श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.11

मूल श्लोक :

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति     विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति     तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं वह पद मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक में  जो कि एक प्रसिद्ध उपनिषद् के मन्त्र का स्मरण कराता है  भगवान् श्रीकृष्ण लक्ष्य की स्तुति करते हुए वचन देते हैं कि वे अगले श्लोकों में पूर्णत्व के परम लक्ष्य तथा तत्प्राप्ति के उपायों का वर्णन करेंगे।ध्यानसाधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए मन की योग्यता अत्यावश्यक होती है। इस योग्यता के सम्पादन के लिए प्रायः सभी उपनिषदों में प्रणवोपासना (ओंकारोपासना) का अनेक स्थानों पर उपदेश दिया गया है। पौराणिक युग से इस उपासना का स्थान श्रद्धाभक्तिपूर्वक किये जाने वाले ईश्वर के साकार रूप या अवतारों के ध्यान पूजा आदि ने ले लिया है। इस प्रकार के ध्यान का प्रयोजन और उपयोगिता वही है जो वैदिक उपासनाओं की है।यहाँ साधक को अनेक प्रकार के प्रतिबन्धों की सूचनाओं और आवश्यक सावधानियों का निर्देश दिया गया है जिससे उसकी आध्यात्मिक तीर्थयात्रा अधिक सरल और आनन्दप्रद हो सके। साधारणतः जिन विघ्नों की शिकायत साधक करते हैं वे सब विघ्न अनात्म उपाधियों से हुए तादात्म्य के कारण ही आते हैं। इन उपाधियों के तादात्म्य से मन को परावृत्त करने में वह स्वयं को असमर्थ पाता है। आत्मोन्नति के शास्त्र के रूप में वेदान्त के लिए आवश्यक है कि यह साधक को ध्यान की विधि बताने के साथसाथ सम्भावित विघ्नों का भी संकेत देकर उनसे सुरक्षित रहने के उपायों का भी वर्णन करे। यदि साधक को इनका सम्पूर्ण ज्ञान हो तो शीघ्र ही वह अपनी सुरक्षा कर सकता है। यह श्लोक यह इंगित करता है कि आत्मसंयम और वैराग्य के द्वारा किस प्रकार इस मार्ग पर सुखपूर्वक अग्रसर हुआ जा सकता है।इसी अध्याय में ब्रह्म की लाक्षणिक परिभाषा देते हुए उसे अक्षर कहा गया था। भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं कि जो वीतराग यति हैं वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इसी अक्षर ब्रह्म में प्रवेश करते हैं।वीतरागा  सम्पूर्ण गीता संन्यास का गीत हैं परन्तु यह मन्दबुद्धि पुरुष का अरचनात्मक संन्यास नहीं वरन् विवेक जनित वैराग्य है जो सर्वत्र एवं समस्त प्रगति और विकास का अग्रदूत है कामनाओं का संन्यास बुद्धि की स्वाभाविक परिपक्वता का फल है मन की प्रवृत्तियों का दमन नहीं। नईनई खिली हुई कलियाँ कुछ समय पश्चात् अपनी कोमलसुन्दर पंखुड़ियों के परिधान को त्यागकर शोभनीयता का संन्यास व्यक्त करके नग्नावस्था में खड़ी रहती हैं। परन्तु प्रकृति में यह तभी होता है जब फूलों पर सेचन क्रिया सम्पन्न होकर फल सृजन की क्रिया प्रारम्भ हो गई हो। इन फूलों पर दृष्टिपात करने वाले एक सामान्य पुरुष की दृष्टि से पंखुड़ियों का इस प्रकार बिखर जाना फूल का महान त्याग अथवा संन्यास हो सकता है किन्तु एक कृषक जानता है कि फूलों का यह त्याग उन्हें सद्यः प्राप्त परिपक्वता का परिणाम है जिसके कारण ये सुन्दर पंखुड़ियाँ स्वतः ही बिखर गई हैं।इसी प्रकार भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के अन्तर्गत निःसन्देह ही संन्यास अथवा वैराग्य की आवश्यकता पर बल दिया गया है परन्तु उसका अर्थ उदास और विषादपूर्ण आत्मत्याग अथवा स्वयं को दण्डित करना नहीं है। किन्हींकिन्हीं धर्मों में अवश्य ही इस प्रकार के त्याग का प्रचार एवं अभ्यास किया जाता है। उपनिषदों के ऋषियों ने सदा सम्यक् विवेक जनित वैराग्य का ही उपदेश दिया है तथा उसका आग्रह किया है। इसलिए वीतरागाः शब्द से उन साधकों को समझना चाहिए जो विषयों की तुच्छता एवं जीवन के परम लक्ष्य की श्रेष्ठता समझकर विषयासक्ति से सर्वथा मुक्त हो गये हैं।यह भी सर्वविदित तथ्य है कि इच्छाओं की संख्या जितनी अधिक होगी मन में विक्षेप भी उतना ही अधिक होगा। विक्षेपों की अधिकता का अर्थ मानसिक क्षमता की न्यूनता है। साधक की ध्यान में सफलता मन की शक्ति पर निर्भर करती है और मनः शान्ति ही वह धन है जिसके द्वारा इस यात्रा की कठिनाइयाँ और कष्ट कम हो सकते हैं। अतः एक नियम के रूप में कहा जा सकता है कि ज्ञान मार्ग में उन पुरुषों को सफलता का अधिक अवसर है जिनमें कामनाओं की संख्या न्यूनतम है।उपासना का क्रम तथा फल बताने के लिए भगवान् कहते हैं --

English Translation By Swami Sivananda

That which is declared Imperishable by those who know the Vedas, that which the self-controlled (ascetics or Sannyasins) and passion-free enter, that desiring which celibacy is practised  that goal I will declare to thee in brief.

Transliteration

yad akṣaraṃ vedavido vadanti viśanti yad yatayo vītarāgāḥ
yad icchanto brahmacaryaṃ caranti tat te padaṃ saṅgraheṇa pravakṣye

अनुवाद

जिस अविनाशी परम पद को वेद के जानने वाले कहते हैं, और आसक्ति-रहित संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, तथा जिसकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस परम पद को मैं तुम्हारे लिए संक्षेप में कहूँगा।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस परम अक्षर ब्रह्म (ओंकार या परम पद) के विषय में बता रहे हैं जिसे प्राप्त करना मानव जीवन का परम लक्ष्य है। वेदों के ज्ञाता इसे अविनाशी कहते हैं, और राग-द्वेष से मुक्त तपस्वी इसमें लीन होते हैं। इस परम पद को प्राप्त करने की इच्छा से ही साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, और श्रीकृष्ण इसी मार्ग को संक्षेप में समझाने की प्रतिज्ञा करते हैं।

Translation

That imperishable state which the knowers of the Vedas describe, into which the self-controlled ascetics, free from attachment, enter, and desiring which they practice the vow of celibacy—that state I shall briefly declare to you.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the supreme imperishable goal, often identified with the sacred syllable Om or the Supreme Brahman. This state is sought after by Vedic scholars, entered by detached ascetics, and aimed for through the practice of celibacy. Krishna promises to briefly explain the path and practice required to attain this ultimate destination.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यत्जिस
अक्षरम्अविनाशी (परम पद) को
वेद-विदःवेदों के ज्ञाता
वदन्तिकहते हैं
विशन्तिप्रवेश करते हैं
यत्जिसमें
यतयःप्रयत्नशील संन्यासी
वीत-रागाःआसक्ति से रहित
यत्जिसकी
इच्छन्तःइच्छा करते हुए
ब्रह्मचर्यम्ब्रह्मचर्य का
चरन्तिआचरण करते हैं
तत्उस
तेतुम्हारे लिए
पदम्पद को
संग्रहेणसंक्षेप में
प्रवक्ष्येमैं कहूँगा

Word by word

WordMeaning
yatwhich
akṣaramimperishable (state)
veda-vidaḥknowers of the Vedas
vadantispeak of
viśantienter
yatinto which
yatayaḥthe self-controlled ascetics
vīta-rāgāḥfree from attachment
yatwhich
icchantaḥdesiring
brahmacaryamcelibacy / vow of continence
carantipractice
tatthat
teto you
padamstate / goal
saṅgraheṇain brief
pravakṣyeI shall declare