश्वत’ (क्षणभंगुर) कहा गया है, जिससे विरक्ति का भाव जाग्रत होता है।

Translation

Having attained Me, those great souls do not incur rebirth, which is temporary and an abode of miseries, having reached the supreme perfection

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that the great souls who reach Him are never again subjected to rebirth in this material world, which is described as temporary and full of misery. Having attained the ultimate perfection, they remain eternally in the divine realm. This highlights the contrast between the transient, painful nature of material existence and the eternal bliss of union with the Supreme.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
माम्मुझको
उपेत्यप्राप्त करके
पुनःफिर से
जन्मजन्म को
दुःख-आलयम्दुःखों के घर (स्थान)
अशाश्वतम्क्षणभंगुर (अस्थायी)
ननहीं
आप्नुवन्तिप्राप्त करते हैं
महात्मानःमहात्मा लोग (महान आत्माएँ)
संसिद्धिम्सिद्धि को
परमाम्परम (सर्वोच्च)
गताःप्राप्त हुए

Word by word

WordMeaning
māmMe
upetyahaving attained
punaḥagain
janmabirth
duḥkha-ālayamthe place of miseries
aśāśvatamtemporary
nanot
āpnuvantiattain
mahātmānaḥthe great souls
saṃsiddhimperfection
paramāmsupreme
gatāḥhaving reached