श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.19

मूल श्लोक :

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें सब कुछ परमात्मा ही है ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सर्वोच्च ज्ञान को प्राप्त हुए श्रेष्ठ महात्मा पुरुष जगत् में विरले ही होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण का कथन है। हिन्दू धर्म के पतन काल में इस प्रकार के कथन को अत्यन्त निराशावादी माना जाने लगा। परन्तु थोड़े विचार से ही इस प्रकार के निष्कर्ष का दोष स्पष्ट हो जायेगा। सृष्टि में समस्त चेतन जीवों की तुलना में मानव की संख्या अत्यन्त कम अनुपात में है। मनुष्यजाति में भी सभी परिपक्व बुद्धि एवं उच्च भावनाओं से सम्पन्न नहीं होते हैं।अन्तकरण के श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न होने पर भी बहुत कम लोग हैं जो गम्भीरतापूर्वक शास्त्राध्ययन करते हैं और शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन में जीने वालों की संख्या तो नगण्य ही होती है। अनेक लोगों को केवल बौद्धिक ज्ञान से ही सन्तोष हो जाता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विकास के चरम लक्ष्य  आत्मानुभूति तक पहुँचने वाले ज्ञानी पुरुष विरले ही होंगे।डार्विन के समान प्राचीन काल में ऋषियों ने सभी प्राणियों का निरीक्षण करके यह पाया कि प्राणी का अपने निम्न स्तर से उच्च स्तर तक का विकास होने के लिए दीर्घकालावधि की अपेक्षा होती है जिसमें विभिन्न परिस्थितियों एवं जन्मों से गुजरते हुए वह विकास के श्रेष्ठतर रूप को प्राप्त करता है। यह कालावधि करोड़ों वर्ष की हो सकती है। इससे हम कल्पना कर सकते हैं कि अहंकार को हटाकर अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले विकास के सर्वोच्च लक्ष्य सम्पूर्ण आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए कितने जन्मों की तपस्या होनी चाहिए। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम इसी वर्तमान जन्म में ही जीवन के इस सर्वोच्च लक्ष्य ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते। गीता का कथन निराशाजनक नहीं वरन् उत्साहवर्धक है। यहाँ बताये गये असंख्य जन्म ज्ञान प्राप्ति के पूर्व के हैं पश्चात् के नहीं। यदि मनुष्य अपने जीवन की अनेक उपलब्धियों से भी असन्तुष्ट होकर जीवन का वास्तविक लक्ष्य जानने का प्रयत्न करता है तो यह स्वयं ही विकास की एक अवस्था है। तत्पश्चात् शास्त्रों के अध्ययन में उसकी प्रवृत्ति हो और तत्प्रतिपादित सिद्धांतों को ग्रहण करने की सार्मथ्य हो तो स्पष्ट है कि वह आत्मदेव के मन्दिर के द्वार तक पहुँच गया है। अत और अधिक लगन से प्रयत्न करने पर इसी जन्म में वह मानव जन्म के परम पुरुषार्थ  आत्मसंस्थिति को प्राप्त हो सकता है। साधक को साधना में अग्रसर होने के लिए उत्साहित करना ही भगवान् के उक्त कथन का एक मात्र प्रयोजन है।यह सब आत्मा या वासुदेव ही है इस ज्ञान को प्राप्त न करने का कारण वे अगले श्लोक में बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

At the end of many births the wise man comes to Me, realising that all this is Vaasudeva (the innermost Self); such a great soul (Mahatma) is very hard to find.

Transliteration

bahūnāṃ janmanām ante jñānavān māṃ prapadyate
vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā sudurlabhaḥ

अनुवाद

बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् पुरुष मुझको भजता है, सब कुछ वासुदेव ही है—ऐसा मानने वाला वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण ज्ञानमार्गी भक्त की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। अनेक जन्मों के आध्यात्मिक प्रयासों और साधना के बाद, जब साधक को पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है, तब वह समझता है कि सब कुछ परमात्मा (वासुदेव) ही है। ऐसा सर्वत्र ईश्वर-दर्शन करने वाला महात्मा संसार में अत्यंत दुर्लभ होता है।

Translation

At the end of many births, the man of wisdom surrenders unto Me, realizing that Vasudeva is all. Such a great soul is very rare.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the culmination of spiritual evolution. After many lifetimes of spiritual practice, a seeker attains true wisdom and realizes that the Divine (Vasudeva) is everything and exists in all. Such a fully realized great soul (mahatma) is extremely rare to find in this world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
बहूनाम्बहुत से
जन्मनाम्जन्मों के
अन्तेअन्त में
ज्ञानवान्ज्ञानवान् पुरुष
माम्मुझको
प्रपद्यतेशरण लेता है / भजता है
वासुदेवःवासुदेव (परमात्मा)
सर्वम्सब कुछ (है)
इतिइस प्रकार
सःवह
महात्मामहात्मा
सु-दुर्लभःअत्यन्त दुर्लभ है

Word by word

WordMeaning
bahūnāmof many
janmanāmbirths
anteat the end
jñānavānthe wise person
māmunto Me
prapadyatesurrenders / approaches
vāsudevaḥVasudeva (the Supreme Lord)
sarvamall / everything
itithus
saḥthat
mahātmāgreat soul
sudurlabhaḥis very rare