Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.21
मूल श्लोक :
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
(टिप्पणी प0 430) जोजो भक्त जिसजिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है उसउस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस अध्याय के प्रारम्भिक भाग में ही आत्मानात्म विवेक (जड़चेतन का विभाजन) करके भगवान् श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है कि किस प्रकार उनमें समस्त नामरूप पिरोये हुए हैं। उसके पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार त्रिगुणात्मिका मायाजनित विकारों से मोहित होकर मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता। आत्मचैतन्य के बिना शरीर मन और बुद्धि की जड़ उपाधियाँ स्वयं कार्य नहीं कर सकती हैं।जगत् में देखा जाता है कि सभी भक्तजन एक ही रूप में ईश्वर की आराधना नहीं करते। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता की पूजा के द्वारा सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि कोई भी भक्त किसी भी स्थान पर मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा या गिरजाघर में एकान्त में या सार्वजनिक स्थान में किसी भी रूप में ईश्वर की पूजा श्रद्धा के साथ करता है उसकी उस श्रद्धा को उसके इष्ट देवता में मैं स्थिर करता हूँ। गीता के मर्म को जानने वाला सच्चा विद्यार्थी कदापि कट्टरपंथी पृथकतावादी या असहिष्णु नहीं हो सकता। ईश्वर के सभी सगुण रूपों का अधिष्ठान एक परम सत्य ही है जहाँ से भक्त के हृदय में भक्तिरूपी पौधा पल्लवित पुष्पित और फलित होने के लिए श्रद्धारूपी जल प्राप्त करता है क्योंकि भगवान् स्वयं कहते हैं मैं उस श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।आध्यात्मदृष्टि से विचार करने पर इस श्लोक का और अधिक गम्भीर अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है।मनुष्य जिस विषय का निरन्तर चिन्तन करता रहता है उसमें वह दृढ़ता से आसक्त और स्थित हो जाता है। अखण्ड चिन्तन से मन में उस विषय के संस्कार दृढ़ हो जाते हैं और फिर उसके अनुसार ही उस मनुष्य की इच्छायें और कर्म होते हैं। इसी नियम के अनुसार सतत आत्मचिन्तन करने से भी मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है।सारांशत भगवान् का कथन हैं कि जैसा हम विचार करते हैं वैसा ही हम बनते हैं। अत यदि कोई व्यक्ति दुर्गुणों का शिकार हो गया हो अथवा अन्य व्यक्ति दैवी गुणों से संपन्न हो तो यह दोनों के भिन्नभिन्न विचारों का ही परिणाम समझना चाहिए। विचार प्रकृति का अंग है विचारों के अनुरूप जगत् होता है जिसका एक अधिष्ठान है सर्वव्यापी आत्मतत्त्व।सतत समृद्ध हो रही श्रद्धा के द्वारा मनुष्य किस प्रकार इष्ट फल को प्राप्त करता है
English Translation By Swami Sivananda
Whatsoever form any devotee desires to worship with faith that (same) faith of his I make firm and unflinching.
Transliteration
yo yo yāṃ yāṃ tanuṃ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati
tasya tasyācalāṃ śraddhāṃ tāmeva vidadhāmyahamअनुवाद
जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे सभी प्राणियों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं। जब कोई भक्त किसी अन्य देवी-देवता की पूजा श्रद्धापूर्वक करना चाहता है, तो भगवान उसकी उस श्रद्धा को उसी रूप में सुदृढ़ कर देते हैं। यह ईश्वर की परम उदारता और सर्वव्यापकता को दर्शाता है, जहाँ वे प्रत्येक जीव की इच्छा का सम्मान करते हैं।
Translation
Whichever devotee desires to worship with faith whichever deity’s form, I make that very faith of his steady and unwavering.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that He dwells in the hearts of all beings as the Supersoul. When a devotee desires to worship a particular demigod or deity with faith, the Lord strengthens and stabilizes that faith in that specific form. This highlights the supreme tolerance and omnipresence of the Divine, who facilitates the spiritual journey of every soul according to their inclination.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यः यः | जो-जो |
| याम् याम् | जिस-जिस |
| तनुम् | शरीर को / देवता के स्वरूप को |
| भक्तः | भक्त |
| श्रद्धया | श्रद्धा से |
| अर्चितुम् | पूजना |
| इच्छति | चाहता है |
| तस्य तस्य | उस-उस (भक्त) की |
| अचलाम् | स्थिर / अडिग |
| श्रद्धाम् | श्रद्धा को |
| ताम् | उस |
| एव | ही को |
| विदधामि | दृढ़ करता हूँ |
| अहम् | मैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yaḥ yaḥ | whoever |
| yām yām | whichever |
| tanum | form / deity |
| bhaktaḥ | devotee |
| śraddhayā | with faith |
| arcitum | to worship |
| icchati | desires |
| tasya tasya | of that particular |
| acalām | unwavering / steady |
| śraddhām | faith |
| tām | that |
| eva | surely / only |
| vidadhāmi | bestow / make |
| aham | I |