Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.13
मूल श्लोक :
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सब जगत् इन गुणोंसे पर अविनाशी मेरेको नहीं जानता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रश्न यह है कि यदि त्रिगुणों से परे कोई परम अव्यय तत्त्व है तो सामान्य मनुष्य उसे क्यों नहीं जान पाता है पूर्ण साक्षात्कार न भी सहज हो तब भी कम से कम उसके अस्तित्व के विषय में तो उसे शंका नहीं होनी चाहिए इसका उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।त्रिगुणों से उत्पन्न राग द्वेषादि विकारों के कारण मनुष्य अपने दिव्य स्वरूप को भूलकर उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके केवल विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं। स्वाभाविक है कि इस आसक्ति के कारण स्वस्वरूप की ओर इनका ध्यान तक नहीं जाता। एक बार स्तम्भ में प्रेत का आभास होने पर वह स्तम्भ उससे आच्छादित हो जाता है। यह एक तथ्य है कि जब तक यह आभास बना रहता है तब तक स्तम्भ का एक इञ्च भाग भी मोहित व्यक्ति को नहीं दिखाई देता इसी प्रकार माया से उत्पन्न उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण आत्मा को मानो जीवभाव प्राप्त हो जाता है। यह जीव बाह्य जगत् में व्यस्त और आसक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने में स्वयं को असमर्थ पाता है। स्वयं में स्वयं के साथ स्वयं का चल रहा लुकाछिपी का यह खेल विचित्र एवं रहस्यमय है जिसके कारण यह अपने लिए और जगत् के लिए अनन्त दुख और विक्षेप उत्पन्न करता रहता है।अगले श्लोक में इस आवरण शक्ति की परिभाषा का वर्णन किया गया है
English Translation By Swami Sivananda
Deluded by these Natures (states or things) composed of the three alities of Nature all this world does not know Me as distinct from them and immutable.
Transliteration
tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat
mohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayamअनुवाद
इन तीन गुणों से युक्त भावों के द्वारा यह सारा संसार मोहित हो रहा है, इसलिए यह मुझ इन गुणों से परे और अविनाशी को नहीं जानता।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि संसार के लोग माया के वश में क्यों हैं। प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रज, और तम) मनुष्यों की बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं। इस मोह के कारण वे परमेश्वर के वास्तविक, अविनाशी और गुणातीत स्वरूप को नहीं पहचान पाते।
Translation
Deluded by these three states composed of the gunas, this entire world does not know Me, who am beyond them and imperishable.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains why the world remains in ignorance of His true nature. The three modes of material nature (sattva, rajas, and tamas) create an illusion that deludes all living beings. Consequently, they fail to recognize the Supreme Lord, who exists beyond these modes and is eternal and immutable.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| त्रिभिः | तीन |
| गुणमयैः | गुणों से युक्त |
| भावैः | भावों द्वारा |
| एभिः | इन |
| सर्वम् | संपूर्ण |
| इदम् | यह |
| जगत् | संसार |
| मोहितम् | मोहित |
| न | नहीं |
| अभिजानाति | जानता है |
| माम् | मुझको |
| एभ्यः | इनसे |
| परम् | परे |
| अव्ययम् | अविनाशी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tribhiḥ | by three |
| guṇamayaiḥ | composed of the gunas |
| bhāvaiḥ | by states |
| ebhiḥ | by these |
| sarvam | all |
| idam | this |
| jagat | world |
| mohitam | deluded |
| na | not |
| abhijānāti | knows |
| mām | Me |
| ebhyaḥ | from these |
| param | beyond |
| avyayam | imperishable |