Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.14
मूल श्लोक :
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति तेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण होते हैं वे इस मायाको तर जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि अहंकार से युक्त आत्मकेन्द्रित पुरुष के लिए मेरी माया से उत्पन्न मोह को पार कर पाना दुस्तर है। यदि कोई चिकित्सक रोगी के रोग को पहचान कर कहे कि इस रोग के निवारण के लिए कोई औषधि नहीं है तो कोई भी रोगी सावधानी उत्साह तथा श्रद्धा के साथ चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार नहीं करेगा। इसी प्रकार यदि भवरोगियों के चिकित्सक भगवान् श्रीकृष्ण रोग का कारण माया को बताकर उसे दुस्तर घोषित करें तो कौन व्यक्ति श्रद्धा के साथ उनके निराशावादी उपदेश का अनुकरण करेगा भगवान् श्रीकृष्ण इस कठिनाई अथवा दोष को जानते हैं और इसलिए तत्काल ही साधक के मन की शंका को दूर करते हैं। यदा कदा रोगी को उसके रोग की गम्भीरता का भान कराने के लिए चिकित्सक को कठोर भाषा का प्रयोग करना पड़ता है ठीक उसी प्रकार यहाँ श्रीकृष्ण अनेक विशेषणों के द्वारा हमें इस रोग की वह भयंकरता बताने का प्रयत्न करते हैं जिसके कारण हम अपने परमात्म स्वरूप को भूलकर संसारी जीवभाव को प्राप्त हो गये हैं रोग तथा उपचार को बताकर भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण स्वास्थ्य का आश्वासन भी देते हैं।जो साधक मेरी शरण में आते हैं वे माया को तर जाते हैं। शरण से तात्पर्य भगवान् के स्वरूप को पहचान कर तत्स्वरूप बन जाना है। इसका सम्पादन कैसे किया जा सकता है इसका विवेचन पूर्व के ध्यानयोग नामक अध्याय में किया जा चुका है। एकाग्र चित्त होकर आत्मस्वरूप का ध्यान करना यह साक्षात् साधन है और ध्यान के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त करने के उपाय भी पहले बताये गये हैं।यदि आपकी शरण में आने से माया को पार किया जा सकता है तो फिर सब लोग आपकी शरण में क्यों नहीं आते हैं इस पर कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Verily, this divine illusion of Mine, made up of the (three) alities (of Nature) is difficult to cross over; those who take refuge in Me alone, cross over this illusion.
Transliteration
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā
māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti teअनुवाद
क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी माया पार करने में अत्यंत कठिन है जो केवल मेरी ही शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी माया की शक्ति और उससे पार पाने का उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से बनी उनकी यह अलौकिक माया अत्यंत शक्तिशाली है और इसे अपने प्रयासों से पार करना असंभव है। केवल वे ही इस माया के बंधन से मुक्त हो सकते हैं जो पूर्ण रूप से भगवान की शरण में आ जाते हैं।
Translation
For this divine illusion of Mine, consisting of the three modes of material nature, is difficult to overcome Those who surrender unto Me alone, cross over this illusion
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains the formidable nature of His material energy (Maya) and the way to overcome it. He states that this divine illusion, composed of the three modes of nature (sattva, rajas, and tamas), is extremely difficult to cross over. Only those who surrender themselves completely to Him can transcend this illusion and attain liberation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दैवी | अलौकिक / दिव्य |
| हि | निश्चय ही |
| एषा | यह |
| गुणमयी | त्रिगुणमयी (सत्त्व, रज, तम गुणों वाली) |
| मम | मेरी |
| माया | माया |
| दुरत्यया | पार करने में अत्यंत कठिन |
| माम् | मुझको |
| एव | ही |
| ये | जो (मनुष्य) |
| प्रपद्यन्ते | शरण लेते हैं |
| मायाम् | माया को |
| एताम् | इस |
| तरन्ति | पार कर जाते हैं |
| ते | वे |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| daivī | divine / supernatural |
| hi | certainly |
| eṣā | this |
| guṇamayī | consisting of the three modes of nature |
| mama | My |
| māyā | illusory energy |
| duratyayā | difficult to overcome |
| mām | unto Me |
| eva | alone / only |
| ye | who |
| prapadyante | surrender |
| māyām | illusion |
| etām | this |
| taranti | cross over |
| te | they |