श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.24

मूल श्लोक :

अव्यक्तं व्यक्ितमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त (मनइन्द्रियोंसे पर) मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर धारण करनेवाला मानते हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

समस्त नामरूपों की वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि में प्रकाशित हो रहे परम सत्य को ग्रहण करने की विवेकसार्मथ्य जिनमें नहीं है वे लोग अव्यय अविनाशी आत्मतत्त्व का सााक्षात् नहीं कर पाते। अनित्य दृश्यमान जगत् में अत्यन्त आसक्ति के कारण वे यह नहीं जान पाते कि यह सम्पूर्ण नामरूपमय जगत् सूत्र में मणियों के समान परमात्मा में पिरोया हुआ है।जिस चैतन्य के प्रकाश में सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित हो रहा है उस परम सत्य को ही यहाँ अव्यक्त शब्द से इंगित किया गया है। इस शब्द का लक्ष्यार्थ समझना आवश्यक है। जो वस्तु इन्द्रियगोचर है या मन और बुद्धि के द्वारा जानी जा सकती है  जैसे भावना या विचार वह व्यक्त कहलाती है। अत इन तीनों उपाधियों के द्वारा जिसे जाना नहीं जा सकता वह वस्तु अव्यक्त है।आत्मतत्त्व ही अव्यक्त हो सकता है क्योंकि वही एकमात्र चेतन तत्त्व है जिसके कारण इन्द्रियां मन और बुद्धि स्वविषयों को ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा इन सबका द्रष्टा है और इसलिए कभी दृश्यरूप में नहीं जाना जा सकता। वह अव्यक्त है।बहिर्मुखी प्रवृत्ति के लोग केवल स्थूल भौतिक रूप को ही देख पाते हैं। अविवेक के कारण वे गुरु अथवा अवतार के शरीर को और सार्मथ्य को देखकर उतने मात्र को ही सनातन सत्य समझ लेते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि चित्त की एकाग्रता के लिए अथवा उपासना के लिए किसी उपास्य की प्रतीक या प्रतिमा के रूप में आवश्यकता होती है किन्तु वह प्रतिमा स्वयं परमार्थ सत्य नहीं हो सकती। यदि वही सत्य वस्तु होती तो पाषाण से मूर्ति बनाने के पश्चात् या गुरु के पास पहुँचने मात्र से साधक को सत्य की प्राप्ति हो जाने से उसे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती  मूर्ति पूजा का प्रयोजन चित्त की शुद्धि एवं एकाग्रता प्राप्त करना है जिसके द्वारा ध्यान का अभ्यास करके आत्मा का साक्षात् अनुभव किया जा सकता है।यह श्लोक स्पष्ट रूप से हमें बताता है कि बोतल को औषधि सममझना शरीर को ही गुरु और मूर्ति को ही भगवान् समझ लेना व्यर्थ है  सभी श्वेत काष्ठ चन्दन नहीं और आकाश में प्रत्येक चमकीली वस्तु तारा नहीं होती। हो सकता है कि किसी ऊँचे स्तम्भ से आ रहे प्रकाश को देखकर अतिमूढ़ पुरुष उसे सूर्य समझ ले परन्तु कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उसकी धारणा को गम्भीरता से नहीं लेगा। अवतार का सिद्धांत हिन्दू धर्म में स्वीकार किया जाता है। किसीनकिसी मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति ही अवतार कहा जा सकता है। एक ही सत्य सर्वत्र सबमें व्याप्त है। मन और बुद्धि की उपाधियों में वह व्यक्त होता है। जितना ही अधिक शुद्ध और स्थिर अन्तकरण होगा उतना ही अधिक चैतन्य का प्रकाश उसमें व्यक्त होगा।जिस पुरुष का अन्तकरण अत्यन्त शुद्ध एवं स्थिर होता है और जिसने अपरा प्रकृति पर पूर्ण विजय पा ली होती है वह ऋषि मुनि या पैगम्बर कहलाता है। ये पुरुष आत्मस्वरूप को पहचानकर कि वही भूतमात्र की आत्मा है उसमें स्थित होकर दिव्य जीवन जीते हैं। उनके शरीर मन और बुद्धि को ही परम सत्य समझना ऐसी ही त्रुटि है जैसे कि तरंगों को ही समुद्र समझ लेना है यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ ऐसे अविवेकी लोगों के लिए अबुद्धय जैसे कठोर शब्द का प्रयोग करते हैं।यह अज्ञान किस निमित्त से है  इस पर कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The foolish think of Me, the Unmanifest, as having manifestation, knowing not My higher, immutable and most excellent nature.

Transliteration

avyaktaṃ vyaktimāpannaṃ manyante māmabuddhayaḥ
paraṃ bhāvamajānanto mamāvyayamanuttamam

अनुवाद

बुद्धिहीन लोग मेरे अविनाशी और सर्वोत्तम परम भाव को न जानते हुए, मुझ अप्रकट को मनुष्य की भाँति प्रकट हुआ मानते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जो लोग अज्ञानी हैं, वे उनके वास्तविक दिव्य स्वरूप को नहीं पहचान पाते। वे सोचते हैं कि भगवान पहले निराकार थे और अब एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रकट हुए हैं। वे कृष्ण के उस परम, अविनाशी और सर्वोत्तम स्वरूप से अनभिज्ञ हैं जो जन्म और मृत्यु से परे है।

Translation

The unintelligent, unaware of My supreme, imperishable, and unsurpassed nature, think of Me as having transitioned from an unmanifest state to a manifest human form

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that those who lack deeper intelligence fail to recognize His true divine nature. They mistakenly believe that He was previously unmanifest and has now assumed a physical, human form. They remain ignorant of His supreme, imperishable, and unsurpassed transcendental existence which is beyond material limitations.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अव्यक्तम्अव्यक्त (जो प्रकट नहीं है)
व्यक्तिम्व्यक्त भाव को (मनुष्य रूप को)
आपन्नम्प्राप्त हुए
मन्यन्तेमानते हैं
माम्मुझको
अबुद्धयःबुद्धिहीन लोग
परम्परम
भावम्भाव को (स्वरूप को)
अजानन्तःन जानते हुए
मममेरे
अव्ययम्अविनाशी
अनुत्तमम्सर्वोत्तम (जिससे उत्तम कोई न हो)

Word by word

WordMeaning
avyaktamthe unmanifested
vyaktimpersonality / manifestation
āpannamattained
manyantethink
māmMe
abuddhayaḥless intelligent people
paramsupreme
bhāvamnature / state of being
ajānantaḥnot knowing
mamaMy
avyayamimperishable
anuttamamunsurpassed / supreme