Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.7
मूल श्लोक :
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इवHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे धनञ्जय मेरेसे बढ़कर (इस जगत्का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इसके पूर्व के श्लोकों में कथित सिद्धान्त को स्वीकार करने पर हमें जगत् की ओर देखने के दो दृष्टिकोण मिलते हैं। एक है अपर अर्थात् कार्यरूप जगत् की दृष्टि से तथा दूसरा इससे भिन्न है पर अर्थात् कारण की दृष्टि से। जैसे मिट्टी की दृष्टि से उसमें विभिन्न रूप रंग वाले घटों का सर्वथा अभाव होता है वैसे ही चैतन्यस्वरूप पुरुष में न विषयों का स्थूल जगत् है और न विचारों का सूक्ष्म जगत्। मुझसे अन्य किञ्चिन्मात्र वस्तु नहीं है।स्वप्न से जागने पर जाग्रत् पुरुष के लिये स्वप्न जगत् की कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। समुद्र में असंख्य लहरें उठती हुई दिखाई देती हैं परन्तु वास्तव में वहाँ समुद्र के अतिरिक्त किसी का कोई अस्तित्व नहीं होता। उनकी उत्पत्ति स्थिति और लय स्थान समुद्र ही होता है। संक्षेप में कोई भी वस्तु अपने मूल स्वरूप का त्याग करके कदापि नहीं रह सकती है।पहले हमें बताया गया है कि प्रत्येक प्राणी में एक भाग अपरा प्रकृतिरूप है जिसका संयोग आत्मतत्त्व से हुआ है। यहाँ जिज्ञासु मन में शंका उठ सकती है कि क्या मुझमें स्थित आत्मा अन्य प्राणी की आत्मा से भिन्न है यह विचार हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचायेगा कि विभिन्न शरीरों में भिन्नभिन्न आत्मायें हैं अर्थात् आत्मा की अनेकता के सिद्धान्त पर हम पहुँच जायेंगे। .समस्त नामरूपों में आत्मा के एकत्व को दर्शाने के लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि वे ही इस जगत् के अधिष्ठान हैं। वे सभी रूपों को इस प्रकार धारण करते हैं जैसे कण्ठाभरण में एक ही सूत्र सभी मणियों को पिरोये रहता है। यह दृष्टांत अत्यन्त सारगर्भित है। काव्य के सौन्दर्य के साथसाथ उसमें दर्शनशास्त्र का गम्भीर लाक्षणिक अर्थ भी निहित है। कण्ठाभरण में समस्त मणियाँ एक समान होते हुये दर्शनीय भी होती हैं परन्तु वे समस्त छोटीबड़ी मणियाँ जिस एक सूत्र में पिरोयी होती हैं वह सूत्र हमें दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि उसके कारण ही वह माला शोभायमान होती है।इसी प्रकार मणिमोती जिस पदार्थ से बने होते हैं वह उससे भिन्न होता है जिस पदार्थ से सूत्र बना होता है। वैसे ही यह जगत् असंख्य नामरूपों की एक वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि है जिसे इस पूर्णरूप में एक पारमार्थिक सत्य आत्मतत्त्व धारण किये रहता है। एक व्यक्ति विशेष में भी शरीर मन और बुद्धि परस्पर भिन्न होते हुये भी एक साथ कार्य करते हैं और समवेत रूप में जीवन का संगीत निसृत करते हैं। केवल यह आत्मतत्त्व ही इसका मूल कारण है।यह श्लोक ऐसा उदाहरण है जिसमें हमें महर्षि व्यास की काव्य एवं दर्शन की अपूर्व प्रतिभा के दर्शन होते हैं। यहाँ काव्य एवं दर्शन का सुन्दर समन्वय हुआ है।किस प्रकार मुझ में यह जगत् पिरोया हुआ है वह सुनो
English Translation By Swami Sivananda
There is nothing whatsoever higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, as clusters of gems on a string.
Transliteration
mattaḥ parataraṃ nānyatkiñcidasti dhanañjaya
mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā ivaअनुवाद
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ अन्य कोई भी वस्तु नहीं है यह सब कुछ मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है जैसे सूत के धागे में मणियों के समूह
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपनी सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता समझा रहे हैं। वे बताते हैं कि वे ही इस सृष्टि के परम कारण और आधार हैं। जिस प्रकार एक धागा अदृश्य रहकर भी माला के सभी मोतियों को एक सूत्र में पिरोए रखता है, उसी प्रकार भगवान इस संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करते हैं।
Translation
O Dhananjaya, there is nothing else superior to Me All this is strung on Me, like clusters of gems on a thread
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains His supreme position and all-pervading nature to Arjuna. He declares that He is the ultimate cause and support of everything in existence. Just as an unseen thread holds together all the beads in a necklace, the Lord sustains and permeates the entire universe.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मत्तः | मुझसे |
| परतरम् | श्रेष्ठ / परे |
| न | नहीं |
| अन्यत् | दूसरा |
| किञ्चित् | कोई भी |
| अस्ति | है |
| धनञ्जय | हे अर्जुन (धनंजय) |
| मयि | मुझमें |
| सर्वम् | सब कुछ |
| इदम् | यह |
| प्रोतम् | पिरोया हुआ |
| सूत्रे | धागे में |
| मणिगणाः | मणियों के समूह |
| इव | की तरह |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mattaḥ | than Me |
| parataram | superior |
| na | not |
| anyat | other |
| kiñcit | anything |
| asti | there is |
| dhanañjaya | O Arjuna (conqueror of wealth) |
| mayi | in Me |
| sarvam | all |
| idam | this |
| protam | strung |
| sūtre | on a thread |
| maṇigaṇāḥ | groups of gems |
| iva | like |