श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.2

मूल श्लोक :

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

श्री शंकराचार्य के अनुसार शास्योक्त पदार्थों का परिज्ञान ज्ञान है तथा शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का यथार्थ रूप में स्वानुभव होना विज्ञान है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे न केवल शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन करेंगे वरन् प्रवचनकाल में ही वे उसे आत्मानुभव के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा भी देंगे। उनका यह कथन कुछ अविश्वसनीय प्रतीत हो सकता है क्योंकि योग साधना तथा भारतीय दर्शन की अन्य शाखाओं में साधक को लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसकी प्राप्ति के लिये विशेष साधना करनी होती है। परन्तु वेदान्त शास्त्र इनसे भिन्न है क्योंकि इसमें साधक को उसके नित्यसिद्ध स्वरूप का ही बोध कराया गया है न कि स्व्ायं से भिन्न किसी वस्तु का। अत एक सुयोग्य विद्यार्थी को उपदेश ग्रहण के पश्चात् आत्मानुभव के लिये कहीं किसी वन प्रान्त में जाने की आवश्यकता नहीं होती है।यदि शिष्य ज्ञान के लिये आवश्यक गुणों से सम्पन्न है और गुरु के बताये हुए तर्कों को समझने में समर्थ है तो उसे अध्ययन काल में ही आत्मानुभव हो सकता है। यही कारण है कि वेदान्त केवल सुयोग्य विद्यार्थियों को ही पढ़ाया जाता है। उत्तम शिष्य के लिये आत्मानुभूति तत्काल प्राप्य है। उसे कालान्तर अथवा देशान्तर की अपेक्षा नहीं होती।यदि वेदान्त एक पूर्ण शास्त्र है और उपदेश काल में ही आत्मानुभव सिद्ध हो सकता है तो फिर क्या कारण है कि विश्वभर में ऐसे ज्ञानी पुरुष विरले ही होते हैं भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

I shall declare to thee in full this knowledge combined with realisation, after knowing which nothing more here remains to be known.

Transliteration

jñānaṃ te'haṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ
yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate

अनुवाद

मैं तुम्हारे लिए इस विज्ञान सहित ज्ञान को पूरी तरह से कहूँगा जिसे जानकर इस संसार में फिर कुछ भी अन्य जानने योग्य शेष नहीं बचता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को पूर्ण ज्ञान और विज्ञान (अनुभवजन्य ज्ञान) प्रदान करने की प्रतिज्ञा करते हैं। वे कहते हैं कि इस परम सत्य को जान लेने के बाद साधक के लिए कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। यह ज्ञान आध्यात्मिक और भौतिक दोनों जगतों के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करता है।

Translation

I shall declare to you in full this knowledge combined with realization which having known, nothing more here remains to be known

Meaning

In this verse, Lord Krishna promises to impart to Arjuna both theoretical knowledge (jñāna) and experiential realization (vijñāna) in their entirety. He emphasizes the completeness of this divine wisdom, stating that once it is realized, there remains nothing else in this world to be known. This knowledge represents the ultimate truth of existence.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ज्ञानम्ज्ञान को
तेतुम्हारे लिए
अहम्मैं
सविज्ञानम्विज्ञान (अनुभव) सहित
इदम्इस
वक्ष्यामिकहूँगा
अशेषतःपूर्ण रूप से
यत्जिसको
ज्ञात्वाजानकर
नहीं
इहइस संसार में
भूयःफिर
अन्यत्दूसरा कुछ भी
ज्ञातव्यम्जानने योग्य
अवशिष्यतेशेष बचता है

Word by word

WordMeaning
jñānamknowledge
teto you
ahamI
savijñānamalong with realized knowledge
idamthis
vakṣyāmishall declare
aśeṣataḥcompletely
yatwhich
jñātvāhaving known
nanot
ihain this world
bhūyaḥfurther
anyatanything else
jñātavyamto be known
avaśiṣyateremains