Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.6
मूल श्लोक :
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
उपर्युक्त अपरा एवं परा प्रकृतियों के परस्पर संबंध से यह नानाविध वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि व्यक्त होती है। जड़ प्रकृति के बिना चैतन्य की सार्मथ्य व्यक्त नहीं हो सकती और न ही उसके बिना जड़ उपाधियों में चेनवत् व्यवहार की संभावना ही रहती है। बल्ब में स्थित तार में स्वयं विद्युत् ही प्रकाश के रूप मे व्यक्त होती है। प्रकाश की अभिव्यक्ति के लिए विद्युत् और बल्ब दोनों का संबंध होना आवश्यक है। इसी प्रकार सृष्टि के लिए परा और अपरा जड़ और चेतन के संबंध की अपेक्षा होती है।इसी दृष्टि से भगवान् कहते हैं ये दोनों प्रकृतियां भूतमात्र की कारण हैं। एक मेधावी विद्यार्थी को इस कथन का अभिप्राय समझना कठिन नहीं है। बाह्य विषय भावनाएं तथा विचारों के जगत् की न केवल उत्पत्ति और स्थिति बल्कि लय भी चेतन पुरुष में ही होता है। इस प्रकार अपरा प्रकृति पारमार्थिक स्वरूप में पराप्रकृति से भिन्न नहीं है। आत्मा मानो अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य करके जीवभाव के दुखों को प्राप्त होता है। परन्तु उसका यह दुख मिथ्या है वास्तविक नहीं। स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मबन्धन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। परा से अपरा की उत्पत्ति उसी प्रकार होती है जैसे मिट्टी के बने घटों की मिट्टी से। स्ाभी घटों में एक मिट्टी ही सत्य है उसी प्रकार विषय इन्द्रियां मन तथा बुद्धि इन अपरा प्रकृति के कार्यों का वास्तविक स्वरूप चेतन तत्त्व ही है।इसलिये
English Translation By Swami Sivananda
Know that these two (Natures) are the womb of all beings. So I am the source and dissolution of the whole universe.
Transliteration
etadyonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya
ahhaṃ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathāअनुवाद
तुम यह जान लो कि सभी प्राणी इन दोनों (प्रकृतियों) से ही उत्पन्न होने वाले हैं। मैं ही इस संपूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय (विनाश) हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनकी परा (चेतन) और अपरा (जड़) प्रकृतियाँ ही संसार के समस्त चराचर प्राणियों की उत्पत्ति का कारण हैं। भगवान ही इस सृष्टि के परम कारण हैं, जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है और अंत में सब कुछ उन्हीं में विलीन हो जाता है। वे ही इस जगत के सृजनकर्ता और संहारकर्ता दोनों हैं।
Translation
Know that all living beings have these two as their source. I am the origin and also the dissolution of the entire universe.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that His dual natures—the lower material nature and the higher spiritual nature—are the source of all created beings. He declares Himself to be the ultimate cause of the entire cosmos, acting as both its origin and its final dissolution. Everything emanates from Him and eventually merges back into Him.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| एतत् | इन दोनों को |
| योनीनि | उत्पत्ति का कारण (योनि वाले) |
| भूतानि | प्राणी |
| सर्वाणी | सभी |
| इति | इस प्रकार |
| उपधारय | तुम जानो (समझो) |
| अहम् | मैं |
| कृत्स्नस्य | संपूर्ण |
| जगतः | जगत का |
| प्रभवः | उत्पत्ति स्थान (सृष्टि) |
| प्रलयः | प्रलय (विनाश) |
| तथा | और भी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| etat | these two |
| yonīni | having as source of birth |
| bhūtāni | living beings |
| sarvāṇi | all |
| iti | thus |
| upadhāraya | know / understand |
| aham | I |
| kṛtsnasya | of the entire |
| jagataḥ | of the universe |
| prabhavaḥ | the origin |
| pralayaḥ | the dissolution |
| tathā | as well as |