श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.20

मूल श्लोक :

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर (देवताओंके) उनउन नियमोंको धारण करते हुए उनउन देवताओंके शरण हो जाते हैं (टिप्पणी प0 429.1)।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

विवेक सार्मथ्य मानव जन्म की विशेषता है और यह सर्वथा असंभव है कि विवेक के प्रखर और सजग होने पर मनुष्य को आत्मज्ञान न हो सके। परन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियां और विषयभोग की कामनायें उसके विवेक को आच्छादित कर देती हैं।देवता शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे  प्रकृति के नियमों के अधिष्ठाता देवता इन्द्र वरुण आदि इन्द्रियां किसी कार्य क्षेत्र में निहित उत्पादन क्षमता आदि। यहाँ इनमें से कोई भी अर्थ लेकर इस श्लोक का अध्ययन करने पर यही ज्ञात होता है कि भोगी पुरुष इनकी आराधना केवल वैषयिक सुख को प्राप्त करने के लिए ही करता है। वह कामना से प्रेरित होकर तत्पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न करता रहता है।शान्त मन में आत्मा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट और स्थिर दिखाई देता है परन्तु कामनाओं के स्रोतों से प्रवाहित होने वाली विचारों की धारायें उसमें विक्षेप उत्पन्न करके प्रतिबिम्ब को भी विचलित कर देती हैं। मन के क्षुब्ध होने पर बुद्धि की विवेक सार्मथ्य लुप्त हो जाती है और स्वभावत फिर मनुष्य सत्य असत्य का विवेक नहीं कर पाता है। जब मनुष्य की बुद्धि का आलोक कामना के मेघों से आवृत हो जाता है तब आसक्तियों और अवगुणों के उलूक मन के जंगल में शोर मचाने लगते हैं।मन में इच्छा के उदय मात्र से मनुष्य का पतन नहीं होता बल्कि पतन का कारण है  उत्पन्न इच्छा के साथ उसका तादात्म्य। इस तादात्म्य के द्वारा मनुष्य अनजाने में अपनी इच्छाओं को बढ़ावा देकर असंख्य विक्षेपों को जन्म देता हुआ स्वयं उनका शिकार बन जाता है।अन्न के सूक्ष्म तत्त्व का ही रूप वृत्ति (विचार) है और इसलिए वह स्वयं जड़ है। वृत्तिरूप मन आत्मा से चेतनता प्राप्त करता है और कामी व्यक्ति से सार्मथ्य। विचारों के अनुसार कर्म होता है। एक बार मनुष्य के मन में कोई कामना दृढ़ हो जाये तो वह यह विवेक खो देता है कि उस कामनापूर्ति से उसे नित्य शाश्वत सुख मिलेगा या नहीं। क्षणिक सुख की आसक्ति के कारण वह अन्यान्य देवताओं को सन्तुष्ट करने में व्यस्त रहता है।अब यह भी सर्वविदित तथ्य है कि प्रत्येक देवता को सन्तुष्ट करने के विशेष नियम होते हैं। इन्द्रादि देवताओं को यज्ञयागादि के द्वारा इन्द्रियों के शब्दादि विषयों के द्वारा तथा कार्यक्षेत्र की उत्पादन क्षमता को व्यक्त करने के लिए उचित उपकरणों और उनके योग्य उपयोग के द्वारा सन्तुष्ट करके इष्ट फल प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए यहाँ कहा गया है कि वे अन्यान्य देवताओं को विशिष्ट नियमों का पालन करके भजते हैं।एक वासुदेव को त्यागकर लोग अन्य देवताओं को क्यों भजते हैं इसका कारण श्लोक की दूसरी पंक्ति में बताया गया है कि  प्रकृत्या नियत स्वया। प्रत्येक मनुष्य अपनी पूर्व संचित वासनाओं के अनुसार भिन्नभिन्न विषयों की ओर आकर्षित होकर तदनुसार कर्म करता है। यह धारणा कि स्वर्ग में बैठा कोई ईश्वर हमारे मन में इच्छाओं को उत्पन्न कराकर हमें पाप और पुण्य के कर्मों में प्रवृत्त करता है केवल निराशावादी निर्बल और आलसी लोगों की ही हो सकती है। बुद्धिमान साहसी और उत्साही पुरुष जानते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपने विचारों के अनुसार अपने वातावरण कार्यक्षेत्र आदि का निर्माण करता है।संक्षेप में एक मूढ़ पुरुष शाश्वत सुख की आशा में वैषयिक क्षणिक सुखों की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ता रहता है जबकि विवेकी पुरुष उसकी व्यर्थता पहचान कर पारमार्थिक सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है।भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Those whose wisdom has been rent away by this or that desire, go to other gods, following this or that rite, led by their own nature.

Transliteration

kāmais tais tair hṛtajñānāḥ prapadyante 'nyadevatāḥ
taṃ taṃ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā

अनुवाद

उन-उन भोगों की कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे अपनी प्रकृति से नियंत्रित होकर, उन-उन नियमों का आश्रय लेकर अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि भौतिक इच्छाओं के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी विवेक-बुद्धि खो बैठते हैं। वे अपनी जन्मजात प्रकृति के अनुसार विभिन्न सांसारिक लाभों के लिए अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने लगते हैं। वे उन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए विशिष्ट नियमों और अनुष्ठानों का पालन करते हैं, क्योंकि वे परम सत्य को भूल चुके होते हैं।

Translation

Those whose knowledge has been swept away by various desires, driven by their own natures, surrender to other deities, following the particular rites and rules of each

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that individuals whose discrimination is stolen by material desires surrender to other demigods. Driven by their own conditioned natures, they follow specific rules and rituals to propitiate these deities for temporary worldly gains, losing sight of the ultimate Supreme Truth.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
कामैःकामनाओं द्वारा
तैःउन
तैःउन
हृतहरे गए / नष्ट हुए
ज्ञानाःज्ञान वाले
प्रपद्यन्तेशरण ग्रहण करते हैं
अन्यअन्य
देवताःदेवताओं की
तम्उस
तम्उस
नियमम्नियम को
आस्थायस्वीकार करके / आश्रय लेकर
प्रकृत्यास्वभाव से
नियताःविवश / नियंत्रित
स्वयाअपनी

Word by word

WordMeaning
kāmaiḥby desires
taiḥby those
taiḥby those
hṛtadeprived of
jñānāḥwhose knowledge
prapadyantesurrender to
anyaother
devatāḥdeities
tamthat
tamthat
niyamamregulation
āsthāyafollowing
prakṛtyāby nature
niyatāḥcontrolled
svayāby their own