श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 8 · अक्षरब्रह्मयोग

Bhagavad Gita 8.10

मूल श्लोक :

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन    भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्     स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको प्राप्त होता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक का केवल वाच्यार्थ लेकर प्रायः इसे विपरीत रूप से समझा जाता हैं जो कि वास्तव में इसका तात्पर्य नहीं है।गीता में प्रस्तुत प्रकरण का विषय है एकाग्र चित्त से परम पुरुष का ध्यान। अतः प्रयाणकाल से अभिप्राय अहंकार की मृत्यु के क्षण से समझना चाहिए। ध्यान साधना के द्वारा जब सजग रहकर शरीर मन और बुद्धि से हुए तादात्म्य को पूर्णतया निवृत्त किया जाता है तब साधक आन्तरिक शान्ति के स्थिर क्षण का अनुभव करता है। उस समय निश्चल मन से इस श्लोक में उपदिष्ट साधना का उसे पालन करना चाहिए।यहाँ भक्ति शब्द से सामान्य संसारी जनों की व्यापारिक पद्धति की भक्ति नहीं समझनी चाहिए। ईश्वर के लिए वह परम प्रेम जिसमें न किसी प्रकार की कामना है और न अपेक्षा जो प्रेम केवल प्रेम के लिए ही है  भक्ति कहलाता है। प्रेम का अर्थ है  अपने प्रियतम से वह तादात्म्य जिसमें प्रियतम के सुख और दुःख अपने स्वयं के ही सुखदुःख अनुभव होते हैं। संक्षेप में प्रेमी और प्रेमिका भक्त और ईश्वर परस्पर एकरूप हो जाते हैं। इसलिए श्री शंकराचार्य भक्ति का लक्षण बताते हैं स्वस्वरूपानुसन्धान भक्ति कहलाती है अर्थात् जीव का अपने सत्यस्वरूप के साथ एकत्व भक्ति है।प्रस्तुत श्लोक के सन्दर्भ में साधक को दी गई सबसे महत्व की सूचना यह है कि उसका ध्यानाभ्यास आत्मा के साथ एकरूप होने की तत्परता से युक्त हो। आत्मा का स्वरूप पूर्व श्लोक में विस्तार से बताया जा चुका है। आन्तरिक शान्ति के समय जब अहंकार की मृत्यु होती है तब साधक को आत्मस्वरूप में स्थित होकर रहना चाहिए।योगबलेन  इस शब्द से किसी गुप्त रहस्यमयी कुण्डलिनी शक्ति के विषय में हम नहीं कह रहे हैं जिसके विषय में गुप्तता रखी जाती है और ईश्वर के भक्तों को भी सामान्यतः उसका रहस्य प्रकट नहीं किया जाता। योगबल से तात्पर्य साधक के उस बल से है जो उसे दीर्घकाल तक नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करने के फलस्वरूप प्राप्त होता है। यह वह आन्तरिक शक्ति है जो मन के विषयों से तथा तज्जनित विक्षेपों से निवृत्त होने पर और बुद्धि के परम सत्य में स्थिर होने से प्राप्त होती है और निरन्तर समृद्ध होती जाती है।अल्पकाल में ही साधक अपने में ही मानसिक सन्तुलन रूपी सम्पत्ति और एक अवर्णनीय कार्यकुशलता को पाता है जिनकी सहायता से पूर्ण तत्परता के साथ ध्यान में वह एक चित्त हो जाता है। ध्यानाभ्यास में रत योगी के सम्पूर्ण प्राण उसके ध्यानबिन्दु में केन्द्रित हो जाते हैं  जैसे यहाँ कहा गया है कि भ्रकुटी के मध्य में। यह भाग स्थिर विचार का स्थान माना जाता है।वेदान्त में प्राण से तात्पर्य केवल वायु से न होकर शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न रूप से व्यक्त हो रही जीवनशक्ति से है। इस जीवनशक्ति (प्राण) का पाँच कार्यों के अनुसार पाँच विभागों में वर्गीकरण किया गया है जैसे  प्राण  विषय ग्रहण की क्रिया अपान  मल विसर्जन व्यान  सम्पूर्ण शरीर में रक्त आदि प्रवाहित करना समान  पाचन क्रिया और उदान  जिसके कारण हममें वह क्षमता होती है कि वर्तमान से परे भी ज्ञान को हम समझ सकें। इनके द्वारा हमारी बहुत सी शक्ति बिखर जाती है जो ध्यानाभ्यास के समय एक स्थान पर कुछ समय के लिए केन्द्रित हो जाती है। ध्यानमार्ग पर चलने वाले साधक के लिए तीव्र गति से की जाने वाली किसी शारीरिक साधना की आवश्यकता नहीं होती।ऐसे गहन ध्यान के क्षण में जिस साधक का मन पूर्णतया शान्त और निश्चल हो जाता है योगबल से प्राण भ्रकुटी के मध्य स्थित हो जाते हैं और जो परम श्रद्धा एवं उत्साह के साथ ध्येय आत्मतत्त्व के साथ एक रूप हो जाता है वह साधक उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।ओंकार पर किये जाने वाले ध्यान की प्रस्तावना के रूप में अगला श्लोक है --

English Translation By Swami Sivananda

At the time of death, with unshaken mind, endowed with devotio, by the power of Yoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two ey

Transliteration

prayāṇakāle manasā'calena bhaktyā yukto yogabalena caiva
bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam

अनुवाद

मृत्यु के समय निश्चल मन से, भक्ति से युक्त और योगबल के द्वारा ही, भौंहों के बीच में प्राण को भली-भांति स्थापित करके, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है

भावार्थ

इस श्लोक में अंतकाल में प्राण त्यागने की विधि और उसके फल का वर्णन किया गया है। जो साधक जीवन भर योग का अभ्यास करता है, वह मृत्यु के समय अपने मन को विचलित नहीं होने देता। वह भक्ति और योगबल के द्वारा अपने प्राणों को आज्ञा चक्र (भौंहों के मध्य) में स्थापित करके शरीर छोड़ता है और सीधे परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को प्राप्त करता है।

Translation

At the time of departure, with a steady mind, endowed with devotion and the power of yoga, properly directing the life-breath between the eyebrows, he attains that supreme divine Purusha

Meaning

This verse describes the method and result of leaving the body at the time of death. A practitioner who has disciplined themselves through yoga is able to maintain an unshakeable mind at the final moment. By directing the life-force (prana) into the space between the eyebrows through devotion and yogic power, they directly attain the supreme divine Being.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
प्रयाण-कालेमृत्यु के समय में
मनसामन से
अचलेननिश्चल (स्थिर)
भक्त्याभक्ति से
युक्तःयुक्त
योग-बलेनयोग के बल से
चऔर
एवही
भ्रुवोःदोनों भौंहों के
मध्येमध्य में
प्राणम्प्राण को
आवेश्यस्थापित करके
सम्यक्भली-भांति
सःवह
तम्उस
परम्परम
पुरुषम्पुरुष (परमात्मा) को
उपैतिप्राप्त होता है
दिव्यम्दिव्य

Word by word

WordMeaning
prayāṇa-kāleat the time of death
manasāwith a mind
acalenaunmoving (steady)
bhaktyāwith devotion
yuktaḥunited
yoga-balenaby the power of yoga
caand
evaindeed
bhruvoḥof the two eyebrows
madhyein the middle
prāṇamthe life-breath
āveśyahaving placed
samyakproperly
saḥhe
tamthat
paramsupreme
puruṣamdivine Person
upaitiattains
divyamdivine