Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.25
मूल श्लोक :
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते) उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यदि समस्त जगत् के अधिष्ठान के रूप में कोई दिव्य तत्त्व विद्यमान है तो फिर क्या कारण है कि सब लोगों के द्वारा सर्वत्र सदा वह अनुभव नहीं किया जाता क्यों हम परिच्छिन्न जीव के समान व्यवहार करते हैं और अपने अनन्त स्वरूप को पहचान नहीं पाते संक्षेप में मुझमें और मेरे स्वरूप के मध्य कौन सा आवरण पड़ा हुआ है जब जिज्ञासु साधकगण वेदान्त प्रतिपादित सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं तो स्वाभाविक ही उनके मन में इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं।भगवान् कहते हैं यह मोहित जगत् मुझ अजन्मा अविनाशी को नहीं जानता है क्योंकि उनके लिए मैं त्रिगुणात्मिका योगमाया से आच्छादित रहता हूँ। जब वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थी माया को एक बाह्य वस्तु के रूप में समझने का प्रयत्न करते हैं तब उसे समझने में अत्यन्त कठिनाई होती है। परन्तु जब वे अध्यात्म दृष्टि से विचार करते हैं अर्थात् अपने ही अन्तकरण में माया किस प्रकार कार्य करती है ऐसा विचार करते हैं तो माया का सिद्धांत स्पष्ट हो जाता है। माया प्रिज्म (आयत) के समान ऐसी उपाधि है जिसके माध्यम से अवर्ण अद्वैत स्वरूप तत्त्व जब व्यक्त होता है तब सप्तरंगी प्रकाश के समान वह नानाविधि सृष्टि के रूप में प्रतीत होता है।व्यष्टि (एक व्यक्ति) में कार्य कर रही माया को ही अविद्या कहते हैं। ऋषियों ने इस अविद्या का जो कि जीव के सब दुखों का कारण है सूक्ष्म अध्ययन किया और यह उद्घाटित किया कि यह तीन गुणों से युक्त है जो मनुष्य को प्रभावित करते हैं। ये तीन गुण हैं सत्त्व रज और तम जो एक आयत का (प्रिज्म) का सा काम करते हैं और जिनके माध्यम से हमें इस बहुविधि सृष्टि का अनुभव होता है। रजोगुण का कार्य है विक्षेप और तमोगुण का कार्य बुद्धि पर पड़ा आवरण है।त्रिगुणों के विकारों से मोहित और भ्रान्त पुरुष को आत्मा का साक्षात् ज्ञान नहीं होता। उस आत्मज्ञान के लिए गुरु के उपदेश तथा स्वयं की साधना की आवश्यकता होती है। किसी ग्रामीण अनपढ़ व्यक्ति के लिए बल्ब में विद्युत का अभाव प्रतीत होता है क्योंकि वह अव्यक्त होती है। उसके प्रवाह को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए सैद्धांतिक ज्ञान तथा प्रत्यक्ष प्रयोग की अपेक्षा होती है। एक बार विद्युत शक्ति के गुणधर्म का ज्ञान हो जाने पर यदि वह मनुष्य उसी बल्ब में प्रकाश देखे तो उसे अव्यक्त विद्युत का ज्ञान तत्काल हो जाता है इसी प्रकार आत्मसंयम श्रवण मनन और निदिध्यासन के द्वारा जब साधक का क्षुब्ध मन प्रशान्त हो जाता है तब आवरण के अभाव में वह मुझ अजन्मा अविनाशी स्वरूप को पहचान लेता है। अज्ञानी जीव विषयउपभोगों में नित्य सुख की खोज तभी तक करता है जब तक आवरण और विक्षेप की निवृत्ति नहीं हो जाती।कामाग्नि में सुलगते निराशा में जकड़े असन्तोष से कुचले और आत्मनाश के भय से व्याकुल उन्मत्त और संत्तप्त मनों में समता और एकाग्रता कदापि नहीं हो सकती कि वे क्षणभर के लिए भी आत्मा का शुद्ध स्वरूप अनुभव कर सकें। योगमाया से मोहित यह जगत् मुझ अव्यय स्वरूप को नहीं जानता। मानो नाम और रूप की इस सृष्टि ने आत्मा को आवृत्त कर दिया है। यह आवरण उसी प्रकार का है जैसे प्रेत स्तम्भ को मृगमरीचिका रेत को और तरंगे समुद्र को आच्छादित कर देती हैं जीवन की अज्ञान दशा के विपरीत श्रीकृष्ण अपने स्वरूप को बताते हुए कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
I am not manifest to all (as I am) veiled by the Yoga-Maya. This deluded world does not know Me, the unborn and imperishable.
Transliteration
nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ
mūḍho'yaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayamअनुवाद
मैं अपनी योगमाया से छिपा हुआ सबके लिए प्रत्यक्ष नहीं हूँ यह अज्ञानी संसार मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं जानता
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे अपनी दिव्य योगमाया शक्ति के पीछे छिपे रहते हैं, जिसके कारण वे साधारण मनुष्यों को प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। अज्ञानी और संसारी लोग भौतिक दृष्टि से परे नहीं देख पाते और इसलिए वे भगवान के वास्तविक, अजन्मा और अविनाशी स्वरूप को नहीं पहचान पाते। केवल अनन्य भक्ति और ज्ञान के माध्यम से ही इस माया के आवरण को पार किया जा सकता है।
Translation
I am not manifest to everyone, being veiled by My yogamāyā This deluded world does not know Me, the unborn and imperishable
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that He remains hidden behind His divine creative potency, yogamāyā, and is thus not visible to everyone. The deluded world, bound by material consciousness, fails to perceive His true transcendental nature. Consequently, they do not recognize Him as the unborn and imperishable Supreme Reality.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| अहम् | मैं |
| प्रकाशः | प्रकट (प्रत्यक्ष) |
| सर्वस्य | सबके लिए |
| योगमाया-समावृतः | योगमाया से ढका हुआ |
| मूढः | मूर्ख / अज्ञानी |
| अयम् | यह |
| न | नहीं |
| अभिजानाति | जानता है |
| लोकः | संसार |
| माम् | मुझको |
| अजम् | अजन्मा |
| अव्ययम् | अविनाशी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| aham | I |
| prakāśaḥ | manifest |
| sarvasya | to everyone |
| yogamāyā-samāvṛtaḥ | veiled by yogamāyā (divine potency) |
| mūḍhaḥ | deluded / foolish |
| ayam | this |
| na | not |
| abhijānāti | knows / understands |
| lokaḥ | world |
| mām | Me |
| ajam | unborn |
| avyayam | imperishable |