Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.3
मूल श्लोक :
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्िचद्यतति सिद्धये
यततामपि सिद्धानां कश्िचन्मां वेत्ति तत्त्वतःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में भिन्नभिन्न आचार्यों ने विभिन्न प्रकार से बारम्बार इस विचार को दोहराया है कि आत्मज्ञान तथा उसका अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करने वाले साधक विरले ही होते हैं। इसके पूर्व भी हमें यह बताया गया था कि वेदान्त के सिद्धांतों को भी एक आश्चर्य के समान सुना तथा समझा जाता है। उपनिषदों में भी इसीतथ्य का ऋषियों ने वर्णन किया है।यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार आत्मज्ञान की प्राप्ति का उत्तरदायितत्व साधक पर ही निर्भर है। यदि कोई साधक इस अनुभव को प्राप्त नहीं कर पाता है तो उसका एकमात्र कारण आवश्यक पुरुषार्थ का अभाव है। वेदान्त अध्यात्म विषयक विज्ञान होने के कारण हमारे लिए अपने अवगुणों का ज्ञानमात्र पर्याप्त नहीं है वरन् उसकी निवृत्ति के लिए और आत्मबल की वृद्धि के लिए आवश्यक है कि हम वेदान्त ज्ञान को अपने जीवन में उतारने का भी सदैव प्रयत्न करें। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी विरले पुरुष में ही आत्मोन्नति की तीव्र अभिलाषा होती है जिसके लिए वह अपना सर्वस्व अर्पण करने को तत्पर रहता है।सहस्रों मनुष्यों में से जो लोग वेदान्त का श्रवण करते हैं तथा सम्भवत बौद्धिक स्तर पर तत्प्रतिपादित समस्त सिद्धांतों को समझते भी हैं उनमें भी कोईकोई पुरुष ऐसे ही होते हैं जो आध्यात्मिक जीवन पद्धति को पूर्णतया अपनाते हैं ऐसे प्रयत्नशील साधकों में से कोई एक साधक मुझे तत्त्व से जानता है।इसके अनेक कारण हैं। जब शिष्य उत्साहपूर्वक एकाग्रचित्त होकर सद्गुरु के उपदेश का श्रवण करता है तब वह स्वयं किसी सीमा तक ऊँचा उठ भी सकता है। परन्तु हो सकता है कि सत्य के द्वार तक पहुँचकर भी वह किसी सूक्ष्म एवं अज्ञात अभिलाषा अथवा अनजाने गर्व के कारण अपनी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध कर ले और इस प्रकार सत्य के दर्शन से वंचित ही रह जाय। इस दृष्टि से ईसामसीह की यह घोषणा अर्थपूर्ण है कि एक धनवान् व्यक्ति के स्वर्ग द्वार में प्रवेख करने की अपेक्षा एक ऊँट सुई के छिद्र से सरलता से प्रवेश करके बाहर निकल सकता है। यहाँ धन शब्द से अभिप्राय मन में संचित वासनाओं से है न कि लौकिक सम्पत्ति से। जब तक मन पूर्णत्ाया वासनारहित होकर शुद्ध नहीं हो जाता तब तक वह सत्य के आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता है।भगवान् श्रीकृष्ण की दृष्टि को ध्यान में रखकर इस श्लोक पर विचार करने से उसका अर्थ यह प्रतीत होता है कि विरले लोग ही वेदान्त का श्रवण करके उसके सिद्धांत को यथार्थ रूप में समझ पाते हैं। उनमें भी ऐसे साधकों की संख्या बहुत कम ही होती है जिनमें सत्य एवं शुद्धि का जीवन जीने के लिए लक्ष्य का आवश्यक ज्ञान मन की दृढ़ता शारीरिक सहनशक्ति तथा प्रयत्न की सम्पन्नता हो। अर्जुन तथा गीता के जिज्ञासु लोग ऐसे ही विरले पुरुष हैं जो आत्मज्ञान के अधिकारी हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण विज्ञान के सहित ज्ञान के उपदेश का वचन देते हैं जिससे आत्मा का साक्षात् अनुभव हो सकता है।इस प्रकार श्रोता में इस ज्ञान के प्रति रुचि उत्पन्न कराकर भगवान् आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Among thousands of men, one perchance strives for perfection; even among those successful strivers, only one perchance knows Me in essence.
Transliteration
manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye
yatatāmapi siddhānāṃ kaścizmāṃ vetti tattvataḥअनुवाद
हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्न करने वाले सिद्धों में से भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से जानता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्म-साक्षात्कार के मार्ग की दुर्लभता को स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि आध्यात्मिक पूर्णता की खोज करने वाले लोग बहुत कम होते हैं। और जो लोग इस मार्ग पर चलते हैं, उनमें से भी अत्यंत विरले ही भगवान के वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः समझ पाते हैं।
Translation
Among thousands of men, scarcely one strives for perfection and of those who strive and succeed, scarcely one knows Me in truth
Meaning
In this verse, Lord Krishna highlights the rarity of spiritual realization. He explains that out of thousands of human beings, only a few strive for spiritual perfection. Furthermore, among those rare souls who do strive and achieve some success, hardly anyone understands Him in His true, absolute nature.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मनुष्याणाम् | मनुष्यों के |
| सहस्रेषु | हजारों में |
| कश्चित् | कोई एक |
| यतति | प्रयत्न करता है |
| सिद्धये | सिद्धि के लिए |
| यतताम् | प्रयत्न करने वालों में |
| अपि | भी |
| सिद्धानाम् | सिद्धों के |
| कश्चित् | कोई एक |
| माम् | मुझको |
| वेत्ति | जानता है |
| तत्त्वतः | तत्त्व से (वास्तव में) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| manuṣyāṇām | of men |
| sahasreṣu | among thousands |
| kaścit | someone |
| yatati | strives |
| siddhaye | for perfection |
| yatatām | of those who strive |
| api | even |
| siddhānām | of those who have attained perfection |
| kaścit | someone |
| mām | Me |
| vetti | knows |
| tattvataḥ | in truth |