Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.4
मूल श्लोक :
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 396) पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा परा प्रकृतिको जान जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वैदिक काल के महान् मनीषियों ने जगत् की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करके यह बताया है कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) के संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष की अध्यक्षता में जड़ प्रकृति से बनी शरीरादि उपाधियाँ चैतन्ययुक्त होकर समस्त व्यवहार करने में सक्षम होती हैं। एक आधुनिक दृष्टान्त से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया जा सकता है।लोहे के बने वाष्प इंजिन में स्वत कोई गति नहीं होती। परन्तु जब उसका सम्बन्ध उच्च दबाब की वाष्प से होता है तब वह इंजिन गतिमान हो जाता है। केवल वाष्प भी किसी यन्त्र की सहायता के बिना अपनी शक्ति को व्यक्त नहीं कर सकती दोनों के सम्बन्ध से ही यह कार्य सम्पादित किया जाता है।भारत के तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने वैज्ञानिक विचार पद्धति से इसका वर्णन किया है कि किस प्रकार सनातन पूर्ण पुरुष प्रकृति की जड़ उपाधियों के संयोग से इस नानाविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुआ है।भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रकृति का वर्णन करते हैं तथा अगले श्लोक में चेतन तत्त्व का। यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकेगा कि जड़ उपाधियों के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सब दुखों का कारण है। स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनन्दस्वरूप है। आत्मा और अनात्मा के परस्पर तादात्म्य से जीव उत्पन्न होता है। यही संसारी दुखी जीव आत्मानात्मविवेक से यह समझ पाता है कि वह तो वास्तव में जड़ प्रकृति का अधिष्ठान चैतन्य पुरुष है जीव नहीं।अर्जुन को जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम प्रकृति के आठ भागों को बताते हैं जिसे यहाँ अष्टधा प्रकृति कहा गया है। इस विवेक से प्रत्येक व्यक्ति अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है।आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी वे पंचमहाभूत तथा मन बुद्धि और अहंकार यह है अष्टधा प्रकृति जो परम सत्य के अज्ञान के कारण उस पर अध्यस्त (कल्पित) है। व्यष्टि (एक जीव) में स्थूल पंचमहाभूत का रूप है स्थूल शरीर तथा उनके सूक्ष्म भाव का रूप पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा मनुष्य बाह्य जगत् का अनुभव करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा विषयों की संवेदनाएं मन तक पहुँचती हैं। इन प्राप्त संवेदनाओं का वर्गीकरण तथा उनका ज्ञान और निश्चय करना बुद्धि का कार्य है। इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण मन के द्वारा उनका एकत्रीकरण तथा बुद्धि के द्वारा उनका निश्चय इन तीनों स्तरों पर एक अहं वृत्ति सदा बनी रहती है जिसे अहंकार कहते हैं। ये जड़ उपाधियाँ हैं जो चैतन्य का स्पर्श पाकर चेतनवत् व्यवहार करने में समर्थ होती हैं।इसके पश्चात् अपनी पराप्रकृति बताने के लिए भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism thus is My Nature divided eightfold.
Transliteration
bhūmir-āpo'nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhir-eva ca
ahaṅkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtir-aṣṭadhāअनुवाद
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी — इस प्रकार यह आठ प्रकारों में विभाजित मेरी अपरा प्रकृति है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी भौतिक प्रकृति (अपरा प्रकृति) के आठ तत्वों का वर्णन करते हैं। इनमें पांच स्थूल तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) तथा तीन सूक्ष्म तत्व (मन, बुद्धि और अहंकार) शामिल हैं। यह संपूर्ण दृश्य जगत इन्हीं आठ तत्वों के विभिन्न रूपों से निर्मित है।
Translation
Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect, and egoism — thus this is My eightfold divided material nature.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes His material energy (apara prakriti) which is divided into eight elements. These consist of the five gross elements (earth, water, fire, air, and ether) and the three subtle elements (mind, intellect, and ego). The entire physical universe is composed of these eight aspects of His energy.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भूमिः | पृथ्वी |
| आपः | जल |
| अनलः | अग्नि |
| वायुः | वायु |
| खम् | आकाश |
| मनः | मन |
| बुद्धिः | बुद्धि |
| एव | ही |
| च | और |
| अहङ्कारः | अहंकार |
| इति | इस प्रकार |
| इयम् | यह |
| मे | मेरी |
| भिन्ना | विभाजित |
| प्रकृतिः | प्रकृति |
| अष्टधा | आठ प्रकार की |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| bhūmiḥ | earth |
| āpaḥ | water |
| analaḥ | fire |
| vāyuḥ | air |
| kham | ether |
| manaḥ | mind |
| buddhiḥ | intellect |
| eva | certainly |
| ca | and |
| ahaṅkāraḥ | egoism |
| iti | thus |
| iyam | this |
| me | My |
| bhinnā | divided |
| prakṛtiḥ | energy |
| aṣṭadhā | eightfold |