Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.26
मूल श्लोक :
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चनHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे अर्जुन जो प्राणी भूतकालमें हो चुके हैं जो वर्तमानमें हैं और जो भविष्यमें होंगे उन सब प्राणियोंको तो मैं जानता हूँ परन्तु मेरेको कोई (मूढ़ मनुष्य) नहीं जानता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विश्व के सभी धर्मों में ईश्वर को सर्वज्ञ माना गया है किन्तु केवल वेदान्त में ही सर्वज्ञता का सन्तोषजनक विवेचन मिलता है। उपनिषदों के सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में गीता का विशेष स्थान है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में सर्वज्ञता का अर्थ क्या है।आत्मा ही वह चेतन तत्त्व है जो मनबुद्धि की समस्त वृत्तियों का प्रकाशित करता है। बाह्य भौतिक जगत् का ज्ञान हमें तभी होता है जब इन्द्रियां विषय ग्रहण करती हैं जिसके फलस्वरूप मन में विषयाकार वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन वृत्तियों का वर्गीकरण करके विषय का निश्चय करने का कार्य बुद्धि का है। मन और बुद्धि की वृत्तियां नित्य चैतन्य स्वरूप आत्मा से ही प्रकाशित होती हैं।सूर्य का प्रकाश जगत् की समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करता है। जब मेरे नेत्र या श्रोत रूप या शब्द को प्रकाशित करते हैं तब मैं कहता हूँ कि मैं देखता हूँ या मैं सुनता हूँ। संक्षेप में वस्तु का भान होने का अर्थ है उसे जानना और जानने का अर्थ है प्रकाशित करना। जैसे सूर्य को जगच्चक्षु कहा जा सकता है क्योंकि उसके अभाव में हमारी नेत्रेन्द्रिय निष्प्रयोजन होकर गोलक मात्र रह जायोगी वैसे ही आत्मा को सर्वत्र सदा सबका ज्ञाता कहा जा सकता है। आत्मा की सर्वज्ञता भगवान् के इस कथन में कि मैं भूत वर्तमान और भविष्य के भूतमात्र को जानता हूँ स्पष्ट हो जाती है।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आत्मा न केवल वर्तमान का ज्ञाता है बल्कि अनादिकाल से जितने विषय भावनाएं एवं विचार व्यतीत हो चुके है उन सबका भी प्रकाशक वही था और अनन्तकाल तक आने वाले भूतमात्र का ज्ञाता भी वही रहेगा विद्युत से पंखा घूमता है परन्तु पंखा विद्युत को गति नहीं दे सकता एक व्यक्ति दूरदर्शी यन्त्र से नक्षत्रों का निरीक्षण करता है किन्तु वह यन्त्र उस द्रष्टा व्यक्ति का निरीक्षण नहीं कर सकता इन्द्रिय मन और बुद्धि को चेतना प्रदान करने वाले द्रष्टा आत्मा को किस प्रकार कोई जान सकता है भगवान् श्रीकृष्ण इस आत्मदृष्टि से कहते हैं यद्यपि मैं सबको सर्वत्र सदा जानता हूँ लेकिन मुझे कोई भी नहीं जानता है।वेदान्त में वर्णित पारमार्थिक दृष्टि से तो आत्मा को ज्ञाता या द्रष्टा भी नहीं कहा जा सकता जैसे शुद्ध तार्किक दृष्टि से यह कहना गलत होगा कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है। हमें रात्रि के अन्धकार में वस्तुएं दिखाई नहीं देतीं इस कारण दिन में उनके दृष्टिगोचर होने पर सूर्य को प्रकाशित करने के धर्म से युक्त मानते हैं। तथापि नित्य प्रकाश स्वरूप सूर्य की दृष्टि से ऐसा कोई क्षण नहीं है जब वह वस्तुओं को प्रकाशित करके उन्हें अनुग्रहीत न करता हो। अत यह कहना कि सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है उतना ही अर्थहीन है जितना यह कथन कि आजकल मैं श्वासोच्छ्वास में अत्यन्त व्यस्त हूँ आत्मा का ज्ञातृत्व औपाधिक है अर्थात् माया की उपाधि से उसे प्राप्त हुआ है। शुद्ध सत्त्वगुण प्रधान माया में व्यक्त आत्मा या ब्रह्मा को ही वेदान्त में ईश्वर कहा जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण सत्य का साकार रूप या ईश्वर का अवतार हैं और इसलिए उनका स्वयं को सर्वज्ञ घोषित करना समीचीन ही है।परन्तु दुर्भाग्य से आत्मकेन्द्रित र्मत्य जीव परिच्छिन्न संकीर्ण और सीमित मन तथा बुद्धि के छिद्र से जगत् को देखते हुए समष्टि की तालबद्ध लय को पहचान नहीं पाता। जो व्यक्ति स्वनिर्मित अज्ञान के बन्धनों को तोड़कर विश्व के साथ तादात्म्य कर सकता है वही व्यक्ति श्रीकृष्ण के दृष्टिकोण को निश्चय ही समझ सकता है उसका अनुभव कर सकता है। जो व्यक्ति सफलतापूर्वक समष्टि मन के साथ तादात्म्य प्राप्त कर जीता है वह व्यक्ति अपने तथा तत्पश्चात् आने वाले युग का कृष्ण ही है।यदि सभी औपाधिक ज्ञानों का प्रकाशक आत्मा ही है तो किन प्रतिबन्धों के कारण आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो पाता है भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
I know, O Arjuna, the beings of the past, the present and the future, but no one knows Me.
Transliteration
vedāhaṃ samatītāni vartamānāni cārjuna
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṃ tu veda na kaścanaअनुवाद
हे अर्जुन! मैं भूतकाल में व्यतीत हुए, वर्तमान में स्थित और भविष्य में होने वाले सभी भूतों (जीवों) को जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई भी नहीं जानता।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी सर्वज्ञता और माया की शक्ति को प्रकट करते हैं। वे काल के तीनों विभागों—भूत, वर्तमान और भविष्य—के सभी प्राणियों को पूर्णतः जानते हैं। इसके विपरीत, साधारण मनुष्य उनकी योगमाया से मोहित होने के कारण उनके वास्तविक अविनाशी स्वरूप को नहीं जान पाते।
Translation
O Arjuna, I know all beings of the past, the present, and those that are yet to come in the future; but Me, no one knows.
Meaning
In this verse, Lord Krishna declares His omniscience and the power of His divine illusion (maya). He has complete knowledge of all living beings across the three divisions of time—past, present, and future. Conversely, ordinary human beings, bewildered by material nature, fail to comprehend His true, eternal, and transcendental nature.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वेद | जानता हूँ |
| अहम् | मैं |
| समतीतानि | बीते हुए (भूतकाल के) |
| वर्तमानानि | वर्तमान के |
| च | और |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| भविष्याणि | भविष्य के |
| च | और |
| भूतानि | प्राणियों को |
| माम् | मुझको |
| तु | परन्तु |
| वेद | जानता है |
| ना | नहीं |
| कश्चन | कोई भी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| veda | know |
| aham | I |
| samatītāni | the past |
| vartamānāni | the present |
| ca | and |
| arjuna | O Arjuna |
| bhaviṣyāṇi | the future |
| ca | and |
| bhūtāni | living beings |
| mām | Me |
| tu | but |
| veda | knows |
| na | not |
| kaścana | anyone |