Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग
Bhagavad Gita 8.13
मूल श्लोक :
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो ँ़ इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है वह परमगतिको प्राप्त होता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
ध्यान के अभ्यास में मन को सफलता और कुशलतापूर्वक एकाग्र करने के लिए साधक को तीन कार्यों को सम्पादित करना होता है। इन तीनों का वर्णन इन श्लोकों में किया गया है जो उक्त क्रम में अभ्यसनीय है।(क) इन्द्रियों के द्वारा मन को संयमित करके इन्द्रिय अवयव स्थूल शरीर में स्थित हैं। श्रोत्र त्वचा चक्षु जिह्वा और घ्राणेन्द्रिय (नाक) ये वे पाँच द्वार हैं जिनके माध्यम से बाह्य विषयों की संवेदनाएं मन में प्रवेश करके उसे विक्षुब्ध करती हैं। विवेक और वैराग्य के द्वारा इन इन्द्रिय द्वारों को अवरुद्ध अथवा संयमित करना प्रथम साधना है जिसके बिना ध्यान में प्रवेश नहीं हो सकता। इनके द्वारा न केवल बाह्य विषय मन में प्रवेश करते हैं वरन् इन्हीं के माध्यम से मन बाह्य विषयों में विचरण एवं भ्रमण करता है। विक्षेपों की इन सुरंगों को अवरुद्ध करने पर नयेनये विक्षेपों का प्रवाह ही रुद्ध हो जाता है।(ख) मन को हृदय में स्थापित करके यद्यपि इन्द्रियों के संयमित होने पर मन बाह्य विषयों से क्षुब्ध नहीं हो सकता तथापि भूतकाल के विषयोपभोगों से अर्जित वासनाओं के स्मरण से वह स्वयं ही विक्षुब्ध हो सकता है। इसलिए मन को हृदय में स्थापित करने का उपदेश दिया गया है।वेदान्त में हृदय का अर्थ शरीर में स्थित रक्त संचालक अवयव से नहीं है। साहित्य और दर्शन में हृदय का अर्थ स्नेह और सहृदयता करुणा और कृपा भक्ति और प्रपत्ति जैसी आदर्श एवं रचनात्मक भावनाओं का अनवरत् उद्गम स्थल है। बाह्य स्थूल विषयों की संवेदनाओं का मन में प्रवेश अवरुद्ध करने के पश्चात् साधक को चाहिये कि वह भावनाओं के साधनरूप मन को दिव्य एवं पवित्र बनाये न कि उसका दमन करे। हृदय के उच्च और श्रेष्ठ वातावरण में ही मन को स्थिर करना चाहिये। इसका विवेचन किया जा चुका है कि रचनात्मक विचारों की सहायता से मन के विक्षेपों को न्यूनतम किया जा सकता है। नकारात्मक विचार वह है जिसके कारण मन क्षुब्ध और चंचल हो जाता है।(ग) प्राणशक्ति को मस्तक अर्थात् बुद्धि में स्थापित करने का अर्थ है बुद्धि को सभी निम्न स्तरीय विचारों एवं वस्तुओं से निवृत्त करना। विषय ग्रहण आदि के द्वारा बुद्धि का इनसे तादात्म्य रहता है। सतत आत्मानुसंधान की प्रक्रिया से बुद्धि को विषयों से परावृत्त किया जा सकता है। उपर्युक्त तीन कार्यों के सम्पन्न होने पर मन की आत्मानुसंधान में जो दृढ़ स्थिति होती है उसे ही यहाँ योगधारणा कहा गया है।जो साधक अपने आसपास के वैषयिक वातावरण को भूलकर आनन्द और संतोष से पूर्ण हृदय से मन को बुद्धि के अनुशासन में ला सकता है वह मन में ओंकार का उच्चारण सरलता और उत्साह के साथ कर सकता है। शान्त मन में उठ रहीं ओंकार वृत्तियों को जो साक्षी होकर देख सकता है वही पुरुष प्रणवोपासना के योग्य है। श्लोक की अगली पंक्ति इस तथ्य को स्पष्ट करती है।देह त्याग कर जो जाता है ँ़ के उच्चारण तथा उसके लक्ष्यार्थ पर मनन करने के फलस्वरूप साधक मिथ्या जड़ उपाधियों के साथ हुये अपने तादात्म्य से ऊपर उठ जाता है जिसके कारण अहंकार का लोप हो जाता है। यही वास्तविक मृत्यु है। देह त्याग का अभिप्राय है देहात्मभाव का त्याग। प्रणव के लक्ष्यार्थ पर ध्यान करते हुये साधक परम गति को प्राप्त होता है क्योंकि उसका लक्ष्यार्थ है सम्पूर्ण विश्व का वह अधिष्ठान जिस पर जन्म और मृत्यु का मनः कल्पित नाटक खेला जाता है।क्या ध्यानमार्ग पर चलने वाले सभी साधकों को आत्मसाक्षात्कार समानरूप से कठिन है भगवान् कहते हैं --
English Translation By Swami Sivananda
Uttering the one-syllabled Om the Brahman and remembering Me, he who departs, leaving the body, attains to the Supreme Goal.
Transliteration
om ity ekākṣaraṃ brahma vyāharan mām anusmaran
yaḥ prayāti tyajan dehaṃ sa yāti paramāṃ gatimअनुवाद
जो मनुष्य ‘ॐ’ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अंतकाल में प्राण त्यागने की विधि और उसके फल का वर्णन कर रहे हैं। जो साधक इंद्रियों को वश में करके, मन को हृदय में स्थिर कर, ‘ॐ’ नाम का उच्चारण करते हुए और परमात्मा का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है। यह अभ्यास जीवन भर के निरंतर ध्यान का परिणाम होता है।
Translation
He who departs from the body while uttering the single syllable ‘Om’—which is Brahman—and remembering Me, attains the supreme goal.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the method of departure at the time of death and its ultimate result. The seeker who restrains the senses, fixes the mind on the divine, utters the sacred syllable ‘Om’ (representing the absolute Brahman), and remembers the Supreme Lord while leaving the body, attains the highest spiritual destination. This state of final absorption is the culmination of lifelong practice and devotion.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ओम् | ॐ (प्रणव) |
| इति | इस प्रकार |
| एक-अक्षरम् | एक अक्षर रूप |
| ब्रह्म | ब्रह्म को |
| व्याहरन् | उच्चारण करता हुआ |
| माम् | मुझको (परमात्मा को) |
| अनुस्मरन् | निरन्तर स्मरण करता हुआ |
| यः | जो |
| प्रयाति | प्रयाण करता है (शरीर से बाहर जाता है) |
| त्यजन् | त्यागता हुआ |
| देहम् | शरीर को |
| सः | वह |
| याति | प्राप्त होता है |
| परमाम् | परम |
| गतिम् | गति को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| om | the sacred syllable Om |
| iti | thus |
| eka-akṣaram | the single syllable |
| brahma | Brahman (the Absolute) |
| vyāharan | uttering |
| mām | Me |
| anusmaran | remembering |
| yaḥ | who |
| prayāti | departs |
| tyajan | leaving |
| deham | the body |
| saḥ | he |
| yāti | attains |
| paramām | the supreme |
| gatim | destination |