Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.27
मूल श्लोक :
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तपHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे भरतवंशमें उत्पन्न परंतप इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्वमोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें मूढ़ताको अर्थात् जन्ममरणको प्राप्त हो रहे हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
एक अत्यन्त वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म दार्शनिक सत्य को इस श्लोक में सूचित किया गया है। इस तथ्य का वर्णन करने में कि क्यों और कैसे यह जीव आत्मा के शुद्ध स्वरूप को नहीं जान पाता है भगवान् श्रीकृष्ण मूलभूत उन सिद्धांतों को बताते हैं जो आधुनिक जीवशास्त्रियों ने जीव के विकास के सम्बन्ध में शोध करके प्रस्तुत किये हैं।आत्मसुरक्षा की सर्वाधिक प्रबल स्वाभाविक प्रवृत्ति के वशीभूत मनुष्य जगत् में जीने का प्रयत्न करता है। सुरक्षा की यह प्रवृत्ति बुद्धि में उन वस्तुओं की इचछाओं के रूप में व्यक्त होती है जिनके द्वारा मनुष्य अपने सांसारिक जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने की अपेक्षा रखता है।प्रिय वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा को इच्छा कहते हैं। यदि कोई वस्तु या व्यक्ति इस इच्छापूर्ति में बाधक बनता है तो उसकी ओर मन की प्रतिक्रिया द्वेष या क्रोध के रूप में व्यक्त होती है। इच्छा और द्वेष की दो शक्तियों के बीच होने वाले शक्ति परीक्षण में दुर्भाग्यशाली जीव छिन्नभिन्न होकर मरणासन्न व्यक्ति की असह्य पीड़ा को भोगता है। स्वाभाविक ही ऐसा व्यक्ति सदा प्रिय की ओर प्रवृत्ति और द्वेष की ओर से निवृत्ति में व्यस्त रहता है। शीघ्र ही वह व्यक्ति अत्याधिक व्यस्त और पूर्णतया भ्रमित होकर थक जाता है। मन में उत्पन्न होने वाले विक्षेप दिनप्रतिदिन बढ़ते हुए अशान्ति की वृद्धि करते हैं। इन्हीं विक्षेपों के आवरण के फलस्वरूप मनुष्य को अपने सत्यस्वरूप का दर्शन नहीं हो पाता।अत आत्मा की अपरोक्षानुभूति का एकमात्र उपाय है मन को संयमित करके उसके विक्षेपों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना। विश्व के सभी धर्मों में जो क्रिया प्रधान भावना प्रधान या विचार प्रधान आध्यात्मिक साधनाएं बतायी जाती हैं उन सबका प्रयोजन केवल मन को पूर्णतया शान्त करने का ही है। परम शान्ति का क्षण ही आत्मानुभूति आत्मप्रकाश और आत्ममिलन का क्षण होता है।परन्तु दुर्भाग्य है कि प्राणीमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह को प्राप्त होते हैं दैवी करुणा से भरे स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण का यह कथन है। दुखपूर्ण प्रारब्ध को मनुष्य का यह कोई नैराश्यपूर्ण समर्पण नहीं है कि जिससे मुक्ति पाने में वह जन्म से ही अशक्त बना दिया गया हो। ईसाई धर्म के समान कृष्ण धर्म किसी व्यक्ति को पाप का पुत्र नहीं मानता। यमुना कुञ्ज विहारी दुर्दम्य आशावादी आशा के संदेशवाहक जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ मात्र दार्शनिक सत्य को ही व्यक्त कर रहे हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी देह विशेष और उपलब्ध वातावरण में जन्म लेने की त्रासदी अपनी अतृप्त वासनाओं और प्रच्छन्न कामनाओं की परितृप्ति के लिए स्वयं ही निर्माण करता है।इस मोह जाल से मुक्ति पाना और सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करना जीवन का पावन लक्ष्य है। गीता भगवान् द्वारा विरचित काव्य है जो विपरीत ज्ञान में फंसे लोगों को भ्रमजाल से निकालकर पूर्णानन्द में विहार कराता है।सत्य के साधकों के गुण दर्शाने के लिए भगवान् आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
By the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Bharata, all beings are subject to delusion at birth, O Parantapa.
Transliteration
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata
sarvabhūtāni saṃmohaṃ sarge yānti parantapaअनुवाद
हे भरतवंशी अर्जुन! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व रूपी मोह से, इस संसार में सभी प्राणी पूर्णतः सम्मोह को प्राप्त होते हैं, हे परंतप।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि संसार के सभी जीव जन्म लेते ही मोहग्रस्त क्यों हो जाते हैं। राग (इच्छा) और द्वेष (नफ़रत) से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी जैसे द्वन्द्व मनुष्यों की बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं। इसी द्वन्द्व-मोह के कारण जीव परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाते और संसार चक्र में फंसे रहते हैं।
Translation
O scion of Bharata, O harasser of foes, by the delusion of dualities arising from desire and aversion, all living beings in the world fall into utter bewilderment.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains why living beings are deluded from their very birth. The dualities of life, such as pleasure and pain, which arise from desire and aversion, cloud the intellect of living entities. Due to this delusion of dualities, they lose sight of the ultimate truth and remain trapped in the cycle of material existence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इच्छा | इच्छा (राग) |
| द्वेष | और द्वेष (घृणा) |
| समुत्थेन | से उत्पन्न होने वाले |
| द्वन्द्व | द्वन्द्व (सुख-दुःख आदि के जोड़े) |
| मोहेन | रूपी अज्ञान से |
| भारत | हे भरतवंशी (अर्जुन) |
| सर्व | सभी |
| भूतानि | प्राणी |
| संमोहम् | अत्यंत भ्रम (मोह) को |
| सर्गे | सृष्टि में (जन्म लेते ही) |
| यान्ति | प्राप्त होते हैं |
| परन्तप | हे शत्रुओं को तपाने वाले (अर्जुन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| icchā | desire |
| dveṣa | and hate |
| samutthena | arisen from |
| dvandva | of dualities |
| mohena | by the delusion |
| bhārata | O descendant of Bharata |
| sarva | all |
| bhūtāni | living beings |
| saṃmoham | into delusion |
| sarge | in the creation (at birth) |
| yānti | go (fall) |
| parantapa | O conqueror of foes |