श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.15

मूल श्लोक :

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पापकर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्व श्लोक में कहा गया है कि मेरे भक्त माया को तर जाते हैं तो इस श्लोक में बता रहे हैं कि कौन से लोग हैं जो मेरी भक्ति नहीं करते हैं। इन दो प्रकार के लोगों का भेद स्पष्ट किये बिना जिज्ञासु साधक सम्यक् प्रकार से यह नहीं जान सकता कि मन की कौन सी प्रवृत्तियां मोह के लक्षण हैं।दुष्कृत्य करने वाले मूढ नराधम लोग ईश्वर की भक्ति नहीं करते हैं जिसका कारण यह है कि उनके विवेक का माया द्वारा हरण कर लिया जाता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य के उच्च विकास का लक्षण उसकी विवेकवती बुद्धि है। इस बुद्धि के द्वारा वह अच्छाबुरा उच्चनीच नैतिकअनैतिक का विवेक कर पाता है। बुद्धि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अज्ञानजनित जीवभाव के स्वप्न से जागकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है।विषयों के द्वारा जो व्यक्ति क्षुब्ध नहीं होता उसमें ही यह विवेकशक्ति प्रभावशाली ढंग से कार्य कर पाती है। मनुष्य में देहात्मभाव जितना अधिक दृढ़ होगा उतनी ही अधिक विषयाभिमुखी उसकी प्रवृत्ति होगी। अत विषयभोग की कामना को पूर्ण करने हेतु वह निंद्य कर्म में भी प्रवृत्त होगा। इस दृष्टि से पाप कर्म का अर्थ है मनुष्यत्व की उच्च स्थिति को पाकर भी स्वस्वरूप के प्रतिकूल किये गये कर्म। स्थूल देह को अपना स्वरूप समझकर मोहित हुए पुरुष ही पापकर्म करते हैं। ऐसे लोगों को यहाँ मूढ़ और आसुरी भाव का मनुष्य कहा गया है। गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरीभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।परन्तु जो पुण्यकर्मी लोग हैं वे चार प्रकार से मेरी भक्ति करते हैं। भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The evil-doers and the deluded who are the lowest of men do not seek Me; they whose knowledge is destroyed by illusion follow the ways of demons.

Transliteration

na māṃ duṣkṛtino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ
māyayāpahṛtajñānā āsuraṃ bhāvamāśritāḥ

अनुवाद

दुष्कर्म करने वाले, मूर्ख, मनुष्यों में नीच, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है और जो आसुरी स्वभाव को धारण किए हुए हैं, वे मेरी शरण ग्रहण नहीं करते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उन चार प्रकार के लोगों का वर्णन कर रहे हैं जो उनकी शरण में नहीं आते हैं। वे लोग जो पापकर्मों में लिप्त हैं, विवेकहीन हैं, मानव जाति में सबसे गिरे हुए हैं, और माया के प्रभाव से जिनका ज्ञान नष्ट हो चुका है, वे आसुरी प्रवृत्ति के कारण ईश्वर की शरण से विमुख रहते हैं।

Translation

The evil-doers, the foolish, the lowest among mankind, whose wisdom has been stolen by illusion, and who have accepted the demoniac nature, do not surrender unto Me.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the four classes of people who do not surrender to Him. Those who commit evil deeds, are foolish, are the lowest of humanity, and whose knowledge is swept away by illusion, remain distant from the Divine due to their demoniac nature.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
नहीं
माम्मेरी (शरण)
दुष्कृतिनःदुष्कर्म करने वाले / पापी
मूढाःमूर्ख लोग
प्रपद्यन्तेशरण ग्रहण करते हैं
नराधमाःमनुष्यों में नीच
माययामाया के द्वारा
अपहृतहर लिया गया है
ज्ञानाःज्ञान जिनका
आसुरम्आसुरी / राक्षसी
भावम्स्वभाव को
आश्रिताःआश्रय लिए हुए / धारण किए हुए

Word by word

WordMeaning
nanot
māmunto Me
duṣkṛtinaḥevil-doers / miscreants
mūḍhāḥthe foolish
prapadyantesurrender
narādhamāḥthe lowest of mankind
māyayāby illusion / maya
apahṛtastolen / deprived of
jñānāḥwhose knowledge
āsuraṃdemoniac
bhāvamnature
āśritāḥhaving accepted / sheltered in