Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.17
मूल श्लोक :
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्ितर्विशिष्यते
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मेरेको अत्यन्त प्रिय है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
चतुर्विध भक्तों की परस्पर तुलना करके भगवान् कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त मुझसे नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ जिसकी अनन्य भक्ति है वह सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि आत्मतत्त्व से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण नहीं करता है। जब तक साधक को अपने ध्येय का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता है तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं की जा सकती है। एक भक्ति का अर्थ है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहना।एक भक्ति को पाने के लिए साधक को अपने मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्तियों को विषय से निवृत्त करना आवश्यक होता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए नहीं वरन् अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर का आह्वान करता है जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में व्यर्थ अपव्यय होता है। अत स्वाभाविक है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिसके मन में आत्मानुभूति के अतिरिक्त अन्य कोई कामना ही नहीं रहती।ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। वास्तव में आत्मसमर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत गाया जाता है। निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है समस्त कालों एवं परिस्थितियों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान। प्रेम के इस स्वरूप को समझने पर ही ज्ञात होगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है।एकपक्षीय प्रेम की परिसमाप्ति कभी पूर्णत्व में नहीं हो सकती। यहाँ भगवान् स्पष्ट कहते हैं ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है। प्रेम का यह सनातन नियम है कि वह निष्काम होने पर न केवल पूर्णता को प्राप्त होता है वरन् उसमें एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सार्मथ्य होती है।यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि यदि किसी व्यक्ति का मन किसी एक विशेष भावना जैसे दुख द्वेष मत्सर करुणा से भर जाता है तो उसके समीपस्थ लोगों के मन पर भी उस तीव्र भावना का प्रभाव पड़ता है। अत यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकें तो हमारे दुष्ट शत्रु का भी हृदय परिवर्तित हो सकता है। यह नियम है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य भगवान् के इस कथन में स्पष्ट होता है कि ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी अत्यन्त प्रिय है।तब क्या आर्तादि भक्त भगवान् वासुदेव को प्रिय नहीं है ऐसी बात नहीं फिर क्या कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Of them the wise, ever steadfast and devoted to the One, excels (is the best); for I am exceedingly dear to the wise and he is dear to Me.
Transliteration
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate
priyo hi jñānino'tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥअनुवाद
उनमें नित्य-युक्त और अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यंत प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है
भावार्थ
भगवान कृष्ण चार प्रकार के भक्तों (आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी) में से ज्ञानी भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं। ज्ञानी भक्त सदैव परमात्मा में लीन रहता है और उसकी भक्ति निष्काम तथा अनन्य होती है। भगवान और ज्ञानी भक्त के बीच का प्रेम परस्पर और अत्यंत प्रगाढ़ होता है।
Translation
Of these, the wise one, who is ever united with Me and devoted to Me alone, is the best for I am exceedingly dear to the wise, and he is dear to Me
Meaning
Lord Krishna declares the wise devotee (jñānī) to be the foremost among the four types of seekers. Because the wise devotee is constantly established in divine consciousness and possesses single-minded devotion, they are dearest to the Lord. This verse highlights the reciprocal and profound bond of love between God and the self-realized soul.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तेषाम् | उनमें (चारों भक्तों में) |
| ज्ञानी | ज्ञानवान् |
| नित्य-युक्तः | सदा मुझमें स्थित |
| एक-भक्तिः | एकमात्र मुझमें ही अनन्य भक्ति वाला |
| विशिष्यते | अति उत्तम है |
| प्रियः | अत्यंत प्रिय |
| हि | क्योंकि |
| ज्ञानिनः | ज्ञानी पुरुष को |
| अत्यर्थम् | अत्यंत |
| अहम् | मैं |
| सः | वह |
| च | और |
| मम | मेरा |
| प्रियः | प्रिय (है) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| teṣām | of them |
| jñānī | the wise one |
| nitya-yuktaḥ | always united (with Me) |
| eka-bhaktiḥ | having single-minded devotion |
| viśiṣyate | is preeminent |
| priyaḥ | dear |
| hi | indeed |
| jñāninaḥ | to the wise one |
| atyartham | exceedingly |
| aham | I |
| saḥ | he |
| ca | and |
| mama | to Me |
| priyaḥ | is dear |