Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.28
मूल श्लोक :
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है इस कथन को सम्यक् प्रकार से समझना आवश्यक है। पाप मनुष्य का स्वभाव नहीं हैं वेदान्त के अनुसार वह मनुष्य द्वारा किये गये गलत निर्णय अर्थात् विपरीत ज्ञान का परिणाम है जिसने आत्मचैतन्य को आच्छादित सा कर दिया है। पाप का मुख्य कारण है बाह्य स्थूल जगत् के निम्न स्तरीय विषयोपभोग के लिए हमारे मन की तृष्णा और स्पृहा। पापी पुरुष वह है जिसका अत्यधिक समय और ध्यान केवल अपने देहसुख के लिए ही व्यक्त होता है। ऐसे पुरुष में देह स्वामी और आत्मा उसकी दासी बन जाती है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति वैषयिक सुखों की कामना मन में उठने वाली प्रत्येक निम्न कोटि की भावना का सन्तुष्टीकरण यह है पापी पुरुष की जीवन पद्धति।इस प्रकार का कामुक पाशविक जीवन अन्तकरण में वैसी ही वासनाएं उत्पन्न करता है। वासना के अनुसार ही विचार होते हैं। विचारानुसार कर्म और ये कर्म फिर वासना को ही दृढ़ करते हैं।मनुष्य की शान्ति और सन्तुष्टि को विनष्ट करने वाली वासनाविचारकर्म की श्रृंखला को तोड़ने के लिए मनुष्य को पुण्यकर्म का नया जीवन प्रारम्भ करने का उपदेश दिया जाता है। पुण्यकर्म पाप का विरोधी होने से उसके अन्तर्गत वे सब विचार भावनाएं तथा कर्म आते हैं जो ईश्वर को समर्पित होते हैं अर्थात् जिनका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होता है। मैं देह हूँ के स्थान पर मैं आत्मा हूँ इस ज्ञान को दृढ़ करके कर्म करने पर वे अपना संस्कार उत्पन्न नहीं करेंगे। कुछ कालावधि में इन पुण्यसंस्कारों के दृढ़ होने पर पाप वासनाएं नष्ट हो जायेंगी।ऐसा पापयुक्त पुरुष सुख दुखादि रूप सभी प्रकार के द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त हो जाता है। तब उसमें यह योग्यता आती है कि वह एकाग्रचित तथा दृढ़वती अर्थात् दृढ़ निश्चयी होकर आत्मा का ध्यान कर सके।साधन सम्पन्न साधक किस प्रयोजन से आत्मा का ध्यान करते हैं उत्तर है
English Translation By Swami Sivananda
But those men of virtuous deeds whose sins have come to an end, and who are freed from the delusion of the pairs of opposites, worship Me, steadfast in their vows.
Transliteration
yeṣāṃ tvantagataṃ pāpaṃ janānāṃ puṇyakarmaṇām
te dvandvamohanirmuktā bhajante māṃ dṛḍhavratāḥअनुवाद
परन्तु जिन निष्पाप कर्म करने वाले मनुष्यों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्व रूपी मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरी भक्ति करते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि कौन लोग उनकी अनन्य भक्ति करने के योग्य होते हैं। जिन मनुष्यों के पूर्व जन्मों और इस जन्म के पाप कर्म पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं और जो केवल पुण्य कर्मों में लगे हैं, वे ही संसार के द्वन्द्वों (जैसे सुख-दुःख, राग-द्वेष) के मोह से मुक्त हो पाते हैं। ऐसे पवित्र चित्त वाले साधक ही दृढ़ निश्चय के साथ भगवान की शरण ग्रहण करते हैं।
Translation
But those men of virtuous deeds whose sin has come to an end, freed from the delusion of dualities, worship Me with firm resolve.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains who is eligible to perform undivided devotion to Him. Those individuals whose sins have been completely eradicated through virtuous deeds are freed from the delusion of dualities like pleasure and pain, or attraction and aversion. With a purified mind, they become steadfast in their resolve and engage in the worship of the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| येषाम् | जिनका |
| तु | परन्तु |
| अन्तगतम् | नष्ट हो गया है |
| पापम् | पाप |
| जनानाम् | मनुष्यों का |
| पुण्यकर्मणाम् | पुण्य कर्म करने वालों का |
| ते | वे |
| द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः | द्वन्द्व रूपी मोह से सर्वथा मुक्त |
| भजन्ते | भजते हैं (भक्ति करते हैं) |
| माम् | मुझको |
| दृढव्रताः | दृढ़ निश्चय वाले होकर |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yeṣām | of whom |
| tu | but |
| antagatam | has come to an end |
| pāpam | sin |
| janānām | of the persons |
| puṇyakarmaṇām | whose deeds are meritorious |
| te | they |
| dvandvamohanirmuktāḥ | freed from the delusion of dualities |
| bhajante | worship |
| mām | Me |
| dṛḍhavratāḥ | with firm determination |