श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.29

मूल श्लोक :

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 442) जरा और मरणसे मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं वे उस ब्रह्मको सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

चित्तशुद्धि तथा ध्यानसाधना का प्रयोजन है जरा और मरण से मुक्ति पाना। आधुनिक काल में भी मनुष्य ऐसे उपायों को खोजने का प्रयत्न कर रहा है जिसके द्वारा जरा और मरण से मुक्ति मिल सके। उसकी अमृत्व की कल्पना यह है कि इस भौतिक देह का अस्तित्व सदा बना रहे परन्तु अध्यात्म शास्त्र में इसे अमृतत्त्व नहीं कहा है और न देह के नित्य अस्तित्व को जीवन का लक्ष्य बताया है।प्राणिमात्र के लिए जन्म वृद्धि व्याधि क्षय और मरण ये विकार अवश्यंभावी हैं। ये सभी विकार या परिवर्तन मनुष्य को असह्य पीड़ा दायक होते हैं। इनके अभाव में मनुष्य का जीवन अखण्ड आनन्दमय होता है। ध्यानाभ्यास में साधक का प्रयत्न इन परिवर्तनशील उपाधियों के साथ हुए तादात्म्य से ऊपर उठकर कालत्रयातीत मुक्त आत्मस्वरूप में स्थिति प्राप्त करने का होता है।योग्यता सम्पन्न साधक आत्मा का ध्यान करके अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात्कार करता है कि यह आत्मा मैं हूँ। यह आत्मा ही वह परम सत्य है जो समस्त ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान है जिसे वेदान्त में ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। आत्मसाक्षात्कार का अर्थ ही ब्रह्मस्वरूप बनना है क्योंकि व्यक्ति की आत्मा ही भूतमात्र की आत्मा है। सत्य के इस अद्वैत को यहाँ इस प्रकार सूचित किया गया है कि जो साधक मुझ आत्मस्वरूप पर ध्यान करते हैं वे ब्रह्म को जानते हैं।ज्ञानी पुरुष के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह न केवल सर्वव्यापी आत्मा का ज्ञाता है बल्कि स्वयं की सम्पूर्ण अध्यात्म अर्थात् मनोवैज्ञानिक शक्तियों का भी ज्ञाता है तथा वह सभी कर्मों में कुशल होता है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि आत्मानुभवी पुरुष जगत् व्यवहार में अकुशल और मूढ़ नहीं होता। अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवल वही पुरुष वास्तविक अर्थ में जगत् की सेवा कर सकता है जिसे लोगों के मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान है तथा अपने मन पर पूर्ण संयम है। सत्य का गीत गाने के लिए ऐसा पूर्णत्व प्राप्त व्यक्ति ही योग्यतम माध्यम है और ऐसे व्यक्ति का सुसंगठित और समस्त कार्यों में कुशल होना आवश्यक है।ज्ञानी पुरुषों के विषय में ही आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Those who strive for liberation from old age and death, taking refuge in Me, realise in full ï1thatï1 Brahman, the whole knowledge of the Self and all action.

Transliteration

jarāmaraṇamokṣāya māmāśritya yatanti ye
te brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṃ karma cākhilam

अनुवाद

जो मेरे शरण होकर बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो साधक केवल परमेश्वर के शरणागत होकर संसार के चक्र (जरा और मरण) से मुक्ति पाने का प्रयास करते हैं, वे वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते हैं। वे न केवल निराकार ब्रह्म को जानते हैं, बल्कि जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप (अध्यात्म) और सृष्टि के संपूर्ण कर्म-रहस्य को भी समझ जाते हैं। यह उनके समग्र ज्ञान की पूर्णता को दर्शाता है।

Translation

Those who, taking refuge in Me, strive for liberation from old age and death, they know that Brahman, the entire self (adhyatma), and all action (karma).

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that those spiritual seekers who take refuge in Him and strive for liberation from the cycle of old age and death attain complete knowledge. They come to know the supreme Brahman, the nature of the individual self (adhyatma), and the entire principle of action (karma). This marks the beginning of the integration of knowledge that is fully revealed in the next chapter.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
जराबुढ़ापा
मरणऔर मृत्यु से
मोक्षायमुक्ति के लिए
माम्मुझ पर
आश्रित्यआश्रित होकर (शरण लेकर)
यतन्तिप्रयत्न करते हैं
येजो
तेवे
ब्रह्मब्रह्म को
तत्उस
विदुःजानते हैं
कृत्स्नम्सम्पूर्ण
अध्यात्मम्अध्यात्म को
कर्मकर्म को
चऔर
अखिलम्सम्पूर्ण

Word by word

WordMeaning
jarāfrom old age
maraṇaand death
mokṣāyafor liberation
māmin Me
āśrityataking refuge
yatantistrive
yethose who
tethey
brahmaBrahman
tatthat
viduḥknow
kṛtsnamentire
adhyātmamthe self (adhyatma)
karmaaction
caand
akhilamwhole