श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.5

मूल श्लोक :

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 396) पृथ्वी जल तेज वायु आकाश  ये पञ्चमहाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार  यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृतिको जान जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अष्टधा प्रकृति अपरा  जड़ है। उसे बताने के पश्चात् उससे भिन्न अपनी परा प्रकृति को भगवान् बताते हैं। वह परा प्रकृति जीवरूप अर्थात् चेतन रूप है जिसके कारण ही शरीर मन और बुद्धि अपनेअपने कार्य इस प्रकार करते हैं मानो वे स्वयं ही चेतन हों।इस चेतन की विद्यमानता में ही उपाधियाँ अपना व्यापार कर सकती हैं अन्यथा नहीं। चैतन्य के बिना हमें न बाह्य स्थूल जगत् का और न आन्तरिक सूक्ष्म विचार रूप जगत् का ही अनुभव और ज्ञान हो सकता है। वही जगत् को धारण किये हुए है। उसके अभाव में हमारी दशा एक पाषाण के समान हो जायेगी  जिसमें न चेननता है और न बुद्धिमत्ता।भगवान् के इस कथन को कि परा प्रकृति जगत् का आधार है भौतिक विज्ञान की दृष्टि से विचार करके भी सिद्ध किया जा सकता है। हम अपने घर में रहते हैं जिसका आधार है भूमि। उस भूमिभाग का आधार है शहर शहर का राष्ट्र और राष्ट्र का आधार विश्व है विश्व घिरा हुआ है समुद्र के जल से जिसकी स्थिति वायुमण्डल पर निर्भर करती है। यह वायुमण्डल तो सौरमण्डल अथवा ग्रहमण्डल का एक भाग है। सम्पूर्ण विश्व आकाश में स्थित है और आकाश स्थित है मन में स्थित आकाश की कल्पना पर। मन का आधार है बुद्धि का निर्णय। और क्योंकि बुद्धिवृत्तियों का ज्ञान चैतन्य के कारण ही संभव है इसलिए यह चैतन्य ही सम्पूर्ण जगत् का आधार सिद्ध होता है। व्ाही जगत् का अधिष्ठान है।दर्शनशास्त्र में जगत् का अर्थ केवल इन्द्रियगोचर जगत् ही नहीं वरन् मन तथा बुद्धि के द्वारा अनुभूयमान जगत् भी उस शब्द की परिभाषा मे समाविष्ट है। इस प्रकार बाह्य विषय भावनाएं और विचार ये सब जगत् ही हैं। यह सम्पूर्ण जगत् चेतनस्वरूप परा प्रकृति के द्वारा धारण किया जाता है।

English Translation By Swami Sivananda

This is the inferior Prakriti, O mighty-armed (Arjuna); know thou as different from it My higher Prakriti (Nature), the very life-element, by which this world is upheld.

Transliteration

apareyamitastvanyāṃ prakṛtiṃ viddhi me parām
jīvabhūtāṃ mahābāho yayedaṃ dhāryate jagat

अनुवाद

हे महाबाहो! यह तो मेरी अपरा (जड़) प्रकृति है, किन्तु इससे भिन्न मेरी उस परा (चेतन) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दो प्रकार की शक्तियों का वर्णन कर रहे हैं। पिछले श्लोक में बताई गई आठ प्रकार की प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) उनकी ‘अपरा’ यानी भौतिक और जड़ प्रकृति है। इस श्लोक में वे अर्जुन को अपनी ‘परा’ यानी आध्यात्मिक और चेतन प्रकृति के विषय में बता रहे हैं, जो कि जीवशक्ति है और जो इस भौतिक जगत् को क्रियाशील रखती है।

Translation

O mighty-armed one, this is My lower nature; but know My other, higher nature, which consists of the living entities and by which this entire universe is sustained.

Meaning

In this verse, Lord Krishna distinguishes between His two energies. Having described His lower, material nature (apara prakriti) consisting of eight elements in the previous verse, He now introduces His higher, spiritual nature (para prakriti). This higher energy consists of the living entities (jivas) who animate and sustain the material world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अपरानिम्न (जड़)
इयम्यह
इतःइससे
तुलेकिन
अन्याम्दूसरी (भिन्न)
प्रकृतिम्प्रकृति को
विद्धिजानो
मेमेरी
पराम्उच्च (परा)
जीव-भूताम्जीवस्वरूपा को
महाबाहोहे महाबाहो (अर्जुन)
ययाजिसके द्वारा
इदम्यह
धार्यतेधारण किया जाता है
जगत्जगत्

Word by word

WordMeaning
aparāinferior
iyamthis
itaḥfrom this
tubut
anyāmanother
prakṛtimenergy
viddhiknow
meMy
parāmsuperior
jīva-bhūtāmcomprising the living entities
mahābāhoO mighty-armed one
yayāby which
idamthis
dhāryateis sustained
jagatthe universe