Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.18
मूल श्लोक :
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
पहले कहे हुए सबकेसब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
विशाल हृदय के भक्तानुग्रहकारक भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि जो कोई भी भक्त मेरी भक्ति करता है वह अन्य जनों की अपेक्षा उत्कृष्ट ही है फिर चाहे वह अपने कष्ट निवारणार्थ मेरा भक्त हो अथवा वह अर्थार्थी हो। किसानकिसी प्रकार से वह मुझ अनन्तस्वरूप की ओर ही अग्रसर हो रहा होता है। अत वह उत्कृष्ट है। तथापि इन चतुर्विध भक्तों में ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है।हम सब जानते हैं कि किसी मन्त्री का मित्र होना और स्वयं ही मन्त्री बनना इन दोनों में बहुत अन्तर है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन्त्री की मित्रता प्राप्त होने मात्र से भी मनुष्य को समाज में एक विशेष प्रभावपूर्ण स्थान प्राप्त होता है परन्तु मन्त्री पद की समस्त गरिमा एवं अधिकार तो स्वयं मन्त्री बनने पर ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार किसी फल विशेष के लिए ईश्वर की आराधना करना उसका आह्वान करना निश्चय ही एक दैवी गुण है किन्तु ज्ञानी पुरुष निष्काम होकर मन और बुद्धि के अतीत अपने परमात्मस्वरूप को पहचान कर परिच्छिन्न अहंकार को ही समाप्त कर देता है और परमात्मा के साथ वह एकत्वभाव को प्राप्त हो जाता है।तत्पश्चात् ऐसा ज्ञानी पुरुष सदा आत्मस्वरूप में ही स्थित होता है। इसलिए अन्य भक्तों की तुलना में ज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ है यह श्रीकृष्ण का मत है।
English Translation By Swami Sivananda
Noble indeed are all these; but I deem the wise man as My very Self; for, steadfast in mind he is established in Me alone as the supreme goal.
Transliteration
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatimअनुवाद
ये सभी निश्चय ही उदार हैं, परंतु ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह स्थिर बुद्धि वाला पुरुष मुझको ही अपनी सर्वोत्तम गति मानकर मुझमें ही स्थित रहता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि चारों प्रकार के भक्त (आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी) उदार और प्रिय हैं, परंतु ज्ञानी भक्त उन्हें सबसे प्रिय है। ज्ञानी भक्त भगवान को किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल उनके वास्तविक स्वरूप के लिए भजता है। इसलिए कृष्ण उसे अपनी आत्मा के समान मानते हैं क्योंकि वह अनन्य भाव से केवल उन्हीं में स्थित रहता है।
Translation
All these are indeed noble, but the wise self-realized person is My very Self—this is My opinion. For, with a disciplined mind, he is established in Me alone as the supreme goal.
Meaning
In this verse, Lord Krishna clarifies that while all four types of devotees (the distressed, the seeker of wealth, the inquisitive, and the wise) are noble and dear to Him, the wise devotee (jñānī) is His very Self. The wise devotee worships God not for any material gain, but purely out of love for His divine nature. Consequently, being fully united with the Divine, he regards Krishna as the ultimate and supreme goal of life.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उदाराः | उदार / महान |
| सर्वे | सभी |
| एव | ही |
| एते | ये |
| ज्ञानी | ज्ञानी भक्त |
| तु | परंतु |
| आत्मा | आत्मा |
| एव | ही |
| मे | मेरा |
| मतम् | मत / विचार है |
| आस्थितः | स्थित है |
| सः | वह |
| हि | क्योंकि |
| युक्तात्मा | मुझमें एकाग्र मन वाला |
| माम् | मुझको |
| एव | ही |
| अनुत्तमाम् | सर्वोत्तम |
| गतिम् | गति / परम लक्ष्य |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| udārāḥ | noble |
| sarve | all |
| eva | indeed |
| ete | these |
| jñānī | the wise one |
| tu | but |
| ātmā | self |
| eva | surely |
| me | my |
| matam | opinion |
| āsthitaḥ | established |
| saḥ | he |
| hi | because |
| yuktātmā | one with mind integrated in Me |
| mām | Me |
| eva | alone |
| anuttamām | the supreme / unsurpassed |
| gatim | goal / destination |